Breaking News

सदियों पुराना साथी भारत को देने जा रहा ‘खजाना’! पीएम मोदी करने जा रहे बड़ी डील, चीन की बढ़ सकती है टेंशन



भारत की ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु बिजली की महत्वाकांक्षी योजना के लिहाज से 30 अगस्त 2026 का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव की ताशकंद में हुई बातचीत के दौरान दोनों देशों ने रिश्तों को Comprehensive Strategic Partnership के स्तर तक ले जाने का फैसला किया। इसी बैठक में भारत और उज्बेकिस्तान के बीच यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए एक व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा भी हुई।

यानी जिस ‘खजाने’ की चर्चा बैठक से पहले हो रही थी, अब उसके बारे में आधिकारिक संकेत सामने आ चुके हैं। भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश आने वाले दशकों में परमाणु ऊर्जा की क्षमता को कई गुना बढ़ाने की तैयारी कर रहा है और इसके लिए विश्वसनीय तथा विविध परमाणु ईंधन आपूर्ति बेहद जरूरी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए 2047 तक भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। उस समय देश की स्थापित परमाणु क्षमता करीब 8.78 गीगावाट थी।

अब उज्बेकिस्तान के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था को इसी बड़े ऊर्जा रोडमैप के संदर्भ में देखा जा रहा है।

ताशकंद में हुई बातचीत और सामने आया बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री मोदी दो दिवसीय यात्रा पर उज्बेकिस्तान पहुंचे थे। रविवार को ताशकंद के कुकसरॉय प्रेसिडेंशियल पैलेस में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत हुई।

बातचीत में दोनों देशों ने व्यापार, ऊर्जा, संपर्क, स्वास्थ्य, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति का रहा।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दोनों देश यूरेनियम की आपूर्ति के लिए एक लॉन्ग-टर्म अरेंजमेंट स्थापित करेंगे। इसी बैठक में भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने रिश्तों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का निर्णय भी लिया।

यह सिर्फ एक ऊर्जा समझौते के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतें, परमाणु बिजली विस्तार और मध्य एशिया में रणनीतिक पहुंच जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं।

भारत को यूरेनियम की जरूरत क्यों है?

परमाणु बिजली संयंत्रों में बिजली उत्पादन के लिए परमाणु ईंधन की आवश्यकता होती है। भारत के कई रिएक्टरों के लिए यूरेनियम महत्वपूर्ण ईंधन है।

भारत के पास अपने यूरेनियम संसाधन भी हैं, लेकिन घरेलू उत्पादन लंबे समय तक देश की पूरी जरूरत के लिए पर्याप्त नहीं रहा है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय असैन्य परमाणु सहयोग व्यवस्था के बाद भारत ने विदेशों से यूरेनियम और परमाणु ईंधन की आपूर्ति के रास्ते खोले।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2008-09 से 2024-25 के बीच भारत ने IAEA safeguards के तहत आने वाले रिएक्टरों के लिए 18,842.60 टन यूरेनियम अलग-अलग रूपों में आयात किया।

भारत ने समय-समय पर अलग-अलग देशों से परमाणु ईंधन की आपूर्ति के समझौते किए हैं। इनमें रूस, कजाकिस्तान, कनाडा और अब उज्बेकिस्तान जैसे देश शामिल हैं। कजाकिस्तान के साथ भारत ने पहले भी यूरेनियम अयस्क सांद्रण की आपूर्ति के लिए समझौते किए हैं।

यही वजह है कि उज्बेकिस्तान का जुड़ना भारत की सप्लाई चेन को और विविध बना सकता है।

उज्बेकिस्तान के पास कितना यूरेनियम है?

उज्बेकिस्तान मध्य एशिया के प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देशों में शामिल है। फरवरी 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उज्बेकिस्तान ने 2025 में करीब 7,000 मीट्रिक टन यूरेनियम का उत्पादन किया और देश ने अपने यूरेनियम भंडार को करीब 1,39,000 टन बताया था। देश ने 2030 तक सालाना उत्पादन को 7,200 टन तक बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा है।

इससे समझा जा सकता है कि भारत की नजर उज्बेकिस्तान पर क्यों है।

भारत के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय कई भरोसेमंद स्रोतों से परमाणु ईंधन हासिल करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इससे किसी एक देश में राजनीतिक अस्थिरता, निर्यात प्रतिबंध या वैश्विक सप्लाई संकट की स्थिति में भारत के परमाणु बिजली कार्यक्रम पर पड़ने वाला असर कम किया जा सकता है।

मोदी का 100 GW का लक्ष्य और यूरेनियम की भूमिका

भारत ने परमाणु ऊर्जा को अपनी भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया है।

15 अगस्त के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 GW तक पहुंचाने का लक्ष्य घोषित किया था। उन्होंने इस दशक में पांच नए परमाणु रिएक्टर शुरू करने का लक्ष्य भी बताया था।

फिलहाल भारत की स्थापित परमाणु क्षमता 8.78 GW है और देश में 24 वाणिज्यिक परमाणु रिएक्टर संचालित हैं। सरकार के रोडमैप के अनुसार 2031-32 तक क्षमता को करीब 22 GW तक ले जाने की योजना है। इसके बाद 2047 तक 100 GW के लक्ष्य की दिशा में बड़े स्तर पर नए रिएक्टर जोड़े जाने हैं।

यानी आने वाले वर्षों में परमाणु बिजली के क्षेत्र में भारत का विस्तार बहुत बड़ा होने वाला है।

ऐसे में रिएक्टर बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा। उनके लिए लंबे समय तक ईंधन की सुरक्षित और स्थिर आपूर्ति भी सुनिश्चित करनी होगी।

यहीं उज्बेकिस्तान जैसी यूरेनियम उत्पादक अर्थव्यवस्थाओं का महत्व बढ़ जाता है।

भारत पहले से कर रहा है कई देशों से परमाणु ईंधन सहयोग

भारत की रणनीति केवल उज्बेकिस्तान पर निर्भर रहने की नहीं है।

देश पहले से कई अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ परमाणु ईंधन सहयोग कर चुका है। रूस के साथ भारतीय परमाणु बिजली कार्यक्रम में लंबे समय से सहयोग है। कजाकिस्तान भी भारत के लिए महत्वपूर्ण यूरेनियम आपूर्तिकर्ता रहा है। कनाडा के साथ भी परमाणु ईंधन सहयोग हुआ है।

इसका मकसद एक ऐसी सप्लाई व्यवस्था तैयार करना है जिसमें भारत को परमाणु ईंधन के लिए किसी एक स्रोत पर निर्भर न रहना पड़े।

उज्बेकिस्तान के साथ नई दीर्घकालिक व्यवस्था इसी नीति का अगला कदम मानी जा सकती है।

कहानी सिर्फ यूरेनियम तक सीमित नहीं

मोदी-मिर्जियोयेव बैठक का महत्व केवल यूरेनियम तक सीमित नहीं है।

दोनों देशों ने अपने रिश्तों को Comprehensive Strategic Partnership में बदलने का निर्णय लिया है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच विदेश मंत्रियों के स्तर पर एक Coordination Council बनाने की बात भी सामने आई है, जो सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों को दिशा देने का काम करेगी।

दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ाने के लिए बिजनेस समिट आयोजित करने की भी योजना है।

इसका अर्थ है कि भारत और उज्बेकिस्तान अपने संबंधों को केवल पारंपरिक कूटनीति तक सीमित नहीं रखना चाहते। ऊर्जा, व्यापार, परिवहन, तकनीक और रणनीतिक सहयोग को एक ही व्यापक ढांचे में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

भारत की नजर सिर्फ उज्बेकिस्तान पर नहीं

मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसे भारत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है।

कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान भी भारत की मध्य एशिया रणनीति में महत्वपूर्ण हैं।

इस पूरे क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी मात्रा मौजूद है। कहीं यूरेनियम है, कहीं तेल और गैस, तो कहीं खनिज और जलविद्युत क्षमता।

मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का मतलब भारत के लिए केवल ऊर्जा संसाधन हासिल करना नहीं है। यह व्यापार, संपर्क, निवेश और सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

चीन के लिए भी क्यों महत्वपूर्ण है मध्य एशिया?

मध्य एशिया लंबे समय से चीन, रूस, यूरोप और अन्य बड़ी शक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है।

चीन ने Belt and Road Initiative के जरिए मध्य एशियाई देशों में बुनियादी ढांचे और व्यापारिक संपर्क बढ़ाने में बड़े निवेश किए हैं।

ऐसे में भारत की बढ़ती मौजूदगी को क्षेत्र में एक वैकल्पिक साझेदारी के रूप में देखा जा सकता है।

भारत का लक्ष्य जरूरी नहीं कि चीन को क्षेत्र से बाहर करना हो। बल्कि भारत की रणनीति ऐसी बहु-विकल्पीय साझेदारियां विकसित करने की है, जिसमें मध्य एशियाई देश अलग-अलग शक्तियों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को संतुलित कर सकें।

उज्बेकिस्तान के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी और यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।

भारत की सबसे बड़ी चुनौती है कनेक्टिविटी

मध्य एशिया के साथ भारत के रिश्तों में एक बड़ी समस्या भौगोलिक दूरी और सीधा भूमि मार्ग न होना है।

भारत और मध्य एशिया के बीच पाकिस्तान स्थित होने के कारण सीधा ओवरलैंड संपर्क आसान नहीं है। इसलिए भारत ने वैकल्पिक संपर्क मार्गों पर विशेष जोर दिया है।

ईरान का चाबहार पोर्ट और International North-South Transport Corridor यानी INSTC इसी रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। भारत सरकार के अनुसार, INSTC का उद्देश्य भारत को रूस और यूरोप के साथ-साथ मध्य एशियाई बाजारों से जोड़ना है, जबकि चाबहार मध्य एशिया के लिए महत्वपूर्ण ट्रांजिट केंद्र बन सकता है।

अगर भारत मध्य एशिया से ऊर्जा और खनिज संसाधन हासिल करता है, तो उन्हें भारत तक पहुंचाने के लिए भरोसेमंद परिवहन नेटवर्क भी जरूरी होगा।

यानी यूरेनियम समझौते के साथ-साथ कनेक्टिविटी का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सदियों पुराने रिश्ते को मिली नई रणनीतिक दिशा

भारत और उज्बेकिस्तान का रिश्ता आधुनिक कूटनीति से काफी पुराना है। मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच सदियों से व्यापार, संस्कृति और लोगों का आवागमन रहा है।

लेकिन आज दोनों देशों के रिश्ते एक नए चरण में प्रवेश करते दिखाई दे रहे हैं।

एक तरफ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध हैं, दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा, खनिज, व्यापार और रणनीतिक सहयोग जैसे आधुनिक हित हैं।

यही संयोजन इस साझेदारी को महत्वपूर्ण बनाता है।

अब असली परीक्षा होगी अमल की

यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा निश्चित रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि समझौते के तहत कितनी मात्रा में, किस समय-सीमा में और किन शर्तों पर यूरेनियम भारत पहुंचेगा।

फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक जानकारी इसे एक long-term supply arrangement के रूप में बताती है। इसलिए किसी निश्चित मात्रा या आर्थिक मूल्य को लेकर तब तक दावा करना उचित नहीं होगा, जब तक सरकार की ओर से उसका विस्तृत विवरण सामने न आए।

फिर भी रणनीतिक संदेश स्पष्ट है।

भारत अपनी बढ़ती परमाणु ऊर्जा क्षमता के लिए ईंधन सुरक्षा को मजबूत कर रहा है और साथ ही मध्य एशिया में अपनी आर्थिक तथा रणनीतिक मौजूदगी बढ़ा रहा है।

उज्बेकिस्तान से आने वाला यूरेनियम भारत की ऊर्जा जरूरतों का अकेला समाधान नहीं होगा, लेकिन यह उस बड़ी रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है जिसमें भारत 8.78 GW की मौजूदा परमाणु क्षमता से 2047 तक 100 GW के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।

और यही वजह है कि ताशकंद में मोदी-मिर्जियोयेव की मुलाकात को सिर्फ एक सामान्य कूटनीतिक बैठक के तौर पर देखना मुश्किल है। एक तरफ परमाणु ईंधन की सुरक्षा, दूसरी तरफ मध्य एशिया में रणनीतिक पहुंच और तीसरी तरफ चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच अपना संतुलन—इन तीनों मोर्चों पर भारत ने एक साथ कदम आगे बढ़ाया है।

कोई टिप्पणी नहीं