25 करोड़ का खेल, 50 हजार महीने की कमाई! रैपिडो चालकों के बैंक खाते में पहुंच रहे थे ठगी के पैसे, असली मास्टरमाइंड कौन?
बिहार की राजधानी पटना में साइबर ठगी के एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। पुलिस ने ऐसे गिरोह के तीन कथित सदस्यों को गिरफ्तार किया है, जिनके बैंक खातों में साइबर ठगी से जुड़ी करीब 25 करोड़ रुपये की रकम का लेनदेन सामने आया है। पुलिस के मुताबिक आरोपी खुद सीधे तौर पर साइबर ठगी नहीं करते थे, बल्कि कथित तौर पर साइबर अपराधियों को अपने बैंक खाते उपलब्ध कराते थे। इसके बदले उन्हें हर महीने हजारों रुपये का कमीशन मिलता था।
गिरफ्तार आरोपियों में प्रभाकर कुमार, अमित कुमार और दीपक कुमार रावत शामिल हैं। प्रभाकर और अमित पेशे से रैपिडो चालक बताए जा रहे हैं, जबकि दीपक पर लोगों के बैंक खाते खुलवाने और उन्हें साइबर अपराधियों तक पहुंचाने में भूमिका निभाने का आरोप है। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में जुटी है।
छह महीने की जांच के बाद सामने आया मामला
पटना के अलग-अलग इलाकों में रहने वाले दो दर्जन से ज्यादा लोगों ने साइबर ठगी की शिकायतें दर्ज कराई थीं। इन शिकायतों में बताया गया था कि अलग-अलग तरीकों से लोगों को निशाना बनाकर उनके पैसे बैंक खातों में ट्रांसफर कराए गए।
शिकायत मिलने के बाद साइबर पुलिस ने उन मोबाइल नंबरों और बैंक खातों की जांच शुरू की, जिनका इस्तेमाल कथित ठगी में हुआ था। यह जांच करीब छह महीने तक चली।
जांच के दौरान पुलिस को तीन संदिग्ध बैंक खातों के बारे में जानकारी मिली। इन खातों में करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ था। बैंक अधिकारियों की मदद से जब इन खातों की गतिविधियों की पड़ताल की गई तो पुलिस को शक हुआ कि इनका इस्तेमाल सामान्य कारोबारी लेनदेन के बजाय साइबर ठगी की रकम को रखने और आगे भेजने के लिए किया जा रहा है।
इसके बाद पुलिस ने संबंधित खातों को फ्रीज कराया और आरोपियों की तलाश शुरू कर दी।
दो रैपिडो चालकों की गिरफ्तारी से मचा हड़कंप
जांच के बाद पुलिस ने कंकड़बाग इलाके से प्रभाकर कुमार को गिरफ्तार किया। इसके बाद राजीवनगर इलाके से अमित कुमार को पकड़ा गया। दोनों के नाम पर बैंक में चालू खाते होने की जानकारी सामने आई।
शुरुआत में दोनों सामान्य तरीके से रैपिडो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। पुलिस के अनुसार साइबर अपराधियों के संपर्क में आने के बाद दोनों ने कथित तौर पर अपने बैंक खातों का इस्तेमाल दूसरे लोगों के लिए करवाना शुरू किया।
पूछताछ में दोनों ने कथित तौर पर पुलिस को बताया कि उनके बैंक खाते दीपक कुमार रावत की मदद से खुलवाए गए थे। इसके बाद पुलिस ने दीपक की तलाश शुरू की।
ससुराल में छिपा था तीसरा आरोपी
पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, दीपक कुमार रावत का नाम सामने आया। पुलिस के मुताबिक वह बक्सर स्थित अपनी ससुराल में छिपा हुआ था।
पुलिस टीम ने वहां छापेमारी कर उसे गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में बैंक खातों और उनमें हुए करोड़ों रुपये के लेनदेन को लेकर उससे जानकारी ली गई।
पुलिस का मानना है कि दीपक की भूमिका सिर्फ बैंक खाता खुलवाने तक सीमित नहीं हो सकती। जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि उसने कितने लोगों के खाते खुलवाए और उन खातों को किन-किन साइबर अपराधियों तक पहुंचाया।
हर महीने 40 से 50 हजार रुपये का कमीशन
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात बैंक खाते किराए पर देने के बदले मिलने वाला कमीशन है।
पुलिस के मुताबिक आरोपियों को साइबर ठगी की रकम अपने खातों में रखने और उसे आगे ट्रांसफर कराने के बदले हर महीने करीब 40 से 50 हजार रुपये तक का कमीशन मिलता था।
यानी आरोपियों के लिए बिना सीधे किसी व्यक्ति को फोन किए या कोई फर्जी लिंक भेजे पैसा कमाने का रास्ता तैयार हो गया था।
साइबर अपराधी कथित तौर पर इन खातों का इस्तेमाल ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए करते थे। इससे वास्तविक ठगों तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए मुश्किल हो सकता है।
25 करोड़ रुपये के लेनदेन ने बढ़ाई चिंता
पुलिस की जांच में तीनों संदिग्ध खातों से करीब 25 करोड़ रुपये के लेनदेन का खुलासा हुआ है। इतनी बड़ी रकम सामने आने के बाद पुलिस का शक और गहरा गया।
जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि यह रकम कितने लोगों से ठगी गई और कितने अलग-अलग साइबर अपराधों से इसका संबंध है।
अगर जांच में यह साबित होता है कि इन खातों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर साइबर ठगी के लिए किया गया था, तो यह नेटवर्क पटना और बिहार के बाहर भी फैला हो सकता है।
असली साइबर ठग अभी भी पुलिस की नजर में
गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि सीधे साइबर ठगी करने वाले लोग कोई और थे। यानी पुलिस के हाथ अभी उन लोगों तक नहीं पहुंचे हैं, जो लोगों को फोन, मैसेज, लिंक या अन्य डिजिटल तरीकों से ठगी का शिकार बनाते थे।
अब जांच का मुख्य उद्देश्य उन्हीं कथित साइबर अपराधियों तक पहुंचना है।
पुलिस बैंक खातों में हुए लेनदेन, मोबाइल नंबरों, कॉल डिटेल और डिजिटल ट्रांजेक्शन की कड़ियों को जोड़ रही है। माना जा रहा है कि इन सुरागों के जरिए गिरोह के अन्य सदस्यों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।
कई राज्यों तक जुड़े हो सकते हैं तार
साइबर अपराध के मामलों में अक्सर अपराधी एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य के लोगों को निशाना बनाते हैं। ठगी की रकम को अलग-अलग राज्यों के बैंक खातों में भेजा जाता है और फिर कई स्तरों पर ट्रांसफर किया जाता है।
पटना पुलिस को भी इस मामले में नेटवर्क के दूसरे राज्यों से जुड़े होने की आशंका है।
जांच अधिकारियों का कहना है कि गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के बाद गिरोह के अन्य सदस्यों की जानकारी जुटाई जा रही है। उनके संभावित ठिकानों पर छापेमारी की कार्रवाई भी आगे बढ़ाई जा सकती है।
छोटे कमरे को ऑफिस दिखाकर खुलवाते थे खाते
जांच में साइबर ठगी के नेटवर्क का एक और तरीका सामने आया है। कथित तौर पर कुछ लोग छोटे कमरे को किराए पर लेकर उसे कार्यालय या कारोबार से जुड़ी जगह के रूप में दिखाते थे।
इसके बाद उसके आधार पर बैंक में चालू खाता खुलवाया जाता था। खाते में बड़े पैमाने पर रकम आने और जाने का रास्ता तैयार किया जाता था।
ऐसे खाते देखने में सामान्य कारोबारी खाते जैसे लग सकते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल कथित तौर पर साइबर अपराध की रकम के लिए किया जा रहा था।
इस तरह के तरीकों से साइबर अपराधी अपनी असली पहचान छिपाने की कोशिश करते हैं।
रैपिडो चालकों को कैसे फंसाया गया?
इस मामले में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सामान्य काम करने वाले दो लोग साइबर अपराध के नेटवर्क तक कैसे पहुंचे।
पुलिस के मुताबिक प्रभाकर और अमित रैपिडो चलाकर परिवार का खर्च चलाते थे। साइबर अपराधियों के संपर्क में आने के बाद उन्हें बैंक खाता उपलब्ध कराने के बदले हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक कमाने का लालच दिया गया।
आसानी से मिलने वाले इस पैसे के लालच ने उन्हें कथित तौर पर नेटवर्क का हिस्सा बना दिया।
यह मामला उन लोगों के लिए भी चेतावनी है जिन्हें कोई व्यक्ति बैंक खाता किराए पर देने या खाते से लेनदेन कराने के बदले मोटी रकम देने का प्रस्ताव देता है।
बैंक खाता किसी दूसरे को देना पड़ सकता है भारी
आम लोगों के लिए इस मामले से सबसे बड़ी सीख यही है कि बैंक खाता किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए देना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
कई बार लोगों को यह कहकर खाते देने के लिए तैयार किया जाता है कि उसमें कंपनी का पैसा आएगा, ऑनलाइन कारोबार का भुगतान होगा या किसी अन्य सामान्य काम के लिए खाते का इस्तेमाल किया जाएगा।
लेकिन अगर उसी खाते में साइबर ठगी की रकम पहुंचती है तो बैंक रिकॉर्ड में खाता धारक का नाम सामने आता है। इसके बाद पुलिस और जांच एजेंसियां खाते के मालिक से पूछताछ कर सकती हैं।
इसलिए किसी भी व्यक्ति को अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक, इंटरनेट बैंकिंग या यूपीआई से जुड़ी जानकारी किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए नहीं देनी चाहिए।
पुलिस अब गिरोह के मास्टरमाइंड की तलाश में
तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की जांच अब कथित नेटवर्क के मुख्य संचालकों तक पहुंचने पर केंद्रित है।
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन खातों में पैसे कौन भेजता था, रकम आगे कहां ट्रांसफर होती थी, आरोपियों को कमीशन कौन देता था और पूरे नेटवर्क का संचालन कौन कर रहा था।
इसके अलावा यह भी जांच की जा रही है कि क्या इसी गिरोह ने बिहार के अलावा दूसरे राज्यों में भी लोगों को साइबर ठगी का शिकार बनाया है।
जांच पूरी होने के बाद ही 25 करोड़ रुपये के लेनदेन की पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी।
आम लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत
पटना का यह मामला बताता है कि साइबर अपराध अब केवल फर्जी फोन कॉल या लिंक तक सीमित नहीं है। अपराधी ठगी की रकम को छिपाने के लिए बैंक खातों का नेटवर्क तैयार कर रहे हैं।
इसलिए किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक खाता खोलना या अपना मौजूदा खाता इस्तेमाल के लिए देना खतरनाक हो सकता है।
अगर किसी बैंक खाते में अचानक अनजान स्रोत से बड़ी रकम आती है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बैंक से संपर्क कर मामले की जानकारी लेना और संदिग्ध लेनदेन की सूचना संबंधित अधिकारियों को देना जरूरी है।
पटना में सामने आए इस साइबर फ्रॉड मामले ने पुलिस के सामने एक बड़े नेटवर्क की तस्वीर रख दी है। करीब 25 करोड़ रुपये के लेनदेन से जुड़े तीन संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें दो रैपिडो चालक हैं, जबकि तीसरे आरोपी पर लोगों के बैंक खाते खुलवाने में भूमिका निभाने का आरोप है।
पुलिस के मुताबिक आरोपी साइबर ठगी की रकम अपने खातों में रखने के बदले हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक कमीशन लेते थे। अब पुलिस इस नेटवर्क के उन सदस्यों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है जो कथित तौर पर सीधे साइबर ठगी को अंजाम देते थे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 25 करोड़ रुपये के इस लेनदेन के पीछे आखिर कौन है और कितने लोगों की मेहनत की कमाई इस नेटवर्क ने उड़ाई है? पुलिस की आगे की जांच से इस पूरे साइबर नेटवर्क की परतें खुलने की उम्मीद है।

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