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न्यूजीलैंड दौरे के दौरान फिर चर्चा में आई पीएम मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस, नॉर्वे की पत्रकार के बयान से तेज हुई बहस

 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया न्यूजीलैंड दौरे के दौरान एक बार फिर उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विदेश दौरे के दौरान आयोजित आधिकारिक कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री द्वारा पत्रकारों के सवालों का सीधे जवाब न देने के मुद्दे पर न्यूजीलैंड में सवाल पूछे जाने के बाद यह विषय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में आ गया है। इसी बीच नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग (Hege Løng) ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें यह देखकर खुशी है कि अन्य देश भी भारत में प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर भारत सरकार या प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से इस विषय में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

नॉर्वे की पत्रकार ने एक्स पर क्या लिखा?

नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर लिखा कि उन्हें अच्छा लग रहा है कि अब अन्य देशों में भी भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के सवालों को लेकर चर्चा हो रही है।

उन्होंने अपने पोस्ट में कहा कि ओस्लो की घटना के बाद उन्होंने दुनिया भर के मीडिया संस्थानों को 30 से अधिक इंटरव्यू दिए थे। उनके अनुसार ऐसा करना उनके उद्देश्य का हिस्सा था ताकि इस विषय पर व्यापक चर्चा हो सके।

उन्होंने लिखा कि न्यूजीलैंड और नॉर्वे जैसे छोटे देशों में काम करने वाले पत्रकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, विशेषकर तब जब वहां किसी बड़े लोकतांत्रिक देश के नेता दौरे पर आते हैं। उनके अनुसार छोटे देश भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें खुशी है कि कई भारतीयों ने उनकी बात को गंभीरता से लिया और इस विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाया।

क्या था ओस्लो का मामला?

यह पूरा विवाद पहली बार तब चर्चा में आया था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे की राजधानी ओस्लो के दौरे पर गए थे।

उस दौरान एक कार्यक्रम में पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से सार्वजनिक रूप से सवाल पूछा था कि वह दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस में से एक मानी जाने वाली प्रेस के सामने सीधे सवाल क्यों नहीं लेते।

यह सवाल उस समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में काफी चर्चा का विषय बना था। इसके बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं।

हालांकि उस समय भी भारत सरकार की ओर से इस विशेष प्रश्न पर अलग से कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की गई थी।

न्यूजीलैंड में फिर उठा वही मुद्दा

अब प्रधानमंत्री मोदी के न्यूजीलैंड दौरे के दौरान भी इसी तरह का सवाल सामने आया।

ऑकलैंड में आयोजित भारतीय विदेश मंत्रालय की एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पत्रकारों ने पूछा कि प्रधानमंत्री मीडिया के सामने खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते और पत्रकारों के सवालों का सीधे जवाब क्यों नहीं लेते।

इस सवाल के बाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस विषय पर चर्चा शुरू हो गई।

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि उस प्रेस ब्रीफिंग में भारतीय अधिकारियों ने इस प्रश्न का क्या विस्तृत उत्तर दिया।

ऑस्ट्रेलिया में भी हुई थी टिप्पणी

न्यूजीलैंड की घटना से एक दिन पहले ऑस्ट्रेलिया में भी एक टेलीविजन रिपोर्टर ने इसी विषय पर टिप्पणी की थी।

रिपोर्टर ने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना पूर्व निर्धारित या बिना स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचने के लिए जाने जाते हैं।

इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

भारत सरकार का क्या रहा है रुख?

भारत सरकार नियमित रूप से प्रेस विज्ञप्तियों, मीडिया ब्रीफिंग, सरकारी वक्तव्यों, संसद में दिए गए जवाबों तथा विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी नीतियों और फैसलों की जानकारी देती रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भाषण देते हैं, इंटरव्यू भी देते रहे हैं और डिजिटल माध्यमों के जरिए जनता से संवाद करते हैं। इसके अलावा उनका मासिक रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" भी लंबे समय से प्रसारित होता रहा है।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस, जिसमें विभिन्न मीडिया संस्थानों के पत्रकार बिना पूर्व निर्धारित प्रश्नों के सवाल पूछ सकें, लोकतांत्रिक संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम होती है।

दूसरी ओर सरकार समर्थकों का तर्क है कि सरकार विभिन्न माध्यमों से लगातार जानकारी उपलब्ध कराती है और प्रधानमंत्री कई सार्वजनिक मंचों पर देश और दुनिया के सामने अपनी बात रखते हैं।

प्रेस स्वतंत्रता पर होती रही है बहस

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर समय-समय पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है।

कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने अपनी रिपोर्टों में भारत की प्रेस स्वतंत्रता को लेकर चिंता व्यक्त की है, जबकि भारत सरकार कई बार इन आकलनों पर सवाल उठाते हुए कह चुकी है कि ऐसे सूचकांक देश की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाते।

सरकार का कहना रहा है कि भारत में हजारों समाचार पत्र, सैकड़ों टीवी चैनल, डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौजूद है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज

इस तरह के मुद्दों पर भारत में राजनीतिक दलों की राय भी अलग-अलग रही है।

विपक्षी दल समय-समय पर प्रधानमंत्री से खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की मांग उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में शीर्ष नेतृत्व को मीडिया के सवालों का सीधे जवाब देना चाहिए।

वहीं भाजपा और उसके समर्थक यह तर्क देते हैं कि प्रधानमंत्री लगातार जनता के बीच रहते हैं, अनेक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और सरकार की नीतियों पर विस्तार से अपनी बात रखते हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और मीडिया के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम होती है।

हालांकि वे यह भी कहते हैं कि अलग-अलग देशों में राजनीतिक नेतृत्व की संवाद शैली अलग हो सकती है। कई नेता नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, जबकि कुछ नेता अन्य माध्यमों के जरिए जनता और मीडिया तक अपनी बात पहुंचाना पसंद करते हैं।

उनके अनुसार किसी भी लोकतंत्र में सरकार और स्वतंत्र मीडिया के बीच संतुलित संवाद लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

न्यूजीलैंड और नॉर्वे की घटनाओं के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स सहित अन्य मंचों पर इस विषय पर व्यापक चर्चा देखने को मिली।

कुछ लोगों ने पत्रकारों के सवाल पूछने के अधिकार का समर्थन किया, जबकि अन्य लोगों ने कहा कि किसी भी देश के प्रधानमंत्री की मीडिया रणनीति तय करना उनकी सरकार का अधिकार है।

दोनों पक्षों की ओर से विभिन्न तर्क और उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूजीलैंड दौरे के दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मीडिया और लोकतांत्रिक संवाद की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के हालिया बयान ने इस चर्चा को और गति दी है।

हालांकि इस विषय पर भारत सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में यह बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है। यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि प्रेस की स्वतंत्रता, सरकार की संचार रणनीति और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे विषयों पर अलग-अलग देशों, सरकारों और विशेषज्ञों के दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं। इसलिए इस मुद्दे को तथ्यों और आधिकारिक बयानों के आधार पर संतुलित रूप से समझना आवश्यक है।

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