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मोदी से हाथ मिलाने का मौका गंवाया, अब फोन तक नहीं उठता'—पाक मंत्री का बड़ा दावा

 


भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों को लेकर पाकिस्तान के भीतर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विशेष सलाहकार राणा सनाउल्लाह खान ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में भारत के साथ संबंधों को लेकर कई अहम बातें कहीं। उन्होंने स्वीकार किया कि अतीत में पाकिस्तान से ऐसी कूटनीतिक गलतियां हुईं, जिनका खामियाजा आज पूरा देश भुगत रहा है।

राणा सनाउल्लाह ने विशेष रूप से वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अचानक लाहौर दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय यदि पाकिस्तान ने उस अवसर का सही तरीके से लाभ उठाया होता, तो दोनों देशों के रिश्ते आज अलग दिशा में हो सकते थे। उनके इस बयान को पाकिस्तान के भीतर आत्ममंथन के रूप में देखा जा रहा है।

2015 का लाहौर दौरा फिर चर्चा में

25 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक अफगानिस्तान से लौटते समय लाहौर पहुंचे थे। वहां उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की थी। यह दौरा दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था।

राणा सनाउल्लाह ने कहा कि उस समय पाकिस्तान के भीतर घरेलू राजनीति इतनी हावी हो गई कि शांति की संभावनाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा सका। उन्होंने संकेत दिया कि राजनीतिक विरोध और आंतरिक मतभेदों ने उस सकारात्मक माहौल को खत्म कर दिया, जो भारत और पाकिस्तान के बीच नए रिश्तों की शुरुआत कर सकता था।

उनका कहना था कि यदि उस समय राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जाती, तो आज दोनों देशों के संबंध कहीं अधिक स्थिर और सकारात्मक हो सकते थे।

घरेलू राजनीति बनी सबसे बड़ी बाधा

राणा सनाउल्लाह के अनुसार, पाकिस्तान में कई बार विदेश नीति घरेलू राजनीतिक संघर्षों का शिकार बन जाती है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे महत्वपूर्ण पड़ोसी देश के साथ संबंधों को लेकर राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सत्ता परिवर्तन, राजनीतिक अस्थिरता और विभिन्न संस्थाओं के बीच मतभेदों का सीधा असर विदेश नीति पर पड़ा। परिणामस्वरूप, दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी लगातार बढ़ती गई।

क्या अब भी जारी है बैकचैनल कूटनीति?

अपने इंटरव्यू में राणा सनाउल्लाह ने एक और महत्वपूर्ण दावा किया। उन्होंने कहा कि भले ही दोनों देशों के बीच औपचारिक वार्ता लंबे समय से बंद हो, लेकिन बैकचैनल डिप्लोमेसी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

उनके अनुसार, कई बार ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर पर्दे के पीछे बातचीत होती रहती है, जिनका सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया जाता। उन्होंने नवाज शरीफ के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भी क्षेत्रीय शांति स्थापित करने के लिए कई स्तरों पर संवाद की कोशिशें की गई थीं।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों के कारण वे प्रयास सफल नहीं हो सके।

आर्थिक संकट पर भी किया बड़ा खुलासा

राणा सनाउल्लाह ने यह भी स्वीकार किया कि भारत के साथ लगातार खराब होते संबंधों का असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।

उन्होंने कहा कि यदि दोनों देशों के बीच व्यापार सामान्य रहता, तो पाकिस्तान को आर्थिक रूप से काफी लाभ मिल सकता था। सीमा पार व्यापार बढ़ने से उद्योग, रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा होते।

उन्होंने माना कि वर्तमान समय में पाकिस्तान गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से लगातार वित्तीय सहायता लेने की आवश्यकता और विदेशी कर्जों पर बढ़ती निर्भरता देश की आर्थिक स्थिति को दर्शाती है।

उनका कहना था कि बेहतर पड़ोसी संबंध आर्थिक विकास के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

भारत-पाक व्यापार पर पड़ा असर

भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार कभी हजारों करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका था। हालांकि, समय के साथ दोनों देशों के राजनीतिक संबंध खराब होने लगे और व्यापारिक गतिविधियां भी प्रभावित होती चली गईं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यापारिक संबंध सामान्य रहते, तो दोनों देशों के उद्योगों, किसानों और उपभोक्ताओं को लाभ मिल सकता था। लेकिन सुरक्षा और राजनीतिक कारणों से व्यापार लगभग ठप हो गया।

राणा सनाउल्लाह के बयान को इसी संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

भारत का रुख अब भी स्पष्ट

फिलहाल भारत सरकार की ओर से राणा सनाउल्लाह के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

भारत लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का रुख यह रहा है कि किसी भी सार्थक संवाद के लिए सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आतंकवाद के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और पाकिस्तान से जुड़े विभिन्न मामलों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है।

क्या बदल रही है पाकिस्तान की सोच?

राणा सनाउल्लाह का बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान आर्थिक चुनौतियों, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के भीतर अब यह चर्चा तेज हो रही है कि क्षेत्रीय शांति और आर्थिक विकास के लिए पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध आवश्यक हैं।

हालांकि केवल सार्वजनिक बयान पर्याप्त नहीं माने जाते। दोनों देशों के संबंधों में वास्तविक सुधार के लिए ठोस और भरोसेमंद कदम उठाना जरूरी होगा।

विशेषज्ञों की राय

विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि भारत और पाकिस्तान के संबंध केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही नहीं, बल्कि सुरक्षा, आतंकवाद, सीमा विवाद और आपसी विश्वास जैसे कई जटिल मुद्दों से भी जुड़े हुए हैं।

उनके अनुसार, यदि भविष्य में किसी प्रकार की वार्ता होती भी है, तो उसके लिए दोनों पक्षों को विश्वास बहाली के उपाय करने होंगे। केवल बयानबाजी से स्थायी समाधान संभव नहीं माना जाता।

पाकिस्तान के भीतर बढ़ रहा आत्ममंथन

राणा सनाउल्लाह के बयान को पाकिस्तान के भीतर बदलते राजनीतिक विमर्श के रूप में भी देखा जा रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक कठिनाइयों और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।

हालांकि यह भी सच है कि पाकिस्तान की विदेश नीति कई संस्थागत और राजनीतिक कारकों से प्रभावित होती रही है। ऐसे में किसी एक नेता का बयान भविष्य की नीति का संकेत अवश्य हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।

आगे क्या होगा?

भारत और पाकिस्तान के संबंधों का भविष्य कई महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर करेगा। यदि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के प्रयास होते हैं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान खोजा जाता है, तो भविष्य में संवाद की संभावनाएं बन सकती हैं।

फिलहाल दोनों देशों के आधिकारिक संबंध सीमित हैं और किसी नई वार्ता की घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में राणा सनाउल्लाह का यह बयान राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा का विषय जरूर बन गया है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार राणा सनाउल्लाह खान का यह स्वीकार करना कि अतीत की कूटनीतिक गलतियों ने देश को नुकसान पहुंचाया, एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बयान माना जा रहा है। उन्होंने 2015 के लाहौर दौरे को गंवाया हुआ अवसर बताया और यह भी स्वीकार किया कि भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों का असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।

हालांकि भारत की ओर से अभी तक इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। भविष्य में दोनों देशों के संबंध किस दिशा में जाएंगे, यह आने वाले समय की राजनीतिक परिस्थितियों, सुरक्षा मुद्दों और आपसी विश्वास बहाली के प्रयासों पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पाकिस्तान के भीतर से उठी यह स्वीकारोक्ति दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक नई बहस को जन्म दे रही है।

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