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परमाणु केंद्र पर 'बहुत भारी हमला'! ट्रंप की चेतावनी के बाद दुनिया की बढ़ी धड़कनें

 


वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बेहद सख्त बयान दिया है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका जल्द ही ईरान के नतांज (Natanz) परमाणु केंद्र से जुड़े क्षेत्र पर "बहुत भारी हमला" करेगा। उनके इस बयान ने मध्य पूर्व में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं भी गहरा गई हैं।

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका लगातार आरोप लगा रहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए संवेदनशील उपकरणों और यूरेनियम संवर्धन से जुड़ी गतिविधियों को सुरक्षित भूमिगत ठिकानों में स्थानांतरित कर रहा है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि नतांज परमाणु केंद्र के पास स्थित पिकएक्स माउंटेन परिसर (Pickaxe Mountain Complex) में बड़ी संख्या में सेंट्रीफ्यूज मशीनें स्थापित की गई हैं, जिनका उपयोग यूरेनियम संवर्धन के लिए किया जा सकता है।

ट्रंप ने क्या कहा?

पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका उस क्षेत्र पर "बहुत जल्द और बहुत भारी हमला" करेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर पाएगा।

जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान जवाबी कार्रवाई कर सकता है, तो ट्रंप ने कहा कि यदि उन्हें लगता कि ईरान प्रभावी जवाब दे सकता है, तो वह सार्वजनिक रूप से ऐसी सैन्य कार्रवाई की चर्चा ही नहीं करते।

हालांकि ट्रंप ने संभावित सैन्य अभियान की कोई निश्चित तारीख, समय या विस्तृत रणनीति सार्वजनिक नहीं की। इसके बावजूद उनका बयान वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

क्यों अहम है नतांज परमाणु केंद्र?

नतांज ईरान के सबसे महत्वपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों में से एक माना जाता है। यहां वर्षों से यूरेनियम संवर्धन से जुड़ी गतिविधियां होती रही हैं।

पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की आड़ में ऐसे तकनीकी संसाधन विकसित कर रहा है, जिनका उपयोग भविष्य में परमाणु हथियार बनाने की दिशा में किया जा सकता है। दूसरी ओर ईरान लगातार यह कहता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसका लक्ष्य केवल ऊर्जा उत्पादन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान है।

इसी वजह से नतांज लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय निगरानी और विवाद का केंद्र बना हुआ है।

आखिर क्या है पिकएक्स माउंटेन परिसर?

हालिया खुफिया आकलनों के अनुसार, पश्चिमी और इजरायली एजेंसियों को आशंका है कि ईरान ने यूरेनियम संवर्धन में उपयोग होने वाली हजारों सेंट्रीफ्यूज मशीनों को नतांज के निकट स्थित पिकएक्स माउंटेन परिसर में स्थानांतरित कर दिया है।

बताया जाता है कि यह परिसर बेहद मजबूत चट्टानों के भीतर सैकड़ों फीट की गहराई में बनाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी गहराई में बने सैन्य या परमाणु ठिकानों को पारंपरिक हवाई हमलों से नष्ट करना अत्यंत कठिन होता है।

यही कारण है कि पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ी हुई है। उनका मानना है कि यदि ईरान के अन्य परमाणु प्रतिष्ठानों को नुकसान भी पहुंचता है, तब भी इस भूमिगत परिसर के माध्यम से उसका परमाणु कार्यक्रम जारी रह सकता है।

अमेरिका क्यों बढ़ा रहा है दबाव?

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और ईरान के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं।

अमेरिका ने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं और उसके सैन्य नेटवर्क को कमजोर करने के उद्देश्य से विभिन्न कार्रवाइयों का समर्थन किया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बन रहा है और उसके परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करना आवश्यक है।

दूसरी ओर ईरान इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि उस पर लगाए गए प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून की भावना के अनुरूप नहीं हैं और उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उपयोग के लिए है।

क्या कहती है अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी?

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) पहले भी यह कह चुकी है कि ईरान ने पिकएक्स माउंटेन क्षेत्र में कुछ परमाणु गतिविधियों की योजना संबंधी जानकारी दी थी।

हालांकि एजेंसी के निरीक्षकों को अब तक इस परिसर तक पूरी और निर्बाध पहुंच नहीं मिल सकी है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने कई सवाल बने हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निरीक्षण पूरी तरह नहीं हो पाता, तो परमाणु गतिविधियों की वास्तविक स्थिति का स्वतंत्र सत्यापन कठिन हो जाता है।

पश्चिमी देशों की सबसे बड़ी चिंता

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को अत्यधिक सुरक्षित और गुप्त भूमिगत परिसरों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, तो उनकी निगरानी और भी मुश्किल हो जाती है।

ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है कि परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक सीमित है या नहीं।

इसी कारण अमेरिका, यूरोपीय देशों और इजरायल सहित कई देशों की नजर इस क्षेत्र पर बनी हुई है।

क्या बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव?

विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका किसी सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ता है, तो इसका प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा।

मध्य पूर्व पहले से ही कई संघर्षों, समुद्री सुरक्षा चुनौतियों और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। ऐसे में किसी भी बड़े सैन्य अभियान का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।

इसी वजह से दुनिया के कई देश कूटनीतिक समाधान और बातचीत पर जोर देते रहे हैं।

ईरान की ओर से फिलहाल नहीं आई प्रतिक्रिया

ट्रंप के ताजा बयान के बाद ईरान की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

हालांकि अतीत में ईरान कई बार स्पष्ट कर चुका है कि वह अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े किसी भी खतरे का जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है।

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में तेहरान की आधिकारिक प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कूटनीतिक पहल इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय कर सकती है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि सार्वजनिक बयान और वास्तविक सैन्य कार्रवाई दो अलग-अलग बातें होती हैं। किसी भी संभावित अभियान से पहले सैन्य, कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई पहलुओं पर विचार किया जाता है।

वे यह भी मानते हैं कि मौजूदा हालात में बयानबाजी के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयास भी जारी रह सकते हैं और अंतिम निर्णय परिस्थितियों के अनुसार लिया जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नतांज परमाणु केंद्र को लेकर दिए गए सख्त बयान ने एक बार फिर अमेरिका-ईरान तनाव को वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है। नतांज और पिकएक्स माउंटेन परिसर को लेकर पश्चिमी देशों की चिंताएं लगातार बनी हुई हैं, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता रहा है। फिलहाल किसी संभावित सैन्य कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि या समय-सीमा सामने नहीं आई है, लेकिन इस घटनाक्रम पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की भूमिका और दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रियाएं इस विवाद की अगली दिशा तय करेंगी।

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