सामने वाला ले जम्हाई और आपको भी आ जाए उबासी! आखिर क्यों होता है ऐसा? वैज्ञानिकों ने बताया दिमाग का हैरान कर देने वाला राज
नई दिल्ली: क्या आपने कभी गौर किया है कि जैसे ही आपके सामने बैठा कोई व्यक्ति जम्हाई लेता है, कुछ ही सेकंड में आपको भी उबासी आने लगती है? कई बार ऐसा परिवार के किसी सदस्य, दोस्त, सहकर्मी या यहां तक कि मोबाइल पर वीडियो देखते समय भी हो जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए सामने वाले व्यक्ति का आपके बिल्कुल पास होना भी जरूरी नहीं है। किसी को सिर्फ जम्हाई लेते हुए देखना या उसके बारे में पढ़ना भी कई लोगों में उबासी की प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।
अधिकांश लोग इसे महज संयोग या नींद का संकेत मानते हैं, लेकिन विज्ञान इसके पीछे कहीं अधिक रोचक कारण बताता है। वैज्ञानिक इस घटना को "कॉन्टेजियस यॉनिंग" (Contagious Yawning) यानी संक्रामक जम्हाई कहते हैं। वर्षों से वैज्ञानिक इस विषय पर शोध कर रहे हैं और अब तक हुए अध्ययनों से यह संकेत मिले हैं कि इसका संबंध केवल शरीर की थकान से नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क, सामाजिक व्यवहार और दूसरों के साथ भावनात्मक जुड़ाव से भी हो सकता है।
क्या है कॉन्टेजियस यॉनिंग?
जब किसी दूसरे व्यक्ति को जम्हाई लेते देखकर आपको भी तुरंत उबासी आने लगे, तो इस प्रक्रिया को कॉन्टेजियस यॉनिंग कहा जाता है। यह सामान्य जम्हाई से अलग होती है। सामान्य जम्हाई अक्सर थकान, नींद या बोरियत के कारण आती है, जबकि संक्रामक जम्हाई किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार को देखकर स्वतः उत्पन्न होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह इंसानों के अलावा कुछ अन्य सामाजिक प्राणियों में भी देखी गई है। चिंपैंजी, कुत्ते और कुछ अन्य जानवरों में भी ऐसी प्रतिक्रिया दर्ज की गई है। इससे वैज्ञानिकों को यह संकेत मिला कि यह केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से जुड़ी एक जटिल प्रतिक्रिया हो सकती है।
आखिर क्यों आती है दूसरे को देखकर उबासी?
वैज्ञानिकों के अनुसार इसका सबसे महत्वपूर्ण संबंध हमारे दिमाग से हो सकता है। जब हम किसी व्यक्ति को जम्हाई लेते हुए देखते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उस दृश्य को केवल देखता ही नहीं, बल्कि कई बार अनजाने में उसकी नकल करने की प्रक्रिया भी शुरू कर देता है।
यही कारण है कि कई बार बिना किसी प्रयास के हमें भी उबासी आने लगती है। यह प्रतिक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि व्यक्ति को खुद भी इसका एहसास नहीं होता कि उसने सामने वाले की नकल की है।
मिरर न्यूरॉन सिस्टम निभा सकता है अहम भूमिका
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रक्रिया में मिरर न्यूरॉन सिस्टम (Mirror Neuron System) की भूमिका हो सकती है।
मिरर न्यूरॉन ऐसे विशेष तंत्रिका कोशिकाएं मानी जाती हैं जो तब सक्रिय होती हैं जब हम कोई कार्य स्वयं करते हैं या किसी दूसरे व्यक्ति को वही कार्य करते हुए देखते हैं।
उदाहरण के लिए—
किसी को मुस्कुराते देखकर हमारा भी मुस्कुराने का मन करना।
किसी को रोते देखकर हमारी आंखें भी नम हो जाना।
किसी के हंसने पर हमें भी हंसी आ जाना।
और किसी को जम्हाई लेते देखकर खुद को भी उबासी आना।
हालांकि वैज्ञानिक अभी यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि केवल मिरर न्यूरॉन ही इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन कई शोध इसे संभावित कारण मानते हैं।
क्या सहानुभूति से भी जुड़ा है इसका रिश्ता?
इस विषय पर हुए कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि कॉन्टेजियस यॉनिंग का संबंध सहानुभूति (Empathy) से भी हो सकता है।
सहानुभूति का अर्थ है किसी दूसरे व्यक्ति की भावनाओं और अनुभवों को समझने और महसूस करने की क्षमता।
कुछ शोधों में पाया गया कि जिन लोगों में दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता अधिक होती है, उनमें संक्रामक जम्हाई की संभावना भी अधिक हो सकती है।
इसी कारण वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया कि यह प्रतिक्रिया सामाजिक जुड़ाव और भावनात्मक संबंधों का भी संकेत हो सकती है।
क्या कहते हैं वैज्ञानिक शोध?
इस विषय पर दुनिया की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं ने अध्ययन किए हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स (University of Leeds) के शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि संक्रामक जम्हाई दिमाग की सामाजिक प्रतिक्रिया से जुड़ी हो सकती है।
वहीं PLOS ONE में प्रकाशित एक अध्ययन में यह संकेत मिले कि जिन लोगों में सहानुभूति अधिक होती है, उनमें यह प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत ज्यादा देखी जा सकती है।
हालांकि सभी वैज्ञानिक अध्ययन एक जैसे निष्कर्ष नहीं देते।
ड्यूक यूनिवर्सिटी (Duke University) सहित कुछ अन्य शोधों में ऐसे स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले कि केवल सहानुभूति ही इसका मुख्य कारण है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई जैविक और मनोवैज्ञानिक कारण काम कर सकते हैं। इस विषय पर अभी भी लगातार शोध जारी है।
क्या हर व्यक्ति में होती है यह प्रतिक्रिया?
इस सवाल का जवाब है—नहीं।
हर व्यक्ति दूसरे की जम्हाई देखकर खुद उबासी नहीं लेता।
विशेषज्ञों के अनुसार—
लगभग 4 से 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह प्रतिक्रिया बहुत कम देखी जाती है।
कुछ वयस्कों में भी इसका असर बेहद कम होता है।
कुछ लोग चाहे कितनी भी बार किसी को जम्हाई लेते देखें, उन्हें कोई प्रतिक्रिया महसूस नहीं होती।
इससे यह स्पष्ट होता है कि यह प्रतिक्रिया हर व्यक्ति में समान नहीं होती।
क्या इसका मतलब है कि आपको नींद आ रही है?
अक्सर लोग मान लेते हैं कि अगर किसी दूसरे को देखकर उन्हें भी जम्हाई आने लगी है, तो इसका मतलब है कि उन्हें नींद आ रही है।
लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि यह हमेशा सही नहीं होता।
कई बार व्यक्ति पूरी तरह सतर्क और सक्रिय होता है, फिर भी सामने वाले की जम्हाई देखकर उसे उबासी आने लगती है।
ऐसे मामलों में इसका संबंध अधिकतर मस्तिष्क की सामाजिक प्रतिक्रिया से माना जाता है, न कि केवल थकान या नींद से।
क्या वीडियो देखकर भी आ सकती है उबासी?
जी हां।
कई वैज्ञानिक प्रयोगों में पाया गया है कि कुछ लोगों को केवल वीडियो में किसी व्यक्ति को जम्हाई लेते हुए देखकर भी उबासी आने लगती है।
इतना ही नहीं, कई बार किसी लेख या किताब में जम्हाई के बारे में पढ़ते समय भी लोगों को उबासी महसूस होने लगती है।
इससे पता चलता है कि हमारा मस्तिष्क केवल वास्तविक दृश्य ही नहीं, बल्कि कल्पना और मानसिक चित्रों पर भी प्रतिक्रिया दे सकता है।
क्या यह कोई बीमारी है?
बिल्कुल नहीं।
संक्रामक जम्हाई पूरी तरह सामान्य और प्राकृतिक प्रतिक्रिया मानी जाती है।
यह किसी बीमारी का संकेत नहीं है।
हालांकि यदि किसी व्यक्ति को अत्यधिक और लगातार जम्हाई आती रहे, चाहे वह किसी को देखकर न भी हो, तो वह किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय सलाह लेना उचित रहता है।
वैज्ञानिक अभी भी खोज रहे हैं जवाब
हालांकि संक्रामक जम्हाई पर काफी शोध हो चुके हैं, लेकिन वैज्ञानिक अभी तक इसके पीछे एकमात्र कारण तय नहीं कर पाए हैं।
कुछ विशेषज्ञ इसे सामाजिक व्यवहार से जोड़ते हैं।
कुछ इसे मिरर न्यूरॉन सिस्टम से संबंधित मानते हैं।
कुछ शोध इसे सहानुभूति से जोड़ते हैं, जबकि कुछ अध्ययनों में इन निष्कर्षों की पुष्टि नहीं हो सकी।
यानी यह विषय अभी भी वैज्ञानिक अनुसंधान का हिस्सा बना हुआ है।
दूसरे व्यक्ति को जम्हाई लेते देखकर खुद को भी उबासी आ जाना कोई साधारण संयोग नहीं, बल्कि इंसानी मस्तिष्क की एक बेहद रोचक और जटिल प्रतिक्रिया हो सकती है। वैज्ञानिक इसे कॉन्टेजियस यॉनिंग कहते हैं और मानते हैं कि इसका संबंध हमारे सामाजिक व्यवहार, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और दूसरों के साथ भावनात्मक जुड़ाव से हो सकता है।
हालांकि इस विषय पर अभी भी शोध जारी है और सभी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं, लेकिन इतना तय है कि यह इंसानी दिमाग की उन दिलचस्प प्रक्रियाओं में से एक है, जो आज भी वैज्ञानिकों को नए सवालों और नए उत्तरों की ओर ले जा रही है।

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