Video: सुप्रीम कोर्ट में मचा हंगामा! CJI को दी गालियां, कोर्ट में उड़ाए कागज़... फिर भी क्यों नहीं हुई कार्रवाई?
नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने अदालत की कार्यवाही के दौरान मौजूद सभी लोगों को हैरान कर दिया। एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान न केवल न्यायाधीशों के सामने असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया, बल्कि कोर्टरूम में कागज़ भी हवा में उछाल दिए और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उनके खिलाफ तत्काल अवमानना या अन्य दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
यह घटना अब न्यायपालिका की गरिमा, अदालत में आचरण और मानसिक स्थिति से जुड़े मानवीय पहलुओं को लेकर चर्चा का विषय बन गई है।
सुनवाई के दौरान अचानक बदला माहौल
मामला उस समय सामने आया जब एक व्यक्ति स्वयं अपनी ओर से याचिकाकर्ता के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ। सामान्य रूप से अदालत में याचिकाकर्ता या उसके वकील को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है, लेकिन इस मामले में स्थिति पूरी तरह अलग हो गई।
बताया गया कि संबंधित व्यक्ति ने अपने मामले से जुड़े तथ्यों और कानूनी दलीलों को रखने के बजाय न्यायाधीशों के खिलाफ ही सवाल उठाने शुरू कर दिए। इतना ही नहीं, उसने अदालत से जजों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की मांग भी कर डाली।
जजों को ही FIR कराने का दिया आदेश!
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता बार-बार यह कहता रहा कि न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उसने अदालत से ऐसी मांगें रखीं जिनका उसके मूल मामले से कोई सीधा संबंध नहीं था।
जब पीठ ने उसे कानूनी प्रक्रिया के अनुसार अपना पक्ष रखने के लिए कहा, तब भी वह शांत नहीं हुआ। इसके बाद उसने अदालत के भीतर मौजूद दस्तावेज हवा में उछाल दिए और अदालत की गरिमा के विपरीत व्यवहार किया।
CJI के खिलाफ की आपत्तिजनक टिप्पणी
स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब याचिकाकर्ता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक और असंसदीय शब्दों का प्रयोग किया।
अदालत में इस तरह का व्यवहार सामान्य परिस्थितियों में अवमानना की कार्रवाई का आधार बन सकता है। कोर्टरूम में अनुशासन बनाए रखना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
हालांकि, इस मामले में पीठ ने अलग दृष्टिकोण अपनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित व्यक्ति ने अपने मामले को कानूनी तरीके से प्रस्तुत करने के बजाय बेतुकी और असंसदीय बातें कहीं।
मदर ऑफ डेमोक्रेसी की न्यायपालिका में यह क्या हो रहा है? pic.twitter.com/RAVEzrRZVK
— Wasim Akram Tyagi (@WasimAkramTyagi) July 10, 2026
पीठ ने आदेश में कहा:
"प्रबल प्रताप, जो स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में उपस्थित हुए थे, उन्होंने अपने मामले को प्रस्तुत करने के बजाय बेतुकी और असंसदीय बातें कहीं। हालांकि, उनकी स्थिति को देखते हुए हम उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने का इरादा नहीं रखते हैं।"
इसके साथ ही अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अदालत में इस तरह का व्यवहार हुआ, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की कार्रवाई क्यों नहीं की?
पीठ के आदेश से संकेत मिलता है कि न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ता की परिस्थितियों और उसकी मानसिक या व्यक्तिगत स्थिति को ध्यान में रखते हुए संयम बरतना उचित समझा। अदालत ने माना कि दंडात्मक कार्रवाई के बजाय मामले को समाप्त करना अधिक उपयुक्त होगा।
हालांकि आदेश में उसकी स्थिति का विस्तृत विवरण सार्वजनिक रूप से नहीं दिया गया।
अदालत में अनुशासन का क्या महत्व है?
भारतीय न्यायपालिका में अदालत की गरिमा सर्वोच्च मानी जाती है। किसी भी पक्षकार, वकील या अन्य व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायालय की कार्यवाही के दौरान मर्यादित भाषा और शिष्ट आचरण बनाए रखे।
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर अदालत का अपमान करता है या न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि प्रत्येक मामले में अदालत परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेती है।
अदालत का संयम भी चर्चा में
कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायपालिका के धैर्य और संयम का उदाहरण भी माना जा सकता है। अदालत ने उकसावे की स्थिति में भी तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं की और मामले को शांतिपूर्वक समाप्त किया।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने
— News Pinch (@TheNewspinch) July 10, 2026
पेपर उड़ाए, CJI को गाली दी
Supreme Court में एक याचिकाकर्ता पहुंचा, जो जजों को ही FIR दायर करने के लिए ऑर्डर देने लगा. शख़्स यहीं नहीं रुका, उसने हवा में कागज़ उड़ाए और CJI को गालियां दीं.
हालांकि, बेंच ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और… pic.twitter.com/2jy4aO0Icj
दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत की गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में कड़ा संदेश देना भी आवश्यक होता है। इसलिए इस आदेश को लेकर कानूनी हलकों में अलग-अलग राय सामने आ सकती है।
सोशल मीडिया पर भी चर्चा
घटना की जानकारी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने अदालत के धैर्य की सराहना की, जबकि कुछ ने सवाल उठाया कि अदालत में इस प्रकार के व्यवहार को कैसे संभाला जाना चाहिए।
हालांकि, सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं से अलग, न्यायालय का आदेश ही इस मामले में आधिकारिक स्थिति माना जाएगा।
क्या है पूरा निष्कर्ष?
सुप्रीम कोर्ट में हुई इस असामान्य घटना ने एक बार फिर यह दिखाया कि न्यायपालिका केवल कानून के आधार पर ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों और मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रखकर निर्णय लेती है।
याचिकाकर्ता ने अदालत में कागज़ उड़ाए, न्यायाधीशों के खिलाफ टिप्पणी की और मुख्य न्यायाधीश के लिए कथित रूप से अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कठोर कार्रवाई करने के बजाय उसकी याचिका खारिज कर दी और अपने आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित व्यक्ति की स्थिति को देखते हुए उसके खिलाफ आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
नोट: यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न्यायालय के आदेश और सामने आई जानकारी पर आधारित है। याचिकाकर्ता की मानसिक या चिकित्सीय स्थिति के संबंध में कोई स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है; अदालत ने केवल अपने आदेश में उनकी "स्थिति" का उल्लेख करते हुए कार्रवाई न करने का निर्णय दर्ज किया है।

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