मौत से पहले मध्य पूर्व में 'महाडील' की तैयारी! सऊदी-इजरायल समझौते के लिए सक्रिय थे अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम, रिपोर्ट में बड़ा दावा
वॉशिंगटन/तेल अवीव: अमेरिकी राजनीति और विदेश नीति में लंबे समय तक प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम अपने जीवन के अंतिम हफ्तों में मध्य पूर्व की सबसे बड़ी कूटनीतिक पहलों में से एक पर काम कर रहे थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहम की प्राथमिकता सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य (Normalization) बनाने की दिशा में नई पहल शुरू करना था। उनका मानना था कि ईरान के साथ हालिया टकराव के बाद क्षेत्रीय परिस्थितियां ऐसी बन रही हैं, जिनका उपयोग कर एक ऐतिहासिक समझौता कराया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहम का विश्वास था कि यदि सही समय पर अमेरिका सक्रिय भूमिका निभाए, तो यह समझौता न केवल मध्य पूर्व की राजनीति बदल सकता है बल्कि क्षेत्र में नई रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत भी कर सकता है।
कई वर्षों से कर रहे थे प्रयास
लिंडसे ग्राहम लंबे समय से इजरायल और सऊदी अरब के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने के समर्थक रहे थे। बताया गया है कि उन्होंने इस दिशा में पहले बाइडेन प्रशासन के दौरान भी प्रयास किए थे और बाद में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में भी इस पहल को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी रखी।
उनका मानना था कि यदि सऊदी अरब और इजरायल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हो जाते हैं, तो इससे पूरे मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन बदल सकता है और ईरान के प्रभाव को चुनौती मिल सकती है।
ईरान युद्ध के बाद नया अवसर
रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहम का आकलन था कि ईरान के साथ हालिया संघर्ष के बाद एक नई कूटनीतिक स्थिति बनी है। उनका विचार था कि इस माहौल का उपयोग करके अमेरिका, इजरायल और अरब देशों के बीच व्यापक समझौते की दिशा में काम कर सकता है।
बताया गया है कि उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी इस विषय पर कई दौर की चर्चा की थी। उनका सुझाव था कि इजरायल में प्रस्तावित चुनाव और अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के बाद तेज कूटनीतिक प्रयास शुरू किए जाएं ताकि नई अमेरिकी कांग्रेस के शपथ लेने से पहले समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सके।
मई में शुरू हुई थी चर्चा
रिपोर्ट के अनुसार, मई के मध्य में ग्राहम ने ट्रंप के साथ इस योजना पर गंभीर बातचीत शुरू की थी।
उन्होंने सुझाव दिया कि ईरान युद्ध के "अगले दिन" अमेरिका का मुख्य ध्यान क्षेत्रीय शांति और सऊदी-इजरायल संबंधों को सामान्य बनाने पर होना चाहिए।
बताया जाता है कि इसके कुछ समय बाद ट्रंप ने अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से भी इजरायल के साथ संबंध सुधारने की अपील की थी, बशर्ते ईरान के साथ तनाव कम करने की दिशा में प्रगति हो।
कई प्रमुख नेताओं से संपर्क
रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहम ने हाल के सप्ताहों में इस पहल को लेकर कई प्रमुख नेताओं और अधिकारियों से बातचीत की थी।
इनमें शामिल बताए गए—
ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के करीबी सहयोगी रॉन डर्मर
अमेरिका में सऊदी अरब की राजदूत रीमा बिंत बंदर अल सऊद
सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान
बताया गया है कि इन चर्चाओं का उद्देश्य संभावित समझौते की रूपरेखा तैयार करना और विभिन्न पक्षों की सहमति सुनिश्चित करना था।
अगस्त में प्रस्तावित था दौरा
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहम अगस्त में इजरायल और सऊदी अरब का दौरा भी करने वाले थे।
इस यात्रा का उद्देश्य यह आकलन करना था कि क्या दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार हैं और क्या सितंबर से औपचारिक वार्ता शुरू की जा सकती है।
साथ ही वे ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर इजरायली नेतृत्व को यह संदेश देना चाहते थे कि अमेरिका इस समझौते को अपनी प्राथमिकता मानता है।
सबसे बड़ी बाधा बना फिलिस्तीन मुद्दा
हालांकि इस पूरी पहल के सामने सबसे बड़ी चुनौती फिलिस्तीन का प्रश्न माना जा रहा है।
सऊदी अरब लंबे समय से यह कहता रहा है कि इजरायल के साथ किसी भी औपचारिक समझौते के लिए फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में एक स्पष्ट, विश्वसनीय और समयबद्ध प्रक्रिया जरूरी है।
रियाद का रुख रहा है कि केवल कूटनीतिक संबंध स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि फिलिस्तीनी मुद्दे पर ठोस प्रगति भी आवश्यक है।
नेतन्याहू सरकार की अलग सोच
रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के मौजूदा राजनीतिक गठबंधन ने फिलिस्तीनी राज्य को लेकर सऊदी अरब की प्रमुख शर्त को स्वीकार नहीं किया है।
यही कारण है कि किसी संभावित समझौते की राह अभी भी आसान नहीं मानी जा रही।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में इजरायल में नई सरकार बनती है, तभी इस विषय पर किसी नए राजनीतिक समझौते की संभावना बढ़ सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि सऊदी अरब और इजरायल के बीच औपचारिक संबंध स्थापित होते हैं, तो इसके कई बड़े प्रभाव हो सकते हैं—
मध्य पूर्व की क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव।
सुरक्षा और रक्षा सहयोग में वृद्धि।
व्यापार, निवेश और तकनीकी साझेदारी के नए अवसर।
अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति को मजबूती।
ईरान के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश।
हालांकि इसके साथ ही फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान की दिशा में ठोस प्रगति की आवश्यकता भी बनी रहेगी।
ग्राहम की विदेश नीति में विशेष भूमिका
लिंडसे ग्राहम अमेरिकी विदेश नीति के सबसे सक्रिय नेताओं में गिने जाते थे।
वे लंबे समय से—
इजरायल के मजबूत समर्थक,
यूक्रेन की सहायता के पक्षधर,
और ईरान के खिलाफ कड़े रुख के समर्थक रहे।
मध्य पूर्व से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी सक्रिय भूमिका रही और वे अक्सर अमेरिकी प्रशासन को क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सलाह देते थे।
आगे क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि ग्राहम की अनुपस्थिति के बाद यह पहल पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, लेकिन उनकी गैरमौजूदगी निश्चित रूप से इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रशासन और विदेश नीति से जुड़े अन्य वरिष्ठ नेता इस प्रस्तावित पहल को आगे बढ़ाते हैं या नहीं।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि सऊदी अरब और इजरायल फिलिस्तीन मुद्दे पर किसी साझा समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कितने तैयार हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम अपने अंतिम दिनों तक सऊदी अरब और इजरायल के बीच ऐतिहासिक संबंध सामान्यीकरण समझौते की दिशा में सक्रिय थे। उनका मानना था कि ईरान के साथ संघर्ष के बाद बनी नई भू-राजनीतिक परिस्थितियां इस समझौते के लिए अवसर पैदा कर सकती हैं। हालांकि फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना से जुड़ी सऊदी शर्त और इजरायल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति अब भी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
यदि भविष्य में यह समझौता होता है, तो इसे मध्य पूर्व की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक माना जा सकता है। फिलहाल यह पहल संभावनाओं और जटिल चुनौतियों—दोनों के बीच खड़ी दिखाई देती है।

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