क्या दुनिया अब तक गलत इतिहास पढ़ती रही? विदेशी इतिहासकार के दावे ने सभ्यता की शुरुआत पर छेड़ दी नई बहस
दुनिया के इतिहास की सबसे चर्चित बहसों में से एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। सदियों से इतिहास की पुस्तकों में यह पढ़ाया जाता रहा है कि मानव सभ्यता की शुरुआत मेसोपोटामिया से हुई, जिसे आज का आधुनिक इराक माना जाता है। लेकिन अब एक विदेशी समुद्री इतिहासकार (Maritime Historian) निक कॉलिंस ने इस स्थापित धारणा को चुनौती देते हुए दावा किया है कि सभ्यता की वास्तविक शुरुआत भारत से हुई थी, न कि मेसोपोटामिया से।
निक कॉलिंस के इस दावे ने इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं के बीच नई बहस छेड़ दी है। हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह एक इतिहासकार का शोध-आधारित दृष्टिकोण है। इसे वैश्विक इतिहास समुदाय द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं किया गया है और इस विषय पर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत मौजूद हैं।
'मेसोपोटामिया नहीं, भारत था सभ्यता का पालना'
निक कॉलिंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि "मेसोपोटामिया कभी भी सभ्यता का पालना नहीं था, भारत था।"
उन्होंने अपने विस्तृत लेख में तर्क दिया कि पश्चिमी इतिहास लेखन ने लंबे समय तक मेसोपोटामिया को मानव सभ्यता का प्रारंभिक केंद्र माना, जबकि भारतीय उपमहाद्वीप में उससे भी अधिक विकसित शहरी व्यवस्था, व्यापारिक नेटवर्क और तकनीकी उपलब्धियों के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।
उनका कहना है कि यदि उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों को व्यापक दृष्टि से देखा जाए, तो कहानी बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
भारत के विकसित शहरों का दिया उदाहरण
कॉलिंस का दावा है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता केवल कुछ शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह विशाल शहरी नेटवर्क था।
उन्होंने जिन विशेषताओं का उल्लेख किया, उनमें शामिल हैं—
एक समान आकार की पकी हुई ईंटें
वैज्ञानिक ढंग से बनी ग्रिड-पैटर्न वाली सड़कें
घरों में स्नानगृह
ढकी हुई जल निकासी प्रणाली
मानकीकृत बाट और माप
बड़े पैमाने पर विनिर्माण
दूर-दराज तक फैला व्यापार
उनका कहना है कि इतनी व्यवस्थित नगरीय योजना उस समय विश्व के अधिकांश हिस्सों में देखने को नहीं मिलती थी।
लोथल को बताया सबसे बड़ा सबूत
निक कॉलिंस के तर्क का सबसे महत्वपूर्ण आधार गुजरात स्थित लोथल है।
लोथल सिंधु सभ्यता का एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल माना जाता है। यहां मिले विशाल ईंटों से बने ढांचे को भारतीय पुरातत्वविद लंबे समय से एक संभावित प्राचीन डॉकयार्ड (बंदरगाह) मानते रहे हैं।
कॉलिंस का दावा है कि यह केवल पानी का कुंड या स्नान स्थल नहीं था, बल्कि अत्यंत विकसित समुद्री बंदरगाह था, जहां बड़े व्यापारिक जहाज आ-जा सकते थे।
उनका कहना है कि यदि यह व्याख्या सही है, तो यह दुनिया के सबसे प्राचीन ज्ञात समुद्री बंदरगाहों में से एक हो सकता है।
'यूरोप में हजारों वर्षों तक ऐसा कुछ नहीं था'
कॉलिंस का तर्क है कि लोथल जैसी समुद्री संरचना उस समय दुनिया के अन्य हिस्सों, विशेषकर यूरोप में, कई हजार वर्षों तक देखने को नहीं मिली।
उनके अनुसार यह इस बात का संकेत हो सकता है कि प्राचीन भारत समुद्री व्यापार और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अत्यंत उन्नत था।
हालांकि इस विषय पर भी सभी विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं और लोथल की संरचना की व्याख्या को लेकर अकादमिक जगत में विभिन्न मत मौजूद हैं।
मेसोपोटामिया तक पहुंचता था भारतीय व्यापार
अपने अध्ययन में कॉलिंस ने प्राचीन व्यापारिक नेटवर्क पर विशेष जोर दिया है।
उनके अनुसार सिंधु सभ्यता से—
कार्नेलियन (लाल पत्थर) के मनके,
कपास,
लकड़ी,
आभूषण,
समुद्री मार्गों के जरिए मेसोपोटामिया तक पहुंचते थे।
इतिहास में सुमेरियन अभिलेखों में "मेलुहा" नाम का उल्लेख मिलता है, जिसे कई विद्वान सिंधु सभ्यता से जोड़ते हैं। कॉलिंस का कहना है कि यह भारत और मेसोपोटामिया के बीच सक्रिय व्यापारिक संबंधों का संकेत देता है।
40 वर्षों के समुद्री अनुभव के बाद किया अध्ययन
निक कॉलिंस ने बताया कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग उद्योग में लगभग चार दशक तक काम किया।
उनके अनुसार उन्होंने किसी पूर्व निर्धारित निष्कर्ष को साबित करने की कोशिश नहीं की, बल्कि जहाजों, व्यापारिक मार्गों और वस्तुओं की आवाजाही के उपलब्ध प्रमाणों का अध्ययन किया।
उनका दावा है कि इन साक्ष्यों ने उन्हें बार-बार भारतीय उपमहाद्वीप की ओर संकेत किया।
क्यों मेसोपोटामिया को पहले मिला महत्व?
कॉलिंस का कहना है कि पश्चिमी इतिहास लेखन में मेसोपोटामिया को प्राथमिकता मिलने के पीछे ऐतिहासिक परिस्थितियां भी जिम्मेदार थीं।
उनके अनुसार—
यूरोपीय पुरातत्वविदों ने सबसे पहले वहीं व्यापक खुदाई की।
वहां की शुष्क जलवायु ने प्राचीन अवशेषों को बेहतर तरीके से संरक्षित रखा।
बाइबिल और प्राचीन पश्चिमी ग्रंथों में इस क्षेत्र का उल्लेख होने से शोधकर्ताओं का ध्यान भी वहीं अधिक गया।
तत्कालीन ओटोमन शासन ने यूरोपीय पुरातत्वविदों को खुदाई की अनुमति दी।
कॉलिंस का मानना है कि इन कारणों से मेसोपोटामिया को "सभ्यता का पालना" मानने की अवधारणा मजबूत होती चली गई।
भारत की खोज देर से हुई
उनका तर्क है कि भारत के कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों की व्यवस्थित खोज अपेक्षाकृत देर से हुई।
हड़प्पा की पहचान 19वीं सदी में हुई थी, जबकि मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में सामने आई। तब तक मेसोपोटामिया-केंद्रित इतिहास विश्वभर के पाठ्यक्रमों और शोध में स्थापित हो चुका था।
आर्य आक्रमण सिद्धांत पर भी उठाए सवाल
अपने लेख में कॉलिंस ने आर्य आक्रमण सिद्धांत पर भी सवाल उठाए हैं।
उनका कहना है कि 19वीं सदी में प्रस्तुत इस सिद्धांत के पीछे तत्कालीन यूरोपीय सोच का प्रभाव था।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ऋग्वेद में सरस्वती नदी का बार-बार उल्लेख मिलता है और उनके अनुसार वैदिक साहित्य में किसी बड़े बाहरी सैन्य आक्रमण का स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता।
हालांकि यह उल्लेख करना जरूरी है कि आर्यों की उत्पत्ति, आगमन, प्रवास और वैदिक संस्कृति की समयरेखा पर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, भाषाविदों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों के बीच आज भी विभिन्न मत हैं। इस विषय पर कोई एक सार्वभौमिक सहमति नहीं है।
इतिहासकारों की क्या है राय?
मुख्यधारा के इतिहास और पुरातत्व के अधिकांश विशेषज्ञ आज भी यह मानते हैं कि मेसोपोटामिया, मिस्र, सिंधु घाटी और चीन जैसी कई प्राचीन सभ्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग समान कालखंड में विकसित हुईं और मानव सभ्यता के विकास में सभी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
कई विद्वान यह भी मानते हैं कि किसी एक क्षेत्र को "सभ्यता का एकमात्र जन्मस्थान" कहना विषय को अत्यधिक सरल बना देता है, जबकि वास्तविक इतिहास कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है।
नई बहस ने बढ़ाई दिलचस्पी
निक कॉलिंस के दावे ने इतिहास की दुनिया में एक नई बहस जरूर छेड़ दी है। उनके तर्क भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन उपलब्धियों और समुद्री व्यापार की भूमिका पर नए सिरे से चर्चा को प्रेरित कर रहे हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास लगातार नए पुरातात्विक साक्ष्यों, वैज्ञानिक अनुसंधानों और अकादमिक समीक्षा के आधार पर विकसित होता रहता है। इसलिए किसी भी नए दावे को व्यापक शोध, स्वतंत्र सत्यापन और विशेषज्ञों की समीक्षा के बाद ही अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष माना जा सकता है।
नोट: यह समाचार निक कॉलिंस द्वारा सार्वजनिक रूप से व्यक्त किए गए विचारों और उपलब्ध शोध-संबंधी दावों पर आधारित है। ये दावे वैश्विक अकादमिक समुदाय की सर्वसम्मत राय का प्रतिनिधित्व नहीं करते और इस विषय पर विद्वानों के बीच विभिन्न मत मौजूद हैं।

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