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मोसाद को भी नहीं लगी भनक! इजरायल के अंदर सालों से बिछा था ईरान का सीक्रेट जासूसी जाल?

 


दुनिया की सबसे चर्चित और प्रभावशाली खुफिया एजेंसियों में इजरायल की मोसाद (Mossad) का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। दशकों से मोसाद ने दुनिया के कई देशों में गुप्त ऑपरेशन चलाकर आतंकवादियों, दुश्मन एजेंटों और खतरनाक नेटवर्क को खत्म करने का दावा किया है। यही वजह है कि मोसाद को दुनिया की सबसे खतरनाक और सबसे सक्षम खुफिया एजेंसियों में गिना जाता है।

लेकिन अब एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने इजरायल की आंतरिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल के भीतर ही ऐसा जासूसी नेटवर्क सक्रिय होने का दावा किया गया है, जो ईरान के लिए काम कर रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में कथित तौर पर विदेशी नागरिक नहीं बल्कि इजरायल के ही कुछ नागरिक शामिल बताए जा रहे हैं।

रिपोर्ट के सामने आने के बाद इजरायल की सुरक्षा एजेंसियां पहले से अधिक सतर्क हो गई हैं और इस पूरे मामले की जांच को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा अहम विषय माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने कथित तौर पर वर्षों से इजरायल के भीतर रहने वाले कुछ लोगों से संपर्क स्थापित कर धीरे-धीरे अपना नेटवर्क तैयार किया। यह नेटवर्क किसी पारंपरिक जासूसी मॉडल की तरह नहीं बल्कि सोशल मीडिया, ऑनलाइन मैसेजिंग और आर्थिक लालच के जरिए विकसित किया गया बताया गया है।

दावा किया गया है कि इन लोगों का इस्तेमाल संवेदनशील जानकारियां जुटाने, सैन्य प्रतिष्ठानों की तस्वीरें लेने, अधिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखने और कुछ मामलों में विशेष मिशनों के लिए भी किया गया।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट के बाद सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियां तेज हो गई हैं।

किस समुदाय पर लगा है शक?

रिपोर्ट में जिन लोगों का उल्लेख किया गया है, उनमें कुछ मामलों में हरेदी (Haredi) यहूदी समुदाय के लोगों के नाम सामने आने की बात कही गई है।

हरेदी यहूदी समुदाय इजरायल का सबसे धार्मिक समुदाय माना जाता है। यह समुदाय यहूदी धार्मिक परंपराओं और नियमों का बेहद कठोरता से पालन करता है। धार्मिक शिक्षा इनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

बताया जाता है कि इजरायल में इस समुदाय की आबादी लगभग 14 लाख के आसपास है और आने वाले वर्षों में इसकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

हालांकि यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से जासूसी से जोड़ना उचित नहीं है। रिपोर्ट में केवल कुछ मामलों में इस समुदाय से जुड़े व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, पूरे समुदाय पर आरोप नहीं लगाया गया है।

सेना में भर्ती को लेकर पहले से रहा है विवाद

हरेदी समुदाय लंबे समय से इजरायल में अनिवार्य सैन्य सेवा का विरोध करता रहा है।

जहां अधिकांश इजरायली युवाओं के लिए सेना में सेवा देना अनिवार्य माना जाता है, वहीं हरेदी समुदाय धार्मिक अध्ययन को प्राथमिकता देता है। इसी वजह से वर्षों से सरकार और इस समुदाय के बीच सैन्य भर्ती को लेकर विवाद चलता रहा है।

कई बार इस मुद्दे पर इजरायल में बड़े विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं।

आर्थिक स्थिति भी बनी एक वजह?

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हरेदी समुदाय के कई लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं।

धार्मिक शिक्षा पर अधिक ध्यान देने के कारण समुदाय के कुछ लोगों को उच्च वेतन वाली नौकरियां नहीं मिल पातीं। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक तंगी किसी भी व्यक्ति को बाहरी ताकतों के झांसे में आने के लिए अधिक संवेदनशील बना सकती है।

हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि केवल आर्थिक कमजोरी किसी व्यक्ति को जासूस नहीं बनाती, बल्कि इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और वैचारिक कारण भी हो सकते हैं।

कैसे तैयार किया गया कथित जासूसी नेटवर्क?

रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी एजेंट आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर लोगों तक पहुंचते हैं।

बताया गया है कि कथित एजेंट फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म पर फर्जी प्रोफाइल बनाते हैं।

वे कई बार खुद को—

  • पत्रकार,

  • शोधकर्ता,

  • मीडिया प्रतिनिधि,

  • कारोबारी,

  • या किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन का सदस्य बताकर लोगों से संपर्क करते हैं।

शुरुआत में सामान्य बातचीत की जाती है ताकि सामने वाले व्यक्ति का विश्वास जीता जा सके।

जब भरोसा बन जाता है, तब बातचीत को टेलीग्राम या अन्य एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट कर दिया जाता है।

इसके बाद कथित तौर पर छोटे-छोटे काम दिए जाते हैं, जिनके बदले पैसे भी दिए जाते हैं।

कौन-कौन से काम कराए जाते हैं?

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार ऐसे मामलों में शुरुआत बेहद सामान्य कार्यों से होती है।

जैसे—

  • किसी सड़क की तस्वीर भेजना।

  • किसी इमारत का वीडियो बनाना।

  • किसी सरकारी कार्यालय की गतिविधियों पर नजर रखना।

  • किसी व्यक्ति की लोकेशन बताना।

जब व्यक्ति इन कामों को बिना संदेह के पूरा करने लगता है, तब धीरे-धीरे उससे अधिक संवेदनशील जानकारियां जुटाने की कोशिश की जाती है।

पिछले एक साल में तेजी से बढ़े मामले

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले एक वर्ष के दौरान ऐसे मामलों में तेजी आई है।

बताया गया है कि 2024 की तुलना में 2025 के दौरान ईरान के लिए कथित जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए संदिग्धों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई।

सिर्फ 2025 के दौरान ही लगभग 25 इजरायली नागरिकों के खिलाफ ईरान के लिए जासूसी करने के आरोप में मुकदमे दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।

हालांकि इन मामलों में अंतिम न्यायिक फैसला अलग-अलग मामलों में अभी भी प्रक्रिया के अधीन हो सकता है।

इजरायल की सुरक्षा एजेंसियां क्यों चिंतित हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी एजेंटों की तुलना में अपने ही देश के नागरिकों द्वारा की जाने वाली जासूसी कहीं अधिक खतरनाक होती है।

ऐसे लोग—

  • स्थानीय भाषा जानते हैं।

  • सुरक्षा व्यवस्था को समझते हैं।

  • बिना शक के संवेदनशील इलाकों तक पहुंच सकते हैं।

  • लंबे समय तक संदेह से बच सकते हैं।

यही वजह है कि इजरायल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी इस तरह के मामलों को बेहद गंभीरता से देख रही है।

ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से तनाव

ईरान और इजरायल के बीच वर्षों से राजनीतिक, सैन्य और खुफिया स्तर पर संघर्ष चलता रहा है।

दोनों देश एक-दूसरे पर साइबर हमले, गुप्त ऑपरेशन, वैज्ञानिकों की हत्या, परमाणु कार्यक्रम में हस्तक्षेप और जासूसी जैसे आरोप लगाते रहे हैं।

इसी कारण दोनों देशों के बीच खुफिया युद्ध लगातार जारी रहने की बात विशेषज्ञ समय-समय पर करते रहे हैं।

सोशल मीडिया बना नया हथियार

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आज की जासूसी पहले जैसी नहीं रही।

पहले जहां एजेंटों की भर्ती व्यक्तिगत मुलाकातों के जरिए होती थी, वहीं अब सोशल मीडिया सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है।

फर्जी पहचान, नकली प्रोफाइल, ऑनलाइन भुगतान और एन्क्रिप्टेड चैट एप्लिकेशन ने खुफिया गतिविधियों को पहले से कहीं अधिक जटिल बना दिया है।

इसी वजह से दुनिया के लगभग सभी देश अब साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया निगरानी पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक दौर में जासूसी का सबसे बड़ा हथियार तकनीक है।

यदि किसी देश के नागरिक सोशल मीडिया पर अनजान लोगों से संपर्क करते हैं, आर्थिक लालच में आ जाते हैं या बिना सत्यापन के संवेदनशील जानकारी साझा करते हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

इसी कारण सुरक्षा एजेंसियां लगातार लोगों को ऑनलाइन सतर्क रहने और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी तुरंत प्रशासन को देने की सलाह देती हैं।

द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ने इजरायल की आंतरिक सुरक्षा और ईरान के कथित जासूसी नेटवर्क को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में कई गंभीर दावे किए गए हैं, जिनकी जांच सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और अलग-अलग मामलों में न्यायिक प्रक्रिया भी जारी हो सकती है। इसके बावजूद यह मामला स्पष्ट संकेत देता है कि आधुनिक दौर में जासूसी केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भी लड़ी जा रही है। यही कारण है कि आज राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती केवल बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया के जरिए भीतर तक पहुंचने वाले गुप्त नेटवर्क भी बनते जा रहे हैं।

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