शेयर बाजार में मचा हाहाकार! कुछ ही मिनटों में निवेशकों के ₹3.58 लाख करोड़ स्वाहा, जानिए आखिर क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट
भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार की सुबह निवेशकों के लिए बेहद निराशाजनक साबित हुई। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन बाजार खुलते ही भारी बिकवाली देखने को मिली, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में कारोबार करने लगे। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 800 से अधिक अंक टूटकर 75,535 के स्तर तक पहुंच गया, जबकि निफ्टी 50 लगभग 250 अंक गिरकर 23,619 के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया।
इस तेज गिरावट का असर सिर्फ बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी जबरदस्त दबाव देखने को मिला, जहां दोनों प्रमुख सूचकांक करीब 1 प्रतिशत तक फिसल गए। बाजार खुलने के कुछ ही मिनटों में निवेशकों की संपत्ति में लगभग 3.58 लाख करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई, जिसने पूरे बाजार का माहौल चिंताजनक बना दिया।
शुरुआती कारोबार में बाजार पर भारी दबाव
शुक्रवार को जैसे ही बाजार खुला, अधिकांश सेक्टरों में बिकवाली शुरू हो गई। बैंकिंग, ऑटो, आईटी, मेटल, रियल्टी और एनर्जी सेक्टर के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली। निवेशकों ने जोखिम कम करने के लिए बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली और बिकवाली की, जिससे बाजार लगातार नीचे जाता रहा।
विश्लेषकों का कहना है कि इस गिरावट के पीछे केवल घरेलू कारण नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी परिस्थितियों ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है।
कुछ ही मिनटों में ₹3.58 लाख करोड़ की संपत्ति घटी
गुरुवार, 23 जुलाई को बाजार बंद होने के बाद बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप लगभग 4,76,60,985.926 करोड़ रुपये था। शुक्रवार सुबह बाजार खुलने के कुछ ही समय बाद यह घटकर 4,73,02,449.65 करोड़ रुपये रह गया।
इस प्रकार शुरुआती कारोबार में ही कुल मार्केट कैप में लगभग 3,58,536.276 करोड़ रुपये की गिरावट दर्ज की गई। इसका सीधा असर उन लाखों निवेशकों पर पड़ा जिनके पोर्टफोलियो में इक्विटी निवेश मौजूद है।
हालांकि बाजार में शुरुआती गिरावट का मतलब हमेशा स्थायी नुकसान नहीं होता, क्योंकि कारोबार के दौरान परिस्थितियों के अनुसार सूचकांक ऊपर-नीचे होते रहते हैं। फिर भी इतनी बड़ी शुरुआती गिरावट निवेशकों के मनोबल पर असर डालती है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल बना सबसे बड़ा कारण
शेयर बाजार पर दबाव बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी मानी जा रही है।
ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से भारत जैसे देशों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ सकती है।
परिवहन खर्च बढ़ सकता है।
कंपनियों की उत्पादन लागत में वृद्धि हो सकती है।
महंगाई दर पर दबाव बन सकता है।
सरकार का आयात बिल बढ़ सकता है।
इन सभी कारणों से निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया और बाजार में बिकवाली बढ़ गई।
पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ा रहा वैश्विक चिंता
दूसरा बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव लगातार वैश्विक बाजारों पर असर डाल रहा है। क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और संभावित संघर्ष की आशंका ने निवेशकों को जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाने के लिए मजबूर किया है।
जब भी दुनिया के किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तब निवेशक आमतौर पर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इसका असर शेयर बाजारों पर नकारात्मक रूप में दिखाई देता है।
यदि आने वाले दिनों में यह तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी से बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी 10 वर्षीय बॉन्ड यील्ड में आई बढ़ोतरी भी भारतीय बाजार पर दबाव का एक प्रमुख कारण है।
जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तब विदेशी निवेशकों को वहां निवेश अधिक सुरक्षित और आकर्षक दिखाई देता है।
ऐसी स्थिति में विदेशी संस्थागत निवेशक उभरते हुए बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करना पसंद कर सकते हैं।
यदि विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ती है तो भारतीय शेयर बाजार पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
इसी आशंका के कारण शुक्रवार को बाजार खुलते ही निवेशकों ने सतर्कता दिखाई।
अमेरिका की नई टैरिफ नीति से बढ़ी वैश्विक अनिश्चितता
बाजार में गिरावट का चौथा बड़ा कारण अमेरिका की नई टैरिफ नीति को भी माना जा रहा है।
अमेरिका द्वारा कई देशों पर नए आयात शुल्क लगाए जाने की घोषणा के बाद वैश्विक व्यापार को लेकर नई चिंताएं पैदा हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यापारिक तनाव बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय मांग प्रभावित हो सकती है। इससे वैश्विक कंपनियों की कमाई पर असर पड़ सकता है और निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है।
वैश्विक व्यापार में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का प्रभाव भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिलता है क्योंकि भारत की कई बड़ी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़ी हुई हैं।
किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा दबाव?
शुक्रवार के शुरुआती कारोबार में कई प्रमुख सेक्टरों में कमजोरी देखने को मिली।
बैंकिंग शेयरों में बिकवाली
आईटी कंपनियों में दबाव
ऑटो सेक्टर में गिरावट
मेटल शेयर कमजोर
रियल्टी इंडेक्स में गिरावट
एनर्जी कंपनियों के शेयरों पर दबाव
विशेष रूप से मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में निवेशकों ने अधिक मुनाफावसूली की, जिससे इन सूचकांकों में भी लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
छोटे निवेशकों को क्या करना चाहिए?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में घबराकर फैसले लेना नुकसानदायक हो सकता है।
यदि किसी निवेशक का उद्देश्य लंबी अवधि का निवेश है, तो केवल एक दिन की गिरावट को देखकर निवेश रणनीति बदलना उचित नहीं माना जाता।
हालांकि जिन निवेशकों ने हाल के दिनों में तेजी के दौरान निवेश किया है, उन्हें अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा जरूर करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर जोखिम प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बाजार में अस्थिरता के दौरान बिना पर्याप्त जानकारी के खरीदारी या बिकवाली करने से बचना चाहिए।
आगे बाजार की दिशा किन बातों पर निर्भर करेगी?
आने वाले कारोबारी सत्रों में भारतीय शेयर बाजार की चाल कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी।
सबसे महत्वपूर्ण नजरें निम्न बिंदुओं पर रहेंगी—
कच्चे तेल की कीमतों में आगे क्या बदलाव आता है।
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कम होता है या बढ़ता है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों का निवेश रुख कैसा रहता है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आगे क्या स्थिति बनती है।
वैश्विक व्यापार और टैरिफ से जुड़ी नई घोषणाएं।
यदि इन मोर्चों पर राहत मिलती है तो बाजार में रिकवरी देखने को मिल सकती है। लेकिन यदि वैश्विक अनिश्चितता बनी रहती है तो आने वाले दिनों में भी उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में आई तेज गिरावट ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक घटनाओं का असर घरेलू बाजारों पर कितनी तेजी से पड़ सकता है। सेंसेक्स और निफ्टी में बड़ी गिरावट, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में कमजोरी तथा कुछ ही मिनटों में निवेशकों की करीब 3.58 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति घटना बाजार की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
हालांकि अनुभवी निवेशक ऐसे उतार-चढ़ाव को बाजार का सामान्य हिस्सा मानते हैं, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए निवेशकों के लिए सतर्क रहना और सोच-समझकर निवेश संबंधी निर्णय लेना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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