समुद्र के नीचे पनप रहा है 'खामोश बायो-बम'! 1500 जहाजों से पूरी दुनिया पर मंडरा रहा नया खतरा, वैज्ञानिकों ने जारी की गंभीर चेतावनी
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव का असर अब केवल सैन्य मोर्चे या वैश्विक तेल आपूर्ति तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे नए खतरे की चेतावनी दी है, जो भविष्य में दुनिया के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर डाल सकता है। फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में महीनों से खड़े हजारों वाणिज्यिक जहाज अब समुद्र के भीतर जैविक संकट (Biological Threat) का कारण बन सकते हैं।
हाल ही में 24 अंतरराष्ट्रीय समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि लंबे समय तक एक ही स्थान पर खड़े रहने के कारण जहाजों के निचले हिस्सों पर बड़ी मात्रा में समुद्री जीव जमा हो गए हैं। यदि भविष्य में ये जहाज दुनिया के अलग-अलग बंदरगाहों तक पहुंचते हैं, तो इनके साथ विदेशी समुद्री प्रजातियां भी फैल सकती हैं, जिससे कई देशों की स्थानीय समुद्री जैव विविधता को गंभीर नुकसान होने की आशंका है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
दुनिया के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हर वर्ष सैकड़ों अरब डॉलर का ऊर्जा व्यापार इसी रास्ते से होता है। ऐसे में यहां लंबे समय तक जहाजों का फंस जाना वैश्विक व्यापार के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी नई चुनौती बन गया है।
चार महीने से अधिक समय से खड़े हैं हजारों जहाज
अध्ययन के अनुसार क्षेत्र में 1,500 से अधिक वाणिज्यिक जहाज लंबे समय से एक ही स्थान पर खड़े हैं। सामान्य परिस्थितियों में जहाज लगातार चलते रहते हैं, जिससे उनके निचले हिस्से पर समुद्री जीव अधिक मात्रा में नहीं जम पाते।
लेकिन जब कोई जहाज कई सप्ताह या महीनों तक स्थिर रहता है, तो उसके पानी में डूबे हिस्से पर सूक्ष्म जीवों, काई, शंख, घोंघों और अन्य समुद्री जीवों की मोटी परत बनने लगती है।
यही स्थिति अब वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
क्या है बायोफाउलिंग?
जहाज के पानी में डूबे हिस्से पर समुद्री जीवों और वनस्पतियों के जमने की प्रक्रिया को बायोफाउलिंग (Biofouling) कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में कई प्रकार के जीव जहाज की सतह से चिपक जाते हैं, जिनमें शामिल हैं—
काई (Algae)
बार्नकल (Barnacles)
शंख
घोंघे
सूक्ष्म समुद्री जीव
विभिन्न प्रकार की समुद्री वनस्पतियां
यदि जहाज लंबे समय तक स्थिर रहे तो यह परत लगातार मोटी होती जाती है।
वैज्ञानिकों ने क्यों जताई चिंता?
समुद्री वैज्ञानिकों का कहना है कि असली खतरा तब पैदा होगा जब ये जहाज दोबारा अलग-अलग देशों के बंदरगाहों की ओर रवाना होंगे।
जहाजों के साथ चिपके ये समुद्री जीव हजारों किलोमीटर दूर दूसरे समुद्री क्षेत्रों तक पहुंच जाएंगे। वहां पहुंचकर ये स्थानीय समुद्री जीवों और वनस्पतियों के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे और कई बार उन्हें पूरी तरह समाप्त भी कर सकते हैं।
इसी वजह से शोधकर्ताओं ने इसे संभावित "बायोइन्वेज़न सुपर-स्प्रेडर" घटना बताया है।
स्थानीय समुद्री जीवन पर पड़ सकता है गंभीर असर
यदि विदेशी समुद्री प्रजातियां किसी नए समुद्री क्षेत्र में स्थापित हो जाती हैं, तो वे वहां पहले से मौजूद जीवों के भोजन, स्थान और संसाधनों पर कब्जा करना शुरू कर देती हैं।
इससे—
स्थानीय समुद्री प्रजातियों की संख्या घट सकती है।
समुद्री जैव विविधता प्रभावित हो सकती है।
मत्स्य उद्योग को नुकसान हो सकता है।
समुद्री खाद्य श्रृंखला असंतुलित हो सकती है।
पारिस्थितिकी तंत्र में दीर्घकालिक बदलाव आ सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाओं के प्रभाव कई वर्षों तक बने रह सकते हैं।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे उदाहरण
समुद्री वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में एशियन ग्रीन मसल (Asian Green Mussel) का उदाहरण दिया है।
यह प्रजाति समुद्री जहाजों के जरिए कई क्षेत्रों तक पहुंची थी और बाद में स्थानीय समुद्री जीवों के लिए गंभीर चुनौती बन गई।
ऐसी आक्रामक (Invasive) प्रजातियां तेजी से फैलती हैं और कई बार स्थानीय जीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर कर देती हैं।
जहाजों की गति भी हो रही प्रभावित
बायोफाउलिंग केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं बल्कि समुद्री परिवहन उद्योग के लिए भी बड़ी समस्या है।
जब जहाज के नीचे मोटी परत जम जाती है तो पानी में उसका प्रतिरोध (Drag) बढ़ जाता है।
इसका सीधा असर जहाज की गति और ईंधन की खपत पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
जहाज धीमी गति से चलते हैं।
इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
ईंधन की खपत बढ़ जाती है।
परिचालन लागत में वृद्धि होती है।
ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ता है
अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के अनुसार जहाज के निचले हिस्से पर जमी पतली जैविक परत भी ईंधन की खपत बढ़ा सकती है।
यदि परत अधिक मोटी हो जाए, तो जहाज को समान दूरी तय करने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।
इसका परिणाम होता है—
अधिक डीजल या ईंधन की खपत
कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वृद्धि
ग्रीनहाउस गैसों का अधिक उत्सर्जन
समुद्री परिवहन की पर्यावरणीय लागत में बढ़ोतरी
इसी कारण बायोफाउलिंग को जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अप्रत्यक्ष चुनौतियों में भी शामिल किया जाता है।
जहाजों की सफाई पर बढ़ रहा भारी खर्च
समुद्री नियमों के अनुसार यदि कोई जहाज लंबे समय तक खड़ा रहता है, तो उसके निचले हिस्से की नियमित सफाई जरूरी मानी जाती है।
अब कई जहाजों की सफाई के लिए विशेष प्रशिक्षित गोताखोरों और आधुनिक उपकरणों की मदद ली जा रही है।
बताया जा रहा है कि एक जहाज की सफाई पर आने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जहाजों की समय पर सफाई नहीं हुई, तो भविष्य में इसकी आर्थिक लागत और अधिक बढ़ सकती है।
क्या हो सकता है समाधान?
समुद्री विशेषज्ञ इस संकट से बचने के लिए कई उपाय सुझा रहे हैं—
लंबे समय तक खड़े जहाजों की नियमित सफाई।
बायोफाउलिंग की अंतरराष्ट्रीय निगरानी।
बंदरगाहों पर जहाजों की विशेष जांच।
समुद्री आक्रामक प्रजातियों की पहचान और नियंत्रण।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा समुद्री सुरक्षा नीति।
पर्यावरण-अनुकूल एंटी-फाउलिंग तकनीकों का उपयोग।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कई देशों को इसके गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में महीनों से खड़े वाणिज्यिक जहाज अब केवल व्यापारिक रुकावट का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिकों के अनुसार वे वैश्विक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए संभावित जैविक खतरा भी बन सकते हैं। हालांकि यह खतरा भविष्य की आशंकाओं और वैज्ञानिक आकलनों पर आधारित है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते निगरानी, जहाजों की सफाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे कदम उठाए गए तो इस संभावित संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

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