'सलवार उतारने की कोशिश और छाती दबाना रेप का प्रयास नहीं', पटना हाई कोर्ट के फैसले पर भड़के CJI सूर्यकांत
महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। पटना हाई कोर्ट के एक फैसले पर उठे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान गहरी नाराजगी जताई और कहा कि ऐसे मामलों में न्यायाधीशों को अधिक शोध (रिसर्च) और संवेदनशीलता के साथ निर्णय देने चाहिए।
मामला उस टिप्पणी से जुड़ा है जिसमें पटना हाई कोर्ट ने कहा था कि किसी महिला का सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाना भारतीय दंड संहिता के तहत "बलात्कार के प्रयास" (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि इसे महिला की शालीनता भंग करने (Outraging Modesty) का अपराध माना जाएगा। इस टिप्पणी के सामने आने के बाद कानूनी और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो गई।
सुप्रीम कोर्ट में उठा मामला
मंगलवार को यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत का ध्यान पटना हाई कोर्ट के 9 जुलाई के आदेश की ओर दिलाया और कहा कि पहले भी इस प्रकार के आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट चिंता जता चुका है, लेकिन इसके बावजूद ऐसी टिप्पणियां सामने आ रही हैं।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में कुछ अधिक अध्ययन और शोध करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक है।
CJI ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (National Judicial Academy) द्वारा यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर एक विशेष रिपोर्ट तैयार की गई है।
उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट और सभी उच्च न्यायालयों की वेबसाइटों पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में निर्णय देते समय उचित मार्गदर्शन मिल सके।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि केवल अदालतों को ही नहीं बल्कि पुलिस अधिकारियों को भी इस दिशा में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
महिलाओं से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में जांच, एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया के दौरान भी निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित हैंडबुक और दिशा-निर्देशों का उपयोग केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें व्यवहार में भी लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अदालत जल्द ही इस विषय पर एक महत्वपूर्ण निर्णय भी अपलोड करेगी जिससे भविष्य में ऐसी परिस्थितियों में मार्गदर्शन मिल सके।
क्या था पटना हाई कोर्ट का फैसला?
विवाद की शुरुआत पटना हाई कोर्ट के 9 जुलाई के एक फैसले से हुई।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह ने की थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने महिला का सलवार उतारने का प्रयास किया और उसकी छाती दबाई, तो यह महिला की शालीनता भंग करने का अपराध हो सकता है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसे "बलात्कार का प्रयास" नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब अदालत एक आरोपी की सजा को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई कर रही थी।
2008 की घटना से जुड़ा मामला
यह मामला वर्ष 2008 की एक कथित घटना से जुड़ा बताया जाता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित एक फोटो स्टूडियो में तस्वीर खिंचवाने गई थी।
आरोप था कि तस्वीर लेने के बाद स्टूडियो संचालक ने फोटो दिखाने के बहाने पिता को बाहर भेज दिया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।
शिकायत के अनुसार, इसके बाद आरोपी ने कथित रूप से महिला का सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाई। पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता दरवाजे तक पहुंचे, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग गया।
निचली अदालत ने इस मामले में आरोपी को दोषी ठहराया था, लेकिन बाद में हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बलात्कार के प्रयास संबंधी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का मामला भी आया था चर्चा में
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी याद दिलाया कि पिछले वर्ष इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को लेकर भी इसी तरह का विवाद हुआ था।
उस मामले में भी अदालत की कुछ टिप्पणियों पर व्यापक आलोचना हुई थी।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा था कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को अधिक संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और ऐसी टिप्पणियों से बचना चाहिए जो पीड़ितों के अधिकारों और न्याय की भावना पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।
राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले के बाद राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी ने न्यायिक अधिकारियों के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट और प्रशिक्षण सामग्री तैयार की थी।
इसका उद्देश्य था—
लैंगिक अपराधों को समझने में सहायता देना।
पीड़ित-केंद्रित न्यायिक दृष्टिकोण विकसित करना।
संवेदनशील भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना।
रूढ़िवादी धारणाओं से बचना।
न्यायिक निर्णयों में आधुनिक कानूनी सिद्धांतों का समावेश करना।
अब सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि यह सामग्री सभी न्यायालयों तक प्रभावी रूप से पहुंचे।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि "बलात्कार का प्रयास" और "महिला की शालीनता भंग" अलग-अलग कानूनी अपराध हैं और प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितियों और आरोपी की मंशा का विश्लेषण अदालत करती है।
इसलिए किसी भी मामले में आरोप तय करना या अपराध की श्रेणी निर्धारित करना तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ऐसे मामलों में अदालतों द्वारा प्रयुक्त भाषा अत्यंत सावधानीपूर्ण और संवेदनशील होनी चाहिए।
न्यायिक फैसलों पर क्यों होती है समीक्षा?
भारत की न्यायिक व्यवस्था में उच्च न्यायालयों के निर्णयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
यदि किसी फैसले में कानून की व्याख्या को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो सर्वोच्च अदालत उस पर विचार कर सकती है और आवश्यक होने पर व्यापक कानूनी सिद्धांत भी निर्धारित कर सकती है।
इसी प्रक्रिया के तहत कई महत्वपूर्ण न्यायिक मिसालें स्थापित होती हैं।
पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता कितनी महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में केवल कानून की तकनीकी व्याख्या ही नहीं, बल्कि पीड़ितों के अधिकारों, सामाजिक प्रभाव और संवेदनशील दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। फिलहाल संबंधित मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है और भविष्य में इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की विस्तृत टिप्पणी न्यायिक प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन साबित हो सकती है।

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