Breaking News

प्रशांत महासागर में उबल रहा समंदर! 2027 में दुनिया पर टूटने वाली है मौसम की सबसे बड़ी आफत?



नई दिल्ली: दुनिया के सबसे बड़े महासागर प्रशांत में इस समय एक असाधारण मौसमी बदलाव देखने को मिल रहा है। समुद्र की सतह का तापमान लगातार बढ़ रहा है और वैज्ञानिक इसे इतिहास के सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में से एक मान रहे हैं। इस बदलाव का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि दुनिया के कई देशों के मौसम, खेती, पानी की उपलब्धता और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश फिलीपींस, जापान, चीन और ताइवान इस मौसमी बदलाव को लेकर विशेष रूप से सतर्क हैं। कहीं सूखे और पानी की कमी का खतरा बढ़ रहा है, तो कहीं असामान्य बारिश और बाढ़ की आशंका बनी हुई है। वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि प्रशांत महासागर के तापमान में दर्ज हुई वृद्धि ने पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।

जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के अक्टूबर 2026 में जारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के नीनो-3 क्षेत्र का समुद्री सतह तापमान सामान्य से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक था। यह 1949 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले दिसंबर 1997 में तापमान का विचलन 3.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी चेतावनी दी है कि यह अल नीनो दुनिया के मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर समुद्र के तापमान में यह बदलाव क्यों हो रहा है और आने वाले महीनों में इसका असर कितना व्यापक हो सकता है?

क्या है अल नीनो, जिससे वैज्ञानिकों की बढ़ी चिंता?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ने पर विकसित होती है। इसका असर समुद्र और वातावरण के बीच होने वाली प्रक्रियाओं पर पड़ता है।

आमतौर पर प्रशांत महासागर में चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिमी हिस्से की ओर धकेलती हैं। लेकिन अल नीनो के दौरान इन हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है। इसके कारण गर्म पानी मध्य और पूर्वी प्रशांत की ओर फैलने लगता है।

समुद्र के तापमान में इस बदलाव से वायुमंडलीय दबाव, हवाओं की दिशा और बारिश के पैटर्न में परिवर्तन होता है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से दिखाई देता है।

किसी इलाके में सामान्य से कम बारिश हो सकती है, तो किसी दूसरे क्षेत्र में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है। यही वजह है कि अल नीनो को केवल समुद्र का तापमान बढ़ने वाली घटना मानना सही नहीं होगा। यह पूरी वैश्विक जलवायु व्यवस्था को प्रभावित करने वाला प्राकृतिक चक्र है।

4 डिग्री तक पहुंचा तापमान, टूट गया 1997 का रिकॉर्ड

इस बार अल नीनो को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा समुद्र के तापमान में दर्ज असाधारण वृद्धि की हो रही है।

जापान मौसम विज्ञान एजेंसी के अनुसार, सितंबर 2026 में नीनो-3 क्षेत्र का तापमान सामान्य से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। इससे पहले दिसंबर 1997 में यह आंकड़ा 3.6 डिग्री सेल्सियस था।

इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में तापमान का विचलन पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक हो गया है।

अमेरिकी मौसम विभाग NOAA ने भी 8 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी रिपोर्ट में बताया कि अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है। पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत के कुछ हिस्सों में समुद्र का तापमान सामान्य से 4 डिग्री से अधिक दर्ज किया गया है।

NOAA के अनुमान के मुताबिक, यह मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो की स्थिति जनवरी से मार्च 2027 तक बनी रह सकती है।

ब्रिटेन के मौसम विभाग Met Office ने भी इसे रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने वाली असाधारण जलवायु घटना बताया है।

फिलीपींस में सूखे का खतरा, पानी बचाने की अपील

अल नीनो का असर फिलीपींस में दिखाई देने लगा है। देश की मौसम एजेंसी PAGASA ने 4 नवंबर 2026 को जारी अपनी ताजा चेतावनी में बताया कि प्रशांत महासागर में बहुत मजबूत अल नीनो सक्रिय है और इसके 2027 की पहली छमाही तक बने रहने की संभावना है।

PAGASA के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में फिलीपींस के पांच प्रांतों में मौसम संबंधी सूखे की स्थिति दर्ज की गई। इसके अलावा 11 प्रांतों में शुष्क मौसम और 10 प्रांतों में सामान्य से कम नमी वाली परिस्थितियां देखी गईं।

नवंबर में भी देश के अधिकतर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका जताई गई है। इससे खेती, पेयजल और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

फिलीपींस की सरकार और मौसम विभाग ने लोगों से पानी का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने तथा जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की अपील की है।

हालांकि, मौसम विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अल नीनो के दौरान भी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों और अन्य बारिश लाने वाली मौसमी प्रणालियों के कारण भारी बारिश हो सकती है।

जापान, चीन और ताइवान पर भी पड़ सकता है असर

प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव का असर केवल फिलीपींस तक सीमित नहीं है। जापान, चीन और ताइवान जैसे देशों के मौसम पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

अल नीनो के दौरान समुद्र और वातावरण के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान बदलता है। इससे हवाओं की दिशा, समुद्री तापमान और बारिश के वितरण में बदलाव आता है।

जापान जैसे द्वीपीय देश के लिए समुद्री मौसम का बदलना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वहां समुद्री तूफान, भारी बारिश और बाढ़ से निपटने के लिए पहले से तैयारी की जाती है।

चीन के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों में भी समुद्री तूफानों और भारी बारिश के कारण बाढ़ का खतरा बना रहता है।

हालांकि, यह जरूरी नहीं कि अल नीनो आने से हर साल सभी एशियाई देशों में तूफानों की संख्या बढ़ जाए। वैज्ञानिकों के अनुसार, तूफानों की संख्या, उनकी तीव्रता और रास्ते पर समुद्री तापमान के साथ-साथ हवाओं की गति, नमी और वायुमंडलीय परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है।

क्या अल नीनो से सुपर टाइफून और ज्यादा खतरनाक हो जाएंगे?

समुद्री तूफानों को ताकत देने में गर्म समुद्री पानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब समुद्र की सतह का तापमान अधिक होता है, तो तूफानों को ऊर्जा और नमी मिल सकती है।

लेकिन किसी तूफान का सुपर टाइफून बनना केवल समुद्र के तापमान पर निर्भर नहीं करता। इसके लिए वातावरण में हवा की गति, ऊर्ध्वाधर विंड शियर, नमी और तूफान के बनने की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।

अल नीनो के कारण पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में तूफानों के बनने की जगह और उनके रास्ते में बदलाव हो सकता है। कुछ तूफान सामान्य से ज्यादा पूर्व में विकसित हो सकते हैं और गर्म समुद्री पानी के ऊपर अधिक समय बिताकर ताकत हासिल कर सकते हैं।

इसलिए वैज्ञानिकों के लिए केवल तूफानों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। उनकी दिशा, गति, बारिश और तटीय इलाकों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी जरूरी है।

सुपर टाइफून हाइयान की याद क्यों दिला रहा है यह संकट?

फिलीपींस में आने वाले शक्तिशाली समुद्री तूफानों की चर्चा होती है तो 2013 में आए सुपर टाइफून हाइयान का नाम जरूर सामने आता है।

यह तूफान आधुनिक इतिहास के सबसे विनाशकारी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में से एक था। इसने फिलीपींस के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई थी। हजारों लोगों की जान गई और लाखों लोग प्रभावित हुए थे।

वैज्ञानिकों के लिए हाइयान आज भी एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है। इसके जरिए यह समझने की कोशिश की जाती है कि समुद्री तापमान, तूफानों की तीव्रता और अत्यधिक बारिश मिलकर किस तरह बड़ी आपदा पैदा कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण वातावरण में गर्मी और नमी बढ़ने से कुछ परिस्थितियों में अत्यधिक बारिश वाले तूफानों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

हालांकि, हर अल नीनो का परिणाम हाइयान जैसी तबाही नहीं होता। किसी भी क्षेत्र में वास्तविक खतरा समझने के लिए स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और वैज्ञानिक आंकड़ों का अध्ययन जरूरी है।

प्रशांत महासागर में बदल रहे मौसम का भारत पर क्या होगा असर?

भारत के लिए भी अल नीनो महत्वपूर्ण है। इसका असर भारतीय मानसून पर पड़ सकता है।

इतिहास में कई मजबूत अल नीनो घटनाओं के दौरान भारत में मानसून कमजोर रहा है। हालांकि, हर साल इसका असर एक जैसा नहीं होता। हिंद महासागर का तापमान, इंडियन ओशन डाइपोल (IOD), स्थानीय मौसमी परिस्थितियां और अन्य वायुमंडलीय कारक भी भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं।

कमजोर मानसून होने पर कृषि उत्पादन, जलाशयों में पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

इसके अलावा धान, मक्का, दालों और दूसरी फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका रहती है। यदि बारिश में कमी आती है तो किसानों को सिंचाई के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है।

आने वाले महीनों में भारत के मौसम पर अल नीनो के संभावित प्रभाव को समझने के लिए भारतीय मौसम विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

वैज्ञानिकों ने क्यों दी समय रहते तैयारी करने की सलाह?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, अल नीनो का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। इससे खाद्य उत्पादन, जल संसाधन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

WMO ने 5 नवंबर 2026 को जारी अपने नए क्षेत्रीय पूर्वानुमान में बताया कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है।

प्रशांत द्वीपीय देशों में पहले से पानी की कमी की समस्या झेल रहे इलाकों के लिए यह चिंता का विषय है। अधिक तापमान के साथ कम बारिश होने पर सूखे की स्थिति और गंभीर हो सकती है।

संगठन ने यह भी बताया कि समुद्री गर्मी के कारण कुछ क्षेत्रों में प्रवाल भित्तियों यानी कोरल रीफ के प्रभावित होने का खतरा है।

सरकारों को जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, किसानों को मौसम आधारित सलाह, आपातकालीन तैयारी और समय पर चेतावनी देने वाले सिस्टम मजबूत करने की जरूरत है।

क्या आने वाले महीनों में और बढ़ेगा खतरा?

फिलहाल जापान मौसम विज्ञान एजेंसी, NOAA और विश्व मौसम विज्ञान संगठन के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रशांत महासागर में अल नीनो असाधारण रूप से मजबूत हो चुका है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसका प्रभाव 2027 तक बना रह सकता है। इस दौरान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान, बारिश और मौसमी परिस्थितियों में असामान्य बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

हालांकि, किसी विशेष तारीख पर किस देश में कितना बड़ा तूफान आएगा या कितनी तबाही होगी, इसकी निश्चित भविष्यवाणी केवल अल नीनो के आधार पर नहीं की जा सकती।

प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण जलवायु चेतावनी है। इस बार का अल नीनो पुराने रिकॉर्ड तोड़ चुका है और आने वाले महीनों में इसका असर कई देशों के मौसम पर दिखाई दे सकता है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकारें, वैज्ञानिक और आम लोग समय रहते तैयारी करें, ताकि बदलते मौसम के कारण होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

कोई टिप्पणी नहीं