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चीनी की कीमतों में फिर आएगा बड़ा उछाल? उत्पादन घटने के बीच सरकार का एथेनॉल पर बड़ा फैसला, जानिए क्या होने वाला है!



भारत में त्योहारों का मौसम चल रहा है और इसी बीच चीनी के बाजार से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने आम उपभोक्ताओं से लेकर चीनी मिलों और गन्ना किसानों तक सबका ध्यान खींच लिया है। दिवाली से पहले चीनी की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम और फसल से जुड़ी चिंताओं ने अगले सीजन के उत्पादन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसी बीच केंद्र सरकार ने 2026-27 के एथेनॉल सप्लाई ईयर के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने चीनी आधारित कच्चे माल से एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्जन को शून्य करने का निर्देश दिया है। यानी नए एथेनॉल टेंडर में गन्ने के रस, चीनी सिरप और B-Heavy मोलासेस से बनने वाले एथेनॉल की खरीद शामिल नहीं की गई है।

अब सवाल यह है कि आखिर सरकार को यह कदम क्यों उठाना पड़ा? क्या देश में सचमुच चीनी की कमी होने वाली है? क्या आने वाले दिनों में चीनी और महंगी हो सकती है? या फिर एथेनॉल के लिए चीनी की कम खपत से बाजार में उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा?

दिवाली से पहले क्यों बढ़ रहे हैं चीनी के दाम?

चीनी की कीमतों में हालिया तेजी ने सबसे पहले बाजार का ध्यान खींचा है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में एक्स-मिल चीनी का भाव 6 अक्टूबर को करीब 4,600 रुपये प्रति क्विंटल था, जो 12 अक्टूबर तक बढ़कर लगभग 5,200 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। यानी कुछ ही दिनों में करीब 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

महाराष्ट्र में भी इसी अवधि में एक्स-मिल कीमत करीब 4,350 रुपये से बढ़कर 5,100 रुपये प्रति क्विंटल हो गई, जो लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि है।

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण त्योहारों के दौरान मांग बढ़ना बताया जा रहा है। दशहरा और दिवाली के समय मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की खपत बढ़ जाती है। मिठाई बनाने वाले कारोबारियों को बड़ी मात्रा में चीनी की जरूरत होती है और ऐसे में बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ जाता है।

लेकिन कहानी सिर्फ त्योहारों की मांग तक सीमित नहीं है।

उत्पादन में गिरावट ने बढ़ाई चिंता

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान लगभग 306 लाख टन है, जबकि शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन लगाया गया था। यानी उत्पादन का अनुमान शुरुआती आंकड़े से काफी नीचे आ गया है।

इस गिरावट के पीछे फसल में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के साथ-साथ अत्यधिक बारिश से हुए जलभराव को भी वजह बताया गया है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक की स्थिति भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं। कम बारिश और फसल की स्थिति को लेकर पहले से चिंता जताई जाती रही है। ऐसे में अगले सीजन में गन्ने की उपलब्धता और चीनी उत्पादन पर बाजार की नजर बनी हुई है।

सरकार ने एथेनॉल नीति में क्यों किया बदलाव?

यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ है।

भारत पिछले कुछ वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने पर जोर दे रहा है। एथेनॉल कार्यक्रम के तहत गन्ने के रस, चीनी सिरप और मोलासेस जैसे उत्पादों से भी एथेनॉल बनाया जाता रहा है।

लेकिन जब घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें बढ़ने लगीं और अगले उत्पादन को लेकर चिंता सामने आई, तो सरकार ने चीनी आधारित एथेनॉल के इस्तेमाल पर बड़ा कदम उठाया।

2026-27 के नए एथेनॉल सप्लाई टेंडर में चीनी की डायवर्जन मात्रा को शून्य रखा गया है। इसका मतलब है कि इस टेंडर के तहत गन्ने के रस, चीनी या चीनी सिरप और B-Heavy मोलासेस से बने एथेनॉल के लिए खरीद प्रस्ताव नहीं मांगे गए हैं।

इससे सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में ज्यादा चीनी उपलब्ध कराना और कीमतों पर दबाव कम करना माना जा रहा है।

क्या इससे चीनी की किल्लत खत्म हो जाएगी?

यहां तस्वीर थोड़ी अलग है।

सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक मौजूद है। अगस्त 2026 में जारी सरकारी जानकारी के अनुसार उत्पादन शुरुआती अनुमान से कम जरूर है, लेकिन नए पेराई सीजन के शुरू होने तक घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

इसलिए अभी यह कहना कि भारत में चीनी की वास्तविक कमी हो चुकी है, सही नहीं होगा।

हालांकि बाजार में तंग आपूर्ति की स्थिति जरूर दिखाई दे रही है। यही वजह है कि त्योहारों के समय कीमतों में अचानक तेजी आई है।

दूसरी तरफ उद्योग से जुड़े अनुमान ज्यादा सतर्क तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2026-27 सीजन में चीनी उत्पादन लगभग 28 मिलियन टन तक रहने का अनुमान लगाया जा रहा है, जबकि घरेलू खपत करीब 28.5 से 29 मिलियन टन के आसपास हो सकती है। शुरुआती स्टॉक भी करीब एक दशक के निचले स्तर पर बताया गया है।

अगर उत्पादन और खपत के बीच अंतर बहुत कम रहता है, तो बाजार में कीमतों पर दबाव बने रह सकता है।

सरकार पहले ही उठा चुकी है कई बड़े कदम

चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार पहले ही कई कदम उठा चुकी है।

सरकार ने घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इसके अलावा चीनी व्यापारियों के स्टॉक पर सीमा लगाई गई है और बड़े उपभोक्ताओं के लिए घरेलू बाजार से खरीदी जाने वाली चीनी के स्टॉक को भी सीमित किया गया है।

सरकार ने चीनी मिलों और कारोबारियों के स्टॉक की निगरानी के लिए भौतिक सत्यापन और नियमित स्टॉक रिपोर्टिंग जैसे कदम भी उठाए हैं।

इसके अलावा अक्टूबर के दूसरे हिस्से के लिए घरेलू बाजार में अतिरिक्त चीनी उपलब्ध कराने की कोशिश भी की गई है, ताकि दिवाली के दौरान मांग बढ़ने पर बाजार में अचानक कमी जैसी स्थिति पैदा न हो।

क्या मिठाई और चीनी और महंगी होगी?

यह सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब कई चीजों पर निर्भर करेगा।

अगर नई पेराई तेजी से शुरू होती है और बाजार में ताजा चीनी की आवक बढ़ती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। सरकार ने अक्टूबर में पेराई शुरू करने की कोशिश की है ताकि त्योहारों के दौरान बाजार में अतिरिक्त उत्पादन पहुंच सके।

लेकिन अगर महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में गन्ने की उपलब्धता उम्मीद के मुताबिक नहीं रहती, तो उत्पादन और आपूर्ति को लेकर चिंता बनी रह सकती है।

इसके अलावा दिवाली के दौरान मिठाई और खाद्य कारोबारियों की मांग भी महत्वपूर्ण होगी। अगर मांग अनुमान से ज्यादा बढ़ती है और नई चीनी की आवक धीमी रहती है, तो कीमतों में फिर तेजी देखने को मिल सकती है।

एथेनॉल बनाम चीनी की लड़ाई क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के लिए एथेनॉल सिर्फ चीनी उद्योग का मामला नहीं है। इसका संबंध पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण, कच्चे तेल के आयात और किसानों की आय से भी जुड़ा है।

सरकार ने पिछले वर्षों में एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया है। वहीं चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल अतिरिक्त आय का स्रोत रहा है और अधिशेष चीनी को वैकल्पिक बाजार देने में मदद करता रहा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार चीनी को एथेनॉल में डायवर्ट करने की हिस्सेदारी 2022-23 में करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गई थी। साथ ही देश में बनने वाले एथेनॉल का बड़ा हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है।

ऐसे में मौजूदा फैसला यह संकेत देता है कि फिलहाल घरेलू चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दी जा रही है।

आम आदमी पर क्या होगा असर?

अगर चीनी की थोक कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर सिर्फ किराना बाजार तक सीमित नहीं रहेगा।

मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ और चीनी का इस्तेमाल करने वाले दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत पर भी असर पड़ सकता है। दिवाली के दौरान मिठाई की कीमतों में बढ़ोतरी का एक कारण चीनी समेत अन्य कच्चे माल की लागत भी हो सकती है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर जगह चीनी या मिठाई की कीमत तुरंत एक समान बढ़ जाएगी। स्थानीय बाजार, ब्रांड, थोक कीमत, परिवहन लागत और कारोबारियों के मार्जिन के कारण अलग-अलग जगहों पर कीमतें अलग हो सकती हैं।

फिलहाल असली तस्वीर क्या है?

पूरी स्थिति को एक लाइन में समझें तो भारत में अभी तत्काल चीनी की राष्ट्रीय स्तर पर किल्लत नहीं है, लेकिन उत्पादन में कमी, कम शुरुआती स्टॉक, त्योहारों की बढ़ी मांग और कुछ राज्यों में फसल संबंधी चिंता ने बाजार को संवेदनशील बना दिया है।

यही वजह है कि सरकार एक तरफ चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए आयात और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदम उठा रही है, तो दूसरी तरफ 2026-27 के लिए चीनी आधारित एथेनॉल डायवर्जन को शून्य करने का फैसला लिया गया है।

आने वाले हफ्तों में सबसे ज्यादा नजर गन्ने की पेराई की रफ्तार, नई चीनी की बाजार में आवक और त्योहारों के बाद मांग पर रहेगी। अगर नई फसल की चीनी समय पर बाजार में पहुंचती है, तो मौजूदा दबाव कम हो सकता है। लेकिन उत्पादन अनुमान और शुरुआती स्टॉक कमजोर रहे तो कीमतों का सवाल आगे भी बना रह सकता है।

यानी फिलहाल चीनी की किल्लत की घंटी नहीं बजी है, लेकिन बाजार में खतरे का संकेत जरूर दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में नई पेराई और चीनी की आवक ही बताएगी कि यह तेजी कुछ समय की है या इसके पीछे कोई बड़ी सप्लाई चुनौती छिपी हुई है।

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