यूपी चुनाव से पहले बड़ा सर्वे! क्या फिर खिलेगा कमल या अखिलेश मारेंगे बाजी? आंकड़े उड़ा देंगे होश
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल उत्तर प्रदेश में सत्ता की लड़ाई हमेशा से राष्ट्रीय राजनीति का भी अहम संकेत मानी जाती रही है। चुनावी तारीखों के करीब आने के साथ ही राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इसी बीच जनता के मूड को समझने के लिए सामने आए एक नए सर्वे ने प्रदेश की सियासत में चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
‘वोट वाइब’ (Vote Vibe) के नाम से सामने आए ताजा सर्वे में उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों को लेकर जनता की पसंद और संभावित वोट शेयर का अनुमान पेश किया गया है। सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) और सहयोगी दलों वाले एनडीए गठबंधन को 42 प्रतिशत वोट शेयर मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संभावित इंडिया गठबंधन को 39 प्रतिशत वोट मिलने की बात कही गई है।
अगर इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो दोनों प्रमुख गठबंधनों के बीच महज 3 प्रतिशत वोट शेयर का अंतर दिखाई देता है। यही छोटा अंतर आगामी चुनाव की तस्वीर को बेहद दिलचस्प बना रहा है।
NDA और INDIA के बीच कांटे की टक्कर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला पिछले कुछ चुनावों से लगातार चर्चा में रहा है। विधानसभा चुनाव में जहां बीजेपी अपने संगठन, सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे को प्रमुख आधार बनाकर मैदान में उतर सकती है, वहीं समाजवादी पार्टी अपने सामाजिक समीकरण और अखिलेश यादव के नेतृत्व के सहारे चुनावी मुकाबला मजबूत करने की कोशिश करेगी।
‘वोट वाइब’ सर्वे में एनडीए को 42 प्रतिशत और संभावित इंडिया गठबंधन को 39 प्रतिशत वोट शेयर मिलने का अनुमान जताया गया है। आंकड़ों का अंतर भले ही छोटा नजर आता हो, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से विविध राज्य में कुछ प्रतिशत वोटों का बदलाव भी सीटों की संख्या में बड़ा अंतर पैदा कर सकता है।
यही वजह है कि सर्वे के ये आंकड़े सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में इसकी खूब चर्चा हो रही है। हालांकि, किसी भी सर्वे को चुनाव का अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता। चुनाव से पहले मतदाताओं की प्राथमिकताएं, उम्मीदवारों की घोषणा, गठबंधन का स्वरूप, स्थानीय मुद्दे और चुनावी माहौल कई बार तेजी से बदल सकते हैं।
सीएम पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ आगे
सर्वे का सबसे चर्चित हिस्सा मुख्यमंत्री पद की पसंद को लेकर सामने आया है। सर्वे में जनता से कथित तौर पर पूछा गया कि वह मुख्यमंत्री के रूप में किस नेता को सबसे अधिक पसंद करती है।
इस सवाल के जवाब में 43 प्रतिशत लोगों ने योगी आदित्यनाथ को अपनी पहली पसंद बताया। वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को 35 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिलने का अनुमान लगाया गया है।
इस तरह मुख्यमंत्री की पसंद के मामले में योगी आदित्यनाथ को अखिलेश यादव पर करीब 8 प्रतिशत की बढ़त दिखाई गई है।
राजनीतिक दृष्टि से यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा कई बार मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकता है। योगी आदित्यनाथ 2017 से उत्तर प्रदेश की सत्ता में बीजेपी सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में उनके नेतृत्व और सरकार के प्रदर्शन को लेकर जनता का रुख बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा।
दूसरी ओर, अखिलेश यादव के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपनी पार्टी के समर्थन आधार को व्यापक बनाते हुए बीजेपी के खिलाफ मजबूत चुनावी विकल्प पेश कर सकें।
लोकसभा चुनाव के बाद अलग तस्वीर क्यों?
सर्वे के आंकड़ों ने एक और वजह से राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई समीकरण बदले हुए नजर आए थे। लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों के प्रदर्शन ने बीजेपी के सामने नई चुनौती पेश की थी।
इसके बाद सामने आए कुछ राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षणों में भी उत्तर प्रदेश को लेकर विपक्षी गठबंधन की स्थिति को मजबूत बताया गया था। लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर सामने आए इस ताजा सर्वे में एनडीए को वोट शेयर के मामले में बढ़त दिखाई गई है।
यानी लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दों तथा मतदाताओं की पसंद में अंतर हो सकता है। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे प्रमुख हो सकते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में स्थानीय विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य और मुख्यमंत्री का चेहरा जैसे मुद्दे अधिक प्रभाव डाल सकते हैं।
यूपी की राजनीति में यह अंतर पहले भी कई मौकों पर देखने को मिला है। इसलिए लोकसभा के आंकड़ों को सीधे विधानसभा चुनाव के नतीजों का संकेत मानना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
सिर्फ 3 प्रतिशत का अंतर बढ़ा सकता है सियासी तनाव
एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच 42 बनाम 39 प्रतिशत वोट शेयर का आंकड़ा यह संकेत देता है कि मुकाबला अभी खुला हुआ है। तीन प्रतिशत का अंतर सुनने में भले ही एनडीए के पक्ष में बढ़त दिखाता हो, लेकिन 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में यह अंतर सीटों में किस तरह बदलता है, यह अलग-अलग क्षेत्रों के परिणाम पर निर्भर करेगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं। पश्चिमी यूपी, अवध, पूर्वांचल, बुंदेलखंड और मध्य यूपी में अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे प्रभाव डालते हैं। ऐसे में पूरे प्रदेश के वोट शेयर को सीटों में बदलना आसान गणित नहीं है।
अगर चुनाव से पहले दोनों गठबंधनों के बीच वोट शेयर का अंतर कम होता है, तो कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। वहीं किसी गठबंधन के पक्ष में अंतिम समय में कुछ प्रतिशत का स्विंग भी सीटों के समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है।
योगी बनाम अखिलेश की लड़ाई पर भी नजर
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में एक बड़ा मुकाबला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के नेतृत्व के बीच भी माना जा रहा है। दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान और मजबूत समर्थक आधार है।
योगी आदित्यनाथ के पक्ष में सर्वे में 43 प्रतिशत समर्थन दिखना बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। वहीं अखिलेश यादव को 35 प्रतिशत समर्थन यह बताता है कि समाजवादी पार्टी का नेतृत्व भी मुकाबले में मजबूत स्थिति में बना हुआ है।
हालांकि, मुख्यमंत्री पद की पसंद और विधानसभा सीटों पर पार्टी को मिलने वाले वोट में सीधा संबंध जरूरी नहीं है। कोई मतदाता किसी नेता को पसंद कर सकता है, लेकिन स्थानीय उम्मीदवार या अन्य मुद्दों के आधार पर उसका वोट किसी अलग पार्टी को जा सकता है।
अंतिम फैसला जनता के हाथ में
‘वोट वाइब’ सर्वे के आंकड़ों ने उत्तर प्रदेश की चुनावी तस्वीर को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है। सर्वे के मुताबिक एनडीए को 42 प्रतिशत और संभावित इंडिया गठबंधन को 39 प्रतिशत वोट शेयर मिलने का अनुमान है। वहीं मुख्यमंत्री की पसंद में योगी आदित्यनाथ 43 प्रतिशत समर्थन के साथ अखिलेश यादव के 35 प्रतिशत से आगे बताए गए हैं।
लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों को हमेशा संभावित जनमत की तस्वीर के तौर पर देखना चाहिए, न कि अंतिम चुनावी परिणाम के तौर पर। चुनाव की घोषणा, प्रत्याशियों की सूची, गठबंधन की सीट शेयरिंग, स्थानीय मुद्दे और मतदान के दिन मतदाताओं का वास्तविक फैसला ही अंतिम तस्वीर तय करेगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है। एक तरफ बीजेपी नेतृत्व वाला एनडीए अपनी बढ़त बनाए रखने की कोशिश करेगा, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने गठबंधन के जरिए सत्ता परिवर्तन की उम्मीद लगाए होंगी।
आने वाले महीनों में अगर वोट प्रतिशत में मामूली बदलाव भी होता है तो 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश का पूरा राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनावी मैदान गर्म होने के साथ यह तीन प्रतिशत का अंतर बढ़ेगा, घटेगा या फिर मुकाबला बराबरी पर आ जाएगा। इसका जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम और अंततः जनता के वोट से ही मिलेगा।

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