बच्चों की दवा की बोतल में छिपा था बड़ा राज! नकली लेबल हटते ही सामने आया जानवरों के सप्लीमेंट का खेल
सूरत। मेडिकल स्टोर से दवा खरीदते समय आमतौर पर लोग बोतल पर लिखे ब्रांड नाम, कंपनी और दवा की पैकिंग देखकर भरोसा कर लेते हैं। खासकर जब मामला बच्चों की दवा का हो तो माता-पिता डॉक्टर की सलाह और दवा के नाम पर भरोसा करके उसे खरीद लेते हैं। लेकिन गुजरात के सूरत में सामने आए एक मामले ने इसी भरोसे को सवालों के घेरे में ला दिया है। पुलिस के मुताबिक, शहर के एक मेडिकल स्टोर पर कथित तौर पर जानवरों के लिए इस्तेमाल होने वाले लिक्विड सप्लीमेंट को बच्चों की दवा के नाम पर बेचा जा रहा था।
पुलिस का आरोप है कि इस पूरे खेल में बड़ी मात्रा में खरीदे गए वेटरनरी सप्लीमेंट को छोटी बोतलों में भरा जाता था। इसके बाद उन बोतलों पर कथित तौर पर एक मशहूर कंपनी की बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा के नाम वाले नकली लेबल लगाए जाते थे। इतना ही नहीं, इस कथित नकली पैकिंग को ग्राहकों को अधिक कीमत पर बेचे जाने का भी आरोप है।
मामले का खुलासा सूरत स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप यानी SOG की कार्रवाई के बाद हुआ। पुलिस ने शहर के गोपीपुरा इलाके में स्थित एक मेडिकल स्टोर पर छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान पुलिस को ऐसी सामग्री मिलने का दावा किया गया, जिसने जांच की दिशा ही बदल दी।
मेडिकल स्टोर पर छापेमारी से खुला पूरा मामला
पुलिस के मुताबिक, आरोपी की पहचान मोहम्मद साजिद इब्राहिम मुल्ला के रूप में हुई है। सूरत SOG की टीम ने गोपीपुरा इलाके में स्थित मेडिकल स्टोर पर कार्रवाई की। इसी दौरान पुलिस को कथित तौर पर ऐसी बोतलें और सामग्री मिली, जिनसे जानवरों के लिए बने सप्लीमेंट को बच्चों की दवा के रूप में तैयार किए जाने का संदेह हुआ।
सूरत के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस राजदीपसिंह नकुम ने इस कार्रवाई की जानकारी दी। पुलिस अब पूरे मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही है।
जांच का सबसे बड़ा सवाल यह है कि कथित तौर पर यह काम कब से चल रहा था। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ऐसी कितनी बोतलें तैयार की गईं और उनमें से कितनी बोतलें मेडिकल स्टोर या अन्य माध्यमों से ग्राहकों तक पहुंचीं।
बड़ी कैन से छोटी बोतलों तक पहुंचता था सप्लीमेंट
पुलिस की प्रारंभिक जांच के मुताबिक, आरोपी कथित तौर पर Himalaya Liv.52 Protec Liquid Veterinary Feed Supplement जैसी बड़ी कैन में उपलब्ध सामग्री खरीदता था। यह उत्पाद जानवरों के लिए इस्तेमाल होने वाला वेटरनरी फीड सप्लीमेंट बताया गया है।
आरोप है कि बड़ी कैन में मौजूद लिक्विड को निकालकर 60 मिलीलीटर और 100 मिलीलीटर की छोटी बोतलों में भरा जाता था। इसके बाद इन छोटी बोतलों पर कथित तौर पर Himalaya Liv.52 Drops के नाम वाले लेबल लगाए जाते थे।
यहीं से इस मामले का सबसे गंभीर पहलू सामने आता है। पुलिस के अनुसार, जानवरों के लिए बने उत्पाद को इस तरह पैक किया जाता था कि वह बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा जैसा नजर आए।
अगर जांच में पुलिस के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल गलत लेबल लगाने का मामला नहीं होगा, बल्कि उपभोक्ताओं को कथित तौर पर गुमराह करके एक अलग उत्पाद बेचने का गंभीर मामला बन सकता है।
बच्चों की दवा समझकर खरीदते थे ग्राहक?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कितने लोगों ने इन बोतलों को बच्चों की दवा समझकर खरीदा होगा।
पुलिस ने अभी तक ऐसी कोई पुष्टि नहीं की है कि कितने बच्चों को कथित तौर पर तैयार किए गए इस उत्पाद का इस्तेमाल कराया गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि किसी बच्चे की तबीयत खराब होने या किसी स्वास्थ्य नुकसान का मामला सामने आया है या नहीं।
फिर भी मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि बच्चों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले किसी भी उत्पाद में उसकी सही पहचान, संरचना, गुणवत्ता और इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
अगर किसी बोतल में मौजूद सामग्री और उसके लेबल पर लिखी जानकारी अलग हो, तो ग्राहक सही निर्णय नहीं ले सकता। यही वजह है कि पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि आरोपी ने कथित तौर पर किन-किन ग्राहकों को यह उत्पाद बेचा था।
दोगुनी कीमत पर बेचने का भी आरोप
पुलिस के मुताबिक, कथित तौर पर तैयार की गई इन बोतलों को ग्राहकों को अधिक कीमत पर बेचा जाता था। DCP राजदीपसिंह नकुम के अनुसार, आरोपी पर उत्पाद को उसकी वास्तविक कीमत से करीब दोगुने दाम पर बेचने का आरोप है।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने करीब 31,195 रुपये मूल्य का सामान और अन्य सामग्री जब्त किए जाने की जानकारी दी है।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि जब्त की गई सामग्री के अलावा आरोपी के पास और कितना स्टॉक था। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि कथित तौर पर तैयार की गई बोतलें सिर्फ इसी मेडिकल स्टोर से बेची जाती थीं या इन्हें किसी दूसरे नेटवर्क के जरिए भी बाजार में भेजा जाता था।
नकली लेबल कहां से आए, पुलिस कर रही जांच
इस मामले में एक और अहम सवाल नकली लेबल को लेकर है। अगर बोतलों पर किसी दूसरे उत्पाद का नाम इस्तेमाल किया गया था, तो ये लेबल कहां तैयार हुए? इन्हें किसने प्रिंट किया? क्या आरोपी खुद इन्हें तैयार करता था या इसके पीछे कोई दूसरा व्यक्ति या प्रिंटिंग नेटवर्क भी शामिल था?
पुलिस इन तमाम सवालों के जवाब तलाश रही है।
जांच में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि कथित तौर पर तैयार की गई बोतलों की संख्या कितनी थी और उन्हें किन इलाकों में बेचा गया। यदि जांच में किसी सप्लाई चेन या अन्य लोगों की भूमिका सामने आती है तो मामले का दायरा और बढ़ सकता है।
किन धाराओं में दर्ज हुई FIR?
पुलिस के अनुसार, इस मामले में सूरत के अथवा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई है। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 123, 125, 336 और 278 के तहत कार्रवाई की गई है।
इन धाराओं के तहत मामले की प्रकृति के अनुसार नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ, मानव जीवन को खतरे में डालने वाली लापरवाही, जालसाजी और किसी उत्पाद को दूसरे उत्पाद के रूप में बेचने जैसे आरोपों की जांच की जा सकती है।
हालांकि, किसी भी आरोपी पर लगे आरोप अदालत में साबित होना बाकी होते हैं। फिलहाल पुलिस की जांच के आधार पर ही मामले की आगे की कार्रवाई की जा रही है।
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल
मेडिकल स्टोर पर हुई इस कार्रवाई के बाद अब पुलिस के सामने कई सवाल हैं। सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि कथित तौर पर यह गतिविधि कितने समय से चल रही थी। दूसरा सवाल यह है कि कितनी बोतलें तैयार की गईं और कितनी बाजार में पहुंचीं।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस कथित नेटवर्क में मेडिकल स्टोर के अलावा कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल था।
पुलिस यह भी जांच करेगी कि बोतलों के लिए खाली पैकेजिंग और लेबल कहां से हासिल किए गए तथा कथित तौर पर भरे गए उत्पादों को ग्राहकों तक किस तरीके से पहुंचाया जाता था।
बच्चों की दवा को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
इस मामले ने मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने वाले लोगों की चिंता भी बढ़ा दी है। आम ग्राहक किसी बोतल को देखकर उसके अंदर मौजूद सामग्री की वास्तविकता की जांच नहीं कर सकता। वह पैकेट पर लिखे ब्रांड, लेबल और डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही दवा खरीदता है।
ऐसे में यदि कोई व्यक्ति कथित तौर पर किसी दूसरे उत्पाद को बच्चों की दवा के रूप में पेश करता है, तो इससे उपभोक्ता के भरोसे के साथ-साथ स्वास्थ्य सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
फिलहाल सूरत पुलिस मामले की जांच कर रही है। आरोपी से पूछताछ और जब्त सामग्री की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित तौर पर कितनी बोतलें तैयार की गई थीं, उनका इस्तेमाल कहां हुआ और इस पूरे मामले में कितने लोग शामिल थे।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि मेडिकल स्टोर से बरामद सामग्री सिर्फ एक दुकान तक सीमित थी या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था। पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ इस कथित दवा फर्जीवाड़े से जुड़े और भी तथ्य सामने आने की संभावना है।

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