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जयशंकर को ‘रुबियो का कर्मचारी’ कहने पर मचा बवाल, राहुल गांधी को याद दिलाया गया 2013 का वो लंच… अब उठेगा सबसे बड़ा सवाल!



नई दिल्ली: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के आगामी भारत दौरे और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से उनकी मुंबई में होने वाली प्रस्तावित मुलाकात को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तंज कसते हुए लिखा कि “Mr Rubio has summoned his employee to Mumbai” यानी रुबियो ने अपने कर्मचारी को मुंबई बुलाया है। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि विदेश मंत्रालय के अधिकारी आखिर इस मामले को लेकर भ्रमित क्यों दिखाई दे रहे हैं।

राहुल गांधी की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से सवाल उठाया गया है कि आखिर विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मार्को रुबियो के साथ मुंबई में होने वाली बैठक की जानकारी भारत के विदेश मंत्रालय की बजाय भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की ओर से पहले क्यों सामने आई।

लेकिन इसी विवाद के बीच अब 2013 का एक पुराना घटनाक्रम भी सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में फिर से सामने आ गया है। उस समय यूपीए सरकार में विदेश मंत्री रहे सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के लिए जयपुर के रामबाग पैलेस में लंच आयोजित किया था। उस मुलाकात को लेकर भी उस समय खूब राजनीतिक विवाद हुआ था।

आखिर राहुल गांधी ने क्या कहा?

राहुल गांधी का बयान उस समय आया जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे से जुड़ी जानकारी सामने आई। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा था कि रुबियो मुंबई में भारतीय अधिकारियों से मुलाकात करेंगे और उम्मीद है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इस बैठक में मौजूद रहेंगे।

इसके बाद कांग्रेस ने सवाल उठाया कि भारतीय विदेश मंत्री के कार्यक्रम की जानकारी पहले अमेरिकी अधिकारी की ओर से क्यों दी जा रही है।

इसी मुद्दे पर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को संबोधित करते हुए X पर लिखा कि रुबियो ने अपने “कर्मचारी” को मुंबई बुलाया है और विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस घटनाक्रम को लेकर भ्रमित हैं।

राहुल गांधी के इस बयान को कांग्रेस की ओर से केंद्र सरकार की विदेश नीति और अमेरिका के साथ मौजूदा संबंधों को लेकर राजनीतिक हमला माना जा रहा है।

हालांकि, सरकार या बीजेपी की ओर से राहुल गांधी के इस “कर्मचारी” वाले बयान पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।

20 अक्टूबर को मुंबई में होगी जयशंकर-रुबियो मुलाकात

विवाद के बीच विदेश मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। मंत्रालय के मुताबिक एस. जयशंकर मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से 20 अक्टूबर 2026 को मुलाकात करेंगे।

विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि जयशंकर 19 और 20 अक्टूबर को मुंबई में यूएई के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान की मेजबानी करेंगे और इसके बाद रुबियो के साथ बैठक करेंगे।

यानी अब यह साफ है कि जयशंकर और रुबियो की मुलाकात किसी अचानक बने कार्यक्रम का हिस्सा नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान होने वाली आधिकारिक कूटनीतिक बातचीत है।

रुबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच भारत और उज्बेकिस्तान की यात्रा पर रहेंगे। भारत में उनका कार्यक्रम मुंबई और गुजरात के जामनगर से जुड़ा है।

अमेरिका ने क्यों चुना मुंबई?

कांग्रेस ने इस बात को भी मुद्दा बनाया कि अमेरिकी विदेश मंत्री दिल्ली जाने के बजाय मुंबई में भारतीय अधिकारियों से मुलाकात क्यों कर रहे हैं।

इस पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि पिछले एक दशक से भारत में विदेशी नेताओं और प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी अलग-अलग शहरों में करने की परंपरा रही है। इसलिए मुंबई में बैठक होना अपने आप में कोई असामान्य कूटनीतिक कदम नहीं है।

रुबियो की भारत यात्रा का एजेंडा भी केवल राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है। अमेरिकी पक्ष के अनुसार रणनीतिक साझेदारी, क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रम, ऊर्जा सहयोग, निवेश और व्यापार जैसे मुद्दों पर बातचीत होनी है।

यही वजह है कि इस मुलाकात को भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

कांग्रेस का सवाल आखिर है क्या?

कांग्रेस का मुख्य सवाल विदेश मंत्री के किसी विदेशी नेता से मिलने पर नहीं है। पार्टी की आपत्ति मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि भारत में होने वाली बैठक और उसमें भारतीय विदेश मंत्री की मौजूदगी की जानकारी अमेरिकी राजदूत की ओर से पहले क्यों सामने आई।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि भारतीय विदेश मंत्री की बैठक के बारे में जानकारी भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से सामने आनी चाहिए थी।

यानी कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को विदेश नीति में पारदर्शिता और भारत की कूटनीतिक स्थिति से जोड़कर देख रही है।

दूसरी ओर, सरकार का रुख यह है कि विदेशी नेताओं की भारत यात्रा के दौरान विभिन्न शहरों में बैठकें करना सामान्य राजनयिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

अब क्यों याद आ रहा है 2013 का वो मामला?

राहुल गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर 2013 का एक पुराना मामला भी चर्चा में आ गया है।

9 मार्च 2013 को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ निजी यात्रा पर भारत आए थे। उनका मुख्य उद्देश्य अजमेर शरीफ दरगाह में जियारत करना था। वे पहले जयपुर पहुंचे थे और वहां तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने उनके लिए रामबाग पैलेस में लंच आयोजित किया था।

उस समय भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण थे। जनवरी 2013 में नियंत्रण रेखा पर भारतीय सैनिकों की हत्या और शवों के साथ बर्बरता के आरोपों के कारण पाकिस्तान को लेकर भारत में भारी नाराजगी थी।

ऐसे माहौल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के स्वागत और विदेश मंत्री के साथ लंच को लेकर विपक्ष और कई संगठनों ने सवाल उठाए थे।

खुर्शीद ने तब क्या सफाई दी थी?

सलमान खुर्शीद ने उस समय साफ किया था कि यह निजी यात्रा थी और लंच के दौरान कोई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय राजनीतिक बातचीत नहीं हुई।

विदेश मंत्रालय की ओर से भी कहा गया था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की यात्रा निजी थी और जयपुर में कोई “substantive” यानी महत्वपूर्ण आधिकारिक चर्चा निर्धारित नहीं थी। साथ ही इसे सामान्य राजनयिक शिष्टाचार के तौर पर बताया गया था।

खुर्शीद ने बाद में कहा था कि इस मुलाकात में आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा करना उस यात्रा के संदर्भ में उचित नहीं था, क्योंकि अशरफ निजी यात्रा पर आए थे।

यानी उस समय भी एक विदेशी नेता से भारतीय विदेश मंत्री की मुलाकात को लेकर राजनीतिक सवाल उठे थे, लेकिन सरकार ने इसे कूटनीतिक शिष्टाचार और प्रोटोकॉल का हिस्सा बताया था।

क्या दोनों घटनाओं की तुलना सही है?

यहीं से राजनीतिक बहस दिलचस्प हो जाती है।

2013 में सलमान खुर्शीद का पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से मिलना और 2026 में एस. जयशंकर का अमेरिकी विदेश मंत्री से मिलना दो अलग-अलग परिस्थितियों में हुए घटनाक्रम हैं। दोनों देशों के साथ भारत के रिश्ते, यात्राओं का उद्देश्य और बैठक का एजेंडा भी अलग है।

इसलिए सीधे यह कहना कि दोनों घटनाएं बिल्कुल समान हैं, पूरी तरह सही नहीं होगा।

लेकिन राजनीतिक तर्क के स्तर पर तुलना इसलिए की जा रही है क्योंकि दोनों मामलों में विदेश मंत्री की किसी विदेशी सरकार के शीर्ष प्रतिनिधि से मुलाकात को लेकर घरेलू राजनीति में सवाल उठे हैं।

कूटनीति में विदेश मंत्री का दूसरे देशों के विदेश मंत्रियों और शीर्ष नेताओं से बातचीत करना उनके पद की जिम्मेदारी का ही हिस्सा है। ऐसी मुलाकात को अपने आप में किसी देश के प्रति अधीनता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

‘कर्मचारी’ शब्द ने क्यों बढ़ाया विवाद?

राहुल गांधी का “कर्मचारी” वाला शब्द सामान्य राजनीतिक आलोचना से कहीं ज्यादा तीखा है। इसका सीधा संकेत यह है कि उनके अनुसार भारत सरकार या विदेश मंत्रालय अमेरिकी दबाव में काम कर रहा है।

लेकिन किसी विदेशी विदेश मंत्री द्वारा भारतीय विदेश मंत्री से बैठक करना अपने आप में ऐसा प्रमाण नहीं है।

दूसरी तरफ कांग्रेस का सवाल यह है कि बैठक से जुड़ी जानकारी अमेरिकी राजदूत की ओर से पहले आने पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए थी। यही सवाल इस पूरे विवाद की राजनीतिक जड़ बना हुआ है।

विदेश मंत्रालय ने बाद में जयशंकर की मुंबई में रुबियो से मुलाकात की पुष्टि कर दी है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि अलग-अलग भारतीय शहरों में विदेशी प्रतिनिधियों की मेजबानी कोई नई व्यवस्था नहीं है।

भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्यों अहम है यह बैठक?

जयशंकर और रुबियो की बैठक ऐसे समय हो रही है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, ऊर्जा, निवेश, तकनीक और रणनीतिक सहयोग से जुड़े कई मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार रुबियो की यात्रा में व्यापार और ऊर्जा सहयोग को भी प्राथमिकता दी जाएगी। भारत-अमेरिका संबंधों में रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी चर्चा हो सकती है।

इसलिए 20 अक्टूबर की बैठक का वास्तविक महत्व सिर्फ इस बात में नहीं है कि दोनों मंत्री कहां मिल रहे हैं, बल्कि इस बात में है कि दोनों देशों के बीच किन मुद्दों पर सहमति और मतभेद सामने आते हैं।

कूटनीति बनाम राजनीति की असली लड़ाई

राहुल गांधी का हमला भारतीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका के तहत देखा जा सकता है। विपक्ष का काम सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाना और यह पूछना भी है कि महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में भारत की स्थिति क्या है।

लेकिन विदेश नीति के मामलों में बयानबाजी और वास्तविक कूटनीतिक प्रक्रिया के बीच अंतर करना भी जरूरी है।

किसी विदेशी नेता से मुलाकात करना विदेश मंत्री के काम का सामान्य हिस्सा है। दूसरी तरफ यदि किसी बैठक की जानकारी को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठता है, तो सरकार से स्पष्टीकरण मांगना भी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है।

2013 का सलमान खुर्शीद-राजा परवेज अशरफ मामला यही दिखाता है कि विदेशी नेताओं से मुलाकातें लंबे समय से भारतीय राजनीति में बहस का विषय रही हैं।

अब देखना यह होगा कि 20 अक्टूबर को मुंबई में जयशंकर और मार्को रुबियो की बैठक में क्या बातचीत होती है और उसके बाद दोनों पक्ष क्या आधिकारिक जानकारी जारी करते हैं। फिलहाल “कर्मचारी” वाले बयान ने इस सामान्य कूटनीतिक मुलाकात को एक बड़े राजनीतिक विवाद में जरूर बदल दिया है।

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