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लिवर में चुपचाप जमा हो रही है ये चीज! शुरुआत में नहीं दिखते लक्षण, कहीं आप भी तो नहीं हो रहे फैटी लिवर के शिकार?



आजकल बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों और शारीरिक गतिविधि की कमी के बीच फैटी लिवर एक ऐसी समस्या बन गई है, जिसके बारे में जागरूक रहना जरूरी है। खास बात यह है कि इस बीमारी के शुरुआती दौर में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। यही वजह है कि कई लोगों को इसके बारे में तब पता चलता है, जब किसी दूसरी वजह से कराई गई जांच में लिवर में फैट जमा होने की जानकारी मिलती है।

फैटी लिवर की एक प्रमुख स्थिति को अब मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) कहा जाता है, जिसे पहले नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज यानी NAFLD के नाम से जाना जाता था। इसमें लिवर की कोशिकाओं में अतिरिक्त फैट जमा होने लगता है। यह समस्या खासतौर पर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर और खून में फैट के असामान्य स्तर जैसी मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़ी हो सकती है।

आखिर फैटी लिवर क्यों होता है?

फैटी लिवर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। आज की जीवनशैली में लंबे समय तक बैठे रहना, पर्याप्त व्यायाम नहीं करना और ज्यादा कैलोरी वाले भोजन का सेवन प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं।

जब शरीर को जरूरत से ज्यादा ऊर्जा मिलती है और उसका इस्तेमाल पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता, तो अतिरिक्त ऊर्जा का कुछ हिस्सा फैट के रूप में जमा हो सकता है। यही प्रक्रिया लिवर में भी अतिरिक्त फैट जमा होने से जुड़ी हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक वजन या मोटापा, खासकर कमर और पेट के आसपास ज्यादा चर्बी, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ट्राइग्लिसराइड्स, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और मेटाबॉलिक सिंड्रोम फैटी लिवर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

खान-पान की गलत आदतें भी बन सकती हैं वजह

फैटी लिवर से बचाव में खान-पान की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। बहुत ज्यादा मीठे खाद्य पदार्थ, शुगर वाले पेय, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और जरूरत से ज्यादा कैलोरी का सेवन शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।

NIDDK के अनुसार, ज्यादा फ्रुक्टोज वाले आहार और मीठे खाद्य एवं पेय पदार्थों और फैटी लिवर के बीच संबंध पर भी शोध किया गया है। हालांकि फैटी लिवर के पीछे केवल एक ही कारण नहीं होता और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, आनुवंशिक कारक तथा जीवनशैली सहित कई चीजें भूमिका निभा सकती हैं।

इसलिए केवल किसी एक भोजन को बीमारी की वजह मानना सही नहीं होगा। पूरे खान-पान और जीवनशैली पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

पेट की चर्बी को भी हल्के में न लें

अगर किसी व्यक्ति का वजन बढ़ रहा है और पेट या कमर के आसपास लगातार चर्बी जमा हो रही है, तो इसे केवल शरीर की बनावट से जोड़कर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़ी हो सकती है। फैटी लिवर का संबंध भी मोटापे, इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसे जोखिम कारकों से पाया जाता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर अधिक वजन वाले व्यक्ति को फैटी लिवर होगा या सामान्य वजन वाले व्यक्ति को यह बीमारी नहीं हो सकती। फैटी लिवर अलग-अलग लोगों में अलग कारणों से भी विकसित हो सकता है।

फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती अवस्था में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं भी हो सकते हैं। बहुत से लोग सामान्य जीवन जीते रहते हैं और उन्हें पता ही नहीं होता कि लिवर में फैट जमा हो रहा है।

कुछ लोगों में थकान, सामान्य रूप से अस्वस्थ महसूस होना या पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में हल्की असहजता या दर्द जैसी समस्या हो सकती है। लेकिन इन लक्षणों को केवल फैटी लिवर का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता।

यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति में डायबिटीज, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल या अन्य मेटाबॉलिक जोखिम मौजूद हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना महत्वपूर्ण हो सकता है।

क्या फैटी लिवर गंभीर बीमारी में बदल सकता है?

हर व्यक्ति में फैटी लिवर गंभीर स्थिति में नहीं पहुंचता। लेकिन कुछ मामलों में लिवर में जमा फैट के साथ सूजन और नुकसान की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

MASLD के अधिक गंभीर रूप को मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोहेपेटाइटिस (MASH) कहा जाता है। इसमें लिवर में फैट के साथ सूजन और नुकसान हो सकता है। समय के साथ कुछ लोगों में फाइब्रोसिस यानी लिवर में स्कार टिश्यू बनने की समस्या विकसित हो सकती है और गंभीर मामलों में सिरोसिस तक पहुंच सकती है।

यही वजह है कि फैटी लिवर की जानकारी मिलने पर इसे पूरी तरह नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और फॉलो-अप कराना महत्वपूर्ण है।

जांच कैसे होती है?

फैटी लिवर का पता केवल लक्षणों के आधार पर लगाना मुश्किल हो सकता है। डॉक्टर व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री, वजन, खान-पान, शारीरिक गतिविधि और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानकारी लेते हैं।

जरूरत के अनुसार ब्लड टेस्ट और इमेजिंग टेस्ट किए जा सकते हैं। अल्ट्रासाउंड जैसी जांच से लिवर में फैट जमा होने का संकेत मिल सकता है। कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर लिवर को हुए नुकसान की गंभीरता का आकलन करने के लिए अतिरिक्त जांच भी करा सकते हैं।

इसलिए केवल इंटरनेट पर पढ़े गए लक्षणों के आधार पर खुद से बीमारी की पुष्टि करना सही तरीका नहीं है।

वजन कम करना क्यों हो सकता है मददगार?

यदि फैटी लिवर का संबंध अधिक वजन या मोटापे से है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार धीरे-धीरे वजन कम करना और शारीरिक गतिविधि बढ़ाना फायदेमंद हो सकता है।

स्वास्थ्य संस्थानों की जानकारी के अनुसार, वजन कम करने और नियमित व्यायाम से लिवर में जमा फैट को कम करने में मदद मिल सकती है। कुछ मामलों में शरीर के वजन में लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक कमी लिवर की स्थिति में सुधार से जुड़ी हो सकती है।

हालांकि तेजी से वजन घटाने के बजाय सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से वजन कम करना अधिक उचित माना जाता है। किसी व्यक्ति के लिए सही लक्ष्य उसकी उम्र, वजन, अन्य बीमारियों और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।

रोजाना की जीवनशैली में क्या बदलाव करें?

फैटी लिवर के जोखिम को कम करने के लिए जीवनशैली पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। इसके लिए संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ वजन बनाए रखने पर ध्यान दिया जा सकता है।

बहुत ज्यादा मीठे पेय, अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन और जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेने से बचना उपयोगी हो सकता है। इसके साथ ही लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत को कम करना और अपनी क्षमता के अनुसार नियमित गतिविधि करना भी महत्वपूर्ण है।

यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल की समस्या है, तो इन स्थितियों का उचित चिकित्सकीय प्रबंधन भी जरूरी है, क्योंकि ये फैटी लिवर के जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर लगातार थकान, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में असहजता, वजन से जुड़ी समस्या, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल या अन्य मेटाबॉलिक जोखिम मौजूद हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करना उचित हो सकता है।

खासकर तब जब किसी जांच में लिवर एंजाइम असामान्य आए हों या अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर की जानकारी मिली हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लिवर की बीमारी लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी रह सकती है। इसलिए जोखिम वाले लोगों में समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

फैटी लिवर ऐसी समस्या है जिसे शुरुआती दौर में अक्सर पहचानना मुश्किल होता है, क्योंकि इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं भी हो सकते। मोटापा, पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी, डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और असंतुलित जीवनशैली इसके जोखिम से जुड़े प्रमुख कारकों में शामिल हैं।

अच्छी बात यह है कि कई लोगों में जीवनशैली में सुधार से स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। लेकिन यदि लिवर में सूजन या फाइब्रोसिस विकसित हो रहा हो, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

इसलिए लगातार थकान या पेट में असहजता जैसे संकेतों को नजरअंदाज करने के बजाय अपनी पूरी स्वास्थ्य स्थिति पर ध्यान दें। फैटी लिवर की पुष्टि केवल लक्षणों से नहीं होती, बल्कि चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ की सलाह से ही सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है।

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