महाकुंभ वाली मोनालिसा की उम्र का राज फिर आया सामने! जन्मतिथि बदली तो पहुंचा हाईकोर्ट, अब कोर्ट के आदेश से मचा नया मोड़
इंदौर: महाकुंभ से अचानक देशभर में पहचान बनाने वाली मोनालिसा भोंसले एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार चर्चा उनकी खूबसूरती या सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो को लेकर नहीं, बल्कि उनकी जन्मतिथि और उम्र से जुड़े कानूनी विवाद को लेकर है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने मोनालिसा को नाबालिग मानने के आधार पर जन्म रिकॉर्ड में किए गए बदलाव से जुड़े नगर पालिका के आदेश को रद्द कर दिया है।
अदालत ने हालांकि यह तय नहीं किया है कि मोनालिसा की वास्तविक जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 है या 30 दिसंबर 2009। कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से प्रक्रिया से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के जन्म रिकॉर्ड में ऐसा बदलाव किया जा रहा हो जिसका उसके अधिकारों और कानूनी स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है, तो संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना जरूरी है।
अब संबंधित अधिकारी को मोनालिसा को सुनवाई का मौका देने के बाद उनके पिता की ओर से दिए गए जन्मतिथि सुधार संबंधी आवेदन पर कानून के अनुसार नए सिरे से निर्णय लेना होगा।
महाकुंभ से मिली थी देशभर में पहचान
मोनालिसा भोंसले उस समय अचानक सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थीं, जब प्रयागराज महाकुंभ में रुद्राक्ष की माला बेचते हुए उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया था। उनकी तस्वीरें और वीडियो कई प्लेटफॉर्म पर वायरल हुए और देखते ही देखते वह देशभर में चर्चा का विषय बन गईं।
महाकुंभ के बाद मोनालिसा को मॉडलिंग और फिल्मी दुनिया से जुड़े अवसरों की चर्चा के कारण भी सुर्खियां मिलीं। लेकिन इसके बाद उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा एक विवाद सामने आया, जिसने मामले को कानूनी मोड़ दे दिया।
अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद एक बार फिर उनकी उम्र और जन्मतिथि का मामला चर्चा में है।
कैसे शुरू हुआ जन्मतिथि का विवाद?
मामले की शुरुआत जन्म प्रमाणपत्र और उसमें दर्ज जन्मतिथि को लेकर हुई। कोर्ट के सामने रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, मोनालिसा के माता-पिता की ओर से दिए गए आवेदन के आधार पर जून 2025 में उनका जन्म पंजीकृत किया गया था। इसमें उनकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 दर्ज की गई थी।
बताया गया कि उस समय उनके माता-पिता ने कहा था कि मोनालिसा का जन्म घर पर हुआ था। इसके बाद संबंधित प्रक्रिया पूरी होने पर जन्म प्रमाणपत्र जारी किया गया।
मामले में यह भी सामने आया कि वर्ष 2015 में जारी आधार कार्ड में भी 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि दर्ज थी। बाद में उनके नाम से पैन कार्ड भी जारी हुआ। वहीं, मतदाता पहचान पत्र से जुड़ा रिकॉर्ड भी अदालत के सामने चर्चा में आया।
लेकिन बाद में मोनालिसा के पिता की ओर से जन्मतिथि को लेकर अलग दावा किया गया।
शादी के बाद सामने आया नया दावा
मोनालिसा की शादी 11 मार्च 2026 को हुई थी। शादी के बाद उनके पिता ने महेश्वर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी के समक्ष दावा किया कि उन्हें बाद में अपने रिश्तेदारों से जानकारी मिली कि मोनालिसा का जन्म घर पर नहीं बल्कि सरकारी अस्पताल में हुआ था।
इसके बाद अस्पताल से संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर 30 दिसंबर 2009 की जन्मतिथि वाला प्रमाणपत्र जारी किया गया। यह दस्तावेज संबंधित प्राधिकारी के पास भेजा गया।
इसके बाद नगर पालिका की ओर से पहले दर्ज जन्मतिथि में बदलाव कर दिया गया। 31 मार्च 2026 को महेश्वर के मुख्य नगर पालिका अधिकारी की ओर से आदेश जारी किया गया, जिसमें पहले दर्ज रिकॉर्ड को रद्द करते हुए जन्मतिथि 30 दिसंबर 2009 दर्ज की गई।
यही बदलाव विवाद की मुख्य वजह बन गया।
जन्मतिथि बदलने से क्यों बढ़ गया मामला?
जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 से बदलकर 30 दिसंबर 2009 किए जाने का सीधा असर मोनालिसा की कानूनी उम्र पर पड़ता है। दोनों तारीखों के बीच लगभग दो वर्ष का अंतर है।
अगर 1 जनवरी 2008 को जन्मतिथि माना जाए तो मार्च 2026 में मोनालिसा 18 वर्ष से अधिक उम्र की थीं। वहीं 30 दिसंबर 2009 को जन्मतिथि मानने पर शादी के समय उनकी उम्र 18 वर्ष से कम होती।
इसी वजह से जन्मतिथि में बदलाव केवल एक सामान्य प्रशासनिक सुधार का मामला नहीं रह गया, बल्कि इसका असर शादी और उससे जुड़े कानूनी मामलों पर भी पड़ सकता था।
हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में माना कि जन्मतिथि में इस तरह का बदलाव व्यक्ति के कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकारों और कानूनी स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
हाईकोर्ट ने नगर पालिका का आदेश क्यों रद्द किया?
मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ में जस्टिस गजेंद्र सिंह के समक्ष हुई। अदालत ने नगर पालिका द्वारा किए गए बदलाव की प्रक्रिया पर सवाल उठाया।
कोर्ट के अनुसार, जिस व्यक्ति की जन्मतिथि में बदलाव किया जा रहा था, उसे इस प्रक्रिया में अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर नहीं दिया गया। अदालत ने माना कि केवल पिता को सूचना देना पर्याप्त नहीं था, क्योंकि जन्म रिकॉर्ड में बदलाव का सीधा असर मोनालिसा पर पड़ रहा था।
अदालत ने इसी आधार पर 31 मार्च 2026 के नगर पालिका अधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया।
हालांकि कोर्ट ने यह नहीं कहा कि 1 जनवरी 2008 ही मोनालिसा की सही जन्मतिथि है। अदालत ने साफ तौर पर इस विवाद को अंतिम रूप से तय नहीं किया है।
अब फिर होगी जन्मतिथि की जांच
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब संबंधित अधिकारी को मोनालिसा के पिता की ओर से दिए गए आवेदन पर दोबारा विचार करना होगा। इस बार मोनालिसा को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
इसके बाद उपलब्ध दस्तावेजों, रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों की दलीलों के आधार पर जन्मतिथि को लेकर निर्णय लिया जाएगा।
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि वास्तविक जन्मतिथि तय करने के लिए कोई ऐसा स्कूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जो विवाद को आसानी से खत्म कर सके। इसलिए अब संबंधित अधिकारी को उपलब्ध प्रमाणों की जांच करनी होगी।
मोनालिसा के वकील ने क्या कहा?
मोनालिसा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा अदालत में पेश हुए। उनकी ओर से यह दलील रखी गई कि पुराने दस्तावेजों में लगातार 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि दर्ज रही है।
अदालत के सामने आधार कार्ड समेत अन्य दस्तावेजों का उल्लेख किया गया। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, 28 मई 2015 को जारी आधार कार्ड में भी 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि दर्ज थी।
वहीं दूसरी ओर, मोनालिसा के पिता और राज्य की ओर से यह पक्ष रखा गया कि बाद में सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड के आधार पर 30 दिसंबर 2009 की जन्मतिथि सामने आई थी।
इस तरह दोनों पक्षों के दस्तावेजों में अंतर ने पूरे मामले को जटिल बना दिया है।
शादी और पति से जुड़े मामलों पर क्या असर पड़ेगा?
जन्मतिथि विवाद का असर मोनालिसा की शादी से जुड़े कानूनी मामलों पर भी पड़ा है। 30 दिसंबर 2009 की जन्मतिथि को आधार बनाकर उन्हें शादी के समय नाबालिग माना गया था और इसके बाद उनके पति के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए।
हालांकि हाईकोर्ट के ताजा आदेश को इस रूप में नहीं देखा जा सकता कि अदालत ने शादी या उससे जुड़े आपराधिक मामलों का अंतिम फैसला कर दिया है।
अदालत ने केवल नगर पालिका के उस आदेश को रद्द किया है जिसके जरिए जन्म रिकॉर्ड में बदलाव किया गया था। अब जन्मतिथि की प्रक्रिया दोबारा पूरी होने के बाद ही आगे की कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
कोर्ट के फैसले का सबसे अहम हिस्सा क्या है?
इस मामले में हाईकोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सुनवाई का अधिकार है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसा प्रशासनिक फैसला नहीं लिया जाना चाहिए जिसका उसके अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ता हो, बिना उसे अपनी बात रखने का मौका दिए।
मोनालिसा के मामले में जन्मतिथि में बदलाव का असर उनकी उम्र, शादी, मतदान जैसे नागरिक अधिकारों और अन्य कानूनी मामलों पर पड़ सकता था। इसलिए कोर्ट ने प्रक्रिया में निष्पक्ष सुनवाई को महत्वपूर्ण माना।
इसका मतलब यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने मोनालिसा की जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 घोषित कर दी है। वास्तविक जन्मतिथि को लेकर अंतिम निर्णय अब संबंधित अधिकारी को दोबारा प्रक्रिया पूरी करने के बाद लेना होगा।
अब सबकी नजर अगले फैसले पर
महाकुंभ से वायरल होकर देशभर में पहचान बनाने वाली मोनालिसा भोंसले की जिंदगी में एक बार फिर कानूनी विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। हाईकोर्ट से उन्हें फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन जन्मतिथि का मूल विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
एक तरफ पुराने रिकॉर्ड में 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि दर्ज होने की बात सामने आई है, जबकि दूसरी तरफ सरकारी अस्पताल से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर 30 दिसंबर 2009 का दावा किया गया है।
अब संबंधित अधिकारी दोनों पक्षों को सुनेंगे और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर नए सिरे से फैसला करेंगे। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मोनालिसा की अंतिम और कानूनी रूप से मान्य जन्मतिथि कौन-सी होगी।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति की उम्र और जन्म रिकॉर्ड में बदलाव जैसी महत्वपूर्ण कार्रवाई में उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है। अब आगे की प्रक्रिया में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जन्मतिथि विवाद पर प्रशासनिक स्तर पर क्या नया निर्णय सामने आता है।

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