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रात की ड्यूटी का छिपा खतरा! सालों बाद शरीर में दिखने लगते हैं ये खतरनाक बदलाव



शहर सो जाता है, लेकिन अस्पतालों के वार्ड, कॉल सेंटर की केबिन, फैक्ट्रियों की मशीनें, पुलिस की सुरक्षा चौकियां और कई जरूरी सेवाएं रातभर चलती रहती हैं। इन जगहों पर काम करने वाले हजारों-लाखों लोगों के लिए रात ही उनका कार्यदिवस होती है और दिन आराम करने का समय। नौकरी की मजबूरी या बेहतर कमाई के लिए लोग वर्षों तक नाइट शिफ्ट में काम करते रहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लगातार रात में जागना और दिन में सोना शरीर के लिए कितना भारी पड़ सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, इंसान का शरीर एक प्राकृतिक जैविक घड़ी यानी सर्केडियन रिदम के हिसाब से काम करता है। यह घड़ी शरीर को बताती है कि कब सोना है, कब जागना है, कब भूख लगनी चाहिए और कब शरीर में कुछ हार्मोन का स्तर बढ़ना या कम होना चाहिए। रात में काम करने और दिन में सोने की आदत इस प्राकृतिक व्यवस्था से टकरा सकती है।

शुरुआत में इसका असर केवल थकान, नींद और चिड़चिड़ेपन के रूप में दिखाई देता है, लेकिन लंबे समय तक नाइट शिफ्ट जारी रहने पर नींद, खानपान, मानसिक स्वास्थ्य और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी कई समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

शरीर की अंदरूनी घड़ी आखिर क्यों बिगड़ती है?

हमारे शरीर की प्राकृतिक घड़ी मुख्य रूप से प्रकाश और अंधेरे से प्रभावित होती है। दिन में सूरज की रोशनी शरीर को जागने का संकेत देती है, जबकि रात का अंधेरा नींद के लिए शरीर को तैयार करता है। रात में जब व्यक्ति लगातार कृत्रिम रोशनी में काम करता है और सुबह घर लौटकर सोने की कोशिश करता है तो शरीर को प्राकृतिक संकेतों और वास्तविक दिनचर्या के बीच तालमेल बैठाने में परेशानी हो सकती है।

दिन में सोना रात की नींद जैसा नहीं होता। बाहर की रोशनी, वाहनों का शोर, घर के सदस्यों की आवाजाही, मोबाइल फोन और आसपास की गतिविधियां नींद को बार-बार बाधित कर सकती हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति कई घंटे बिस्तर पर रहने के बावजूद पर्याप्त और गहरी नींद नहीं ले पाता।

यही वजह है कि नाइट शिफ्ट करने वाले कई लोगों को काम के दौरान उनींदापन, कमजोरी, ध्यान लगाने में परेशानी और लगातार थकान महसूस हो सकती है।

नींद पूरी न होने का असर दिमाग पर भी पड़ता है

लगातार नींद का समय बिगड़ने का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। दिमाग भी इससे प्रभावित हो सकता है। पर्याप्त नींद न मिलने पर ध्यान केंद्रित करने, चीजों को याद रखने और तेजी से निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

रात की शिफ्ट में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह समस्या और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि कई नौकरियों में छोटी सी गलती भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। अस्पतालों, फैक्ट्रियों, परिवहन, सुरक्षा सेवाओं और मशीनों से जुड़े काम में अत्यधिक नींद या थकान दुर्घटना का जोखिम बढ़ा सकती है।

लंबे समय तक अनियमित नींद का संबंध मूड में बदलाव, चिड़चिड़ापन, तनाव और कुछ लोगों में चिंता या उदासी जैसी समस्याओं से भी जोड़ा जाता है।

दिल की सेहत पर पड़ सकता है असर

नाइट शिफ्ट को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक हृदय स्वास्थ्य है। लंबे समय तक अनियमित काम के घंटे, नींद की कमी, तनाव, कम शारीरिक गतिविधि और असंतुलित खानपान मिलकर हृदय संबंधी जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के संयुक्त विश्लेषण ने लंबे काम के घंटों को हृदय रोग और स्ट्रोक के बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा है। हालांकि हर नाइट शिफ्ट कर्मचारी को ऐसी बीमारी होगी, ऐसा नहीं है, लेकिन लंबे समय तक काम और आराम के बीच असंतुलन को नजरअंदाज करना उचित नहीं माना जाता।

विशेष रूप से ऐसे कर्मचारियों को समय-समय पर ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, वजन और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की जांच कराते रहना चाहिए।

रात का खाना बना सकता है पेट की परेशानी

नाइट शिफ्ट का सबसे आम असर खानपान की आदतों पर दिखाई देता है। रात के 12 या 1 बजे भूख लगने पर कर्मचारी अक्सर चाय, कॉफी, बिस्कुट, नमकीन, पैकेट वाले स्नैक्स या मीठी चीजों का सहारा लेते हैं।

कई बार पूरी रात काम करने के बाद सुबह भारी भोजन किया जाता है और उसके तुरंत बाद सोने की तैयारी होती है। ऐसी दिनचर्या पेट के लिए परेशानी पैदा कर सकती है।

अनियमित समय पर खाना, ज्यादा तला-भुना भोजन और देर रात भारी भोजन से कुछ लोगों में गैस, एसिडिटी, कब्ज और पेट फूलने जैसी शिकायतें बढ़ सकती हैं। लंबे समय में खराब खानपान वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।

वजन और ब्लड शुगर बढ़ने का जोखिम

नाइट शिफ्ट करने वालों में शारीरिक गतिविधि कम होने और भोजन के समय में बदलाव के कारण वजन बढ़ने की समस्या देखी जा सकती है। रात में बार-बार कैलोरी वाली चीजें खाने की आदत और दिन में पर्याप्त व्यायाम न कर पाना इस समस्या को और बढ़ा सकता है।

कुछ अध्ययनों में शिफ्ट वर्क और टाइप-2 डायबिटीज, मोटापे तथा ब्लड प्रेशर जैसे मेटाबॉलिक जोखिमों के बीच संबंध पाया गया है।

इसलिए नाइट शिफ्ट करने वालों के लिए केवल नींद ही नहीं, बल्कि भोजन और शारीरिक गतिविधि पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है।

कैंसर को लेकर भी उठी है चिंता

रात की शिफ्ट और लंबे समय तक शरीर की जैविक घड़ी में बदलाव को लेकर कैंसर के संभावित जोखिम पर भी वैज्ञानिक शोध हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय कैंसर शोध एजेंसी यानी IARC ने रात की शिफ्ट से जुड़े काम को ऐसी श्रेणी में रखा है जिसमें कैंसर के जोखिम की संभावना को लेकर सीमित लेकिन महत्वपूर्ण वैज्ञानिक चिंता मौजूद है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि नाइट शिफ्ट करने वाले व्यक्ति को कैंसर होना तय है। बल्कि इसका मतलब यह है कि इस क्षेत्र में स्वास्थ्य जोखिम को समझने के लिए वैज्ञानिक प्रमाणों पर लगातार अध्ययन किया गया है और लंबे समय तक रात की शिफ्ट को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है?

नाइट शिफ्ट के कारण कभी-कभार थकान होना सामान्य हो सकता है, लेकिन कुछ लक्षणों को केवल नौकरी की थकान मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

अगर पर्याप्त आराम के बाद भी लगातार अत्यधिक थकान रहती है, बार-बार चक्कर आते हैं, सीने में दर्द या भारीपन महसूस होता है, दिल की धड़कन असामान्य लगती है, लगातार सिरदर्द रहता है या ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर बढ़ा हुआ मिल रहा है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

इसी तरह तेज खर्राटे, नींद में सांस रुकने जैसा महसूस होना, दिन में अत्यधिक नींद आना या लंबे समय तक नींद न आने की समस्या भी जांच की जरूरत का संकेत हो सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े लक्षणों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार चिड़चिड़ापन, अत्यधिक तनाव, उदासी, चिंता या ध्यान केंद्रित करने में लगातार परेशानी होने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

नाइट शिफ्ट छोड़ना संभव नहीं तो क्या करें?

हर व्यक्ति के लिए नाइट शिफ्ट छोड़ना संभव नहीं होता। अस्पताल, पुलिस, सुरक्षा, परिवहन, उद्योग और कई अन्य जरूरी सेवाओं में रात की ड्यूटी आवश्यक होती है। ऐसे में कुछ आदतों के जरिए संभावित नुकसान को कम करने की कोशिश की जा सकती है।

काम खत्म करने के बाद सोने के लिए कमरे को यथासंभव अंधेरा, शांत और आरामदायक रखें। सोने और उठने का समय रोज लगभग एक जैसा रखने की कोशिश करें। छुट्टी के दिन भी पूरी दिनचर्या को अचानक उलटने से बचें।

नाइट शिफ्ट के दौरान बहुत ज्यादा चाय या कॉफी लेने से बचें, खासकर शिफ्ट खत्म होने से कुछ घंटे पहले। भोजन हल्का और संतुलित रखें। फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन को आहार में शामिल किया जा सकता है।

साथ ही नियमित हल्की से मध्यम शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त पानी और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी महत्वपूर्ण हैं।

सबसे जरूरी है शरीर के संकेतों को समझना

नाइट शिफ्ट अपने आप में हर व्यक्ति के लिए बीमारी का कारण नहीं है, लेकिन लंबे समय तक रात में काम करने से नींद, जैविक घड़ी, खानपान और जीवनशैली में बदलाव जरूर आ सकते हैं। इन बदलावों को नजरअंदाज करने के बजाय शरीर के संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है।

अगर लगातार थकान, नींद की परेशानी, वजन बढ़ना, ब्लड प्रेशर या शुगर में बदलाव, पाचन संबंधी समस्या या मानसिक तनाव बढ़ रहा है, तो इसे सिर्फ नौकरी का सामान्य हिस्सा मानना सही नहीं होगा।

नाइट शिफ्ट करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि काम की जरूरत के साथ शरीर की जरूरतों को भी महत्व दिया जाए। नियमित नींद, संतुलित भोजन, व्यायाम और समय पर स्वास्थ्य जांच लंबे समय तक स्वस्थ रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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