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भारत ने चला ऐसा दांव कि चावल भेजने का खर्च 350 डॉलर से सीधे 90 डॉलर! इराक के लिए 1 लाख टन की खेप ने मचाई हलचल



नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब समुद्री व्यापार और माल की सप्लाई पर भी साफ दिखाई देने लगा है। समुद्री जहाजों की आवाजाही में आ रही बाधाओं, कंटेनरों की कमी और बढ़ती माल ढुलाई लागत ने भारतीय निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। खास तौर पर बासमती चावल के निर्यातकों पर इसका असर पड़ रहा है, क्योंकि भारत के बासमती चावल का बड़ा बाजार पश्चिम एशिया में है।

ऐसे मुश्किल समय में भारतीय चावल निर्यातकों ने एक ऐसा रास्ता निकाला है, जिसने शिपिंग लागत को लेकर पूरी तस्वीर बदल दी है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ यानी IREF ने सिंगापुर की कंपनी Eximwala Solutions Pte. Ltd. के साथ मिलकर इराक को 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की व्यवस्था की है। इस पूरी खेप को कंटेनरों के बजाय बड़े मालवाहक जहाजों के जरिए थोक में भेजा जा रहा है।

सबसे खास बात यह है कि इस व्यवस्था से माल ढुलाई की लागत में भारी कमी आने का अनुमान है। जहां कंटेनर के जरिए चावल भेजने के लिए करीब 350 डॉलर प्रति टन का खर्च सामने आ रहा था, वहीं बड़े मालवाहक जहाजों से यह लागत करीब 90 डॉलर प्रति टन तक आने का अनुमान है।

यानी एक टन चावल पर करीब 260 डॉलर तक की संभावित बचत हो सकती है।

कंटेनर छोड़कर थोक जहाजों का सहारा

पश्चिम एशिया में मौजूदा तनाव के बीच कंटेनर उपलब्धता और शिपिंग लागत दोनों ही निर्यातकों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐसे में बड़े जहाजों से एक साथ हजारों टन चावल भेजने का मॉडल भारतीय निर्यातकों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस व्यवस्था के तहत तीन बड़े मालवाहक जहाजों को इराक के उम्म कसर बंदरगाह के लिए निर्धारित किया गया है। इन जहाजों के जरिए कुल 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की योजना है।

IREF के अनुसार, MV LAMAR S नाम का जहाज 36,810 टन चावल लेकर उम्म कसर बंदरगाह पहुंच चुका है। जहाज को बर्थ नंबर 3 पर लगाया गया है और चावल उतारने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

इसके अलावा MV LOLO GATE और MV OUTLANDER को भी इस अभियान में शामिल किया गया है। MV LOLO GATE के जरिए करीब 25,500 टन और MV OUTLANDER के जरिए करीब 39,900 टन चावल भेजा जाना है।

इस तरह तीनों जहाजों की क्षमता को जोड़ने पर कुल मात्रा 1,02,210 टन बैठती है।

350 डॉलर से 90 डॉलर प्रति टन तक कैसे आया खर्च?

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा माल ढुलाई की लागत को लेकर हो रही है। कंटेनर शिपिंग में भारतीय निर्यातकों को करीब 350 डॉलर प्रति टन का कोटेशन मिल रहा था। लेकिन बड़ी मात्रा में चावल को थोक जहाजों से भेजने पर यह खर्च करीब 90 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान लगाया गया है।

यानी दोनों विकल्पों के बीच करीब 260 डॉलर प्रति टन का अंतर है।

अगर 1,02,210 टन चावल की पूरी मात्रा पर 260 डॉलर प्रति टन की संभावित बचत को देखा जाए तो सकल अंतर करीब 2.66 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है।

हालांकि, इसे सीधे-सीधे अंतिम मुनाफा या शुद्ध बचत नहीं माना जा सकता। वास्तविक बचत बंदरगाह शुल्क, लोडिंग और अनलोडिंग खर्च, बीमा, अनुबंध की शर्तों और अन्य लॉजिस्टिक्स लागत पर निर्भर करेगी।

फिर भी इतना बड़ा अंतर यह बताता है कि मौजूदा परिस्थितियों में शिपिंग मॉडल में बदलाव निर्यातकों के लिए कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।

पश्चिम एशिया में क्यों है भारतीय बासमती की इतनी मांग?

भारत दुनिया के प्रमुख बासमती चावल निर्यातकों में शामिल है और पश्चिम एशिया भारतीय बासमती के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक है।

IREF के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने पश्चिम एशिया को करीब 45.64 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया। इसकी कीमत लगभग ₹34,284 करोड़ रही।

यह मात्रा भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का करीब 70 प्रतिशत बताई गई है।

अगर इसमें गैर-बासमती चावल को भी शामिल कर लिया जाए तो पश्चिम एशिया को भारत का कुल चावल निर्यात करीब 56.48 लाख टन रहा, जिसकी कीमत लगभग ₹39,657 करोड़ थी।

इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पश्चिम एशिया में समुद्री परिवहन से जुड़ी किसी भी बड़ी समस्या का सीधा असर भारतीय चावल कारोबार पर पड़ सकता है।

सऊदी अरब, ईरान और इराक सबसे बड़े बाजारों में

पश्चिम एशिया में भारत के बासमती चावल के कई बड़े खरीदार हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक सऊदी अरब इस क्षेत्र में भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार रहा।

सऊदी अरब को करीब ₹8,324 करोड़ का बासमती चावल निर्यात किया गया। इसके बाद ईरान में ₹6,970 करोड़, इराक में ₹5,583 करोड़ और संयुक्त अरब अमीरात में ₹4,132 करोड़ के बासमती चावल का निर्यात हुआ।

इन आंकड़ों के बीच इराक को 1 लाख टन से ज्यादा चावल भेजने की मौजूदा व्यवस्था को काफी अहम माना जा रहा है।

IREF के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में इराक ने भारत से करीब 7.64 लाख टन बासमती चावल आयात किया था। इससे साफ है कि इराक भारतीय चावल निर्यातकों के लिए कोई छोटा बाजार नहीं है।

निर्यातकों को ही नहीं, विदेशी खरीदारों को भी फायदा

शिपिंग लागत में कमी का फायदा सिर्फ भारतीय निर्यातकों तक सीमित नहीं रह सकता। अगर लॉजिस्टिक्स खर्च कम होता है तो विदेशी खरीदारों के लिए भी भारतीय चावल की कीमत अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकती है।

IREF के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग के मुताबिक भारत के बासमती चावल निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत पश्चिम एशिया जाता है। ऐसे में अगर समुद्री परिवहन महंगा होता है तो भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

थोक जहाजों का इस्तेमाल इसी चुनौती से निपटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

अगर यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में बड़ी मात्रा में चावल भेजने के लिए कंटेनर पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे उन परिस्थितियों में निर्यातकों को राहत मिल सकती है, जब कंटेनर महंगे हों या आसानी से उपलब्ध न हों।

क्या यह मॉडल आगे भी काम करेगा?

हालांकि इस मॉडल ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। हर निर्यात खेप को थोक जहाज से भेजना संभव नहीं होगा। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में माल, उपयुक्त जहाज, बंदरगाह की सुविधाएं और खरीदार की आवश्यकताओं का मेल जरूरी है।

इसके अलावा जहाजों की उपलब्धता, बंदरगाह पर माल उतारने की क्षमता, स्थानीय शुल्क और शिपमेंट में लगने वाला समय भी अंतिम लागत को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए 90 डॉलर प्रति टन का अनुमान आकर्षक जरूर है, लेकिन वास्तविक बचत का पता पूरी प्रक्रिया पूरी होने और सभी खर्चों को जोड़ने के बाद ही चलेगा।

फिर भी मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय चावल निर्यातकों द्वारा खोजा गया यह विकल्प महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर बड़े पैमाने पर थोक शिपिंग सफल साबित होती है, तो इससे भारतीय बासमती चावल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

असली फायदा कहां होगा?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 1,02,210 टन चावल की यह शिपिंग व्यवस्था भविष्य में एक नए मॉडल की शुरुआत करेगी? अगर बड़े जहाजों से थोक में चावल भेजने पर लागत लगातार कम रहती है, तो भारतीय निर्यातक पश्चिम एशिया के बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकते हैं।

दूसरी ओर, अगर समुद्री तनाव लंबे समय तक जारी रहता है और कंटेनर शिपिंग महंगी बनी रहती है, तो ऐसे वैकल्पिक लॉजिस्टिक्स मॉडल की जरूरत और बढ़ सकती है।

यानी इराक भेजी जा रही यह सिर्फ एक बड़ी चावल खेप नहीं है। यह उस समय भारतीय निर्यातकों की एक बड़ी रणनीतिक कोशिश भी है, जब समुद्री परिवहन की लागत और उपलब्धता दोनों कारोबार के लिए चुनौती बनी हुई हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या 90 डॉलर प्रति टन की अनुमानित शिपिंग लागत वास्तव में भारतीय चावल निर्यात के लिए गेमचेंजर साबित होती है।

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