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न दर्द, न कोई बड़ा संकेत… फिर भी किडनी को नुकसान! महिलाओं को लेकर सामने आई चौंकाने वाली बात



महिलाओं की सेहत को लेकर एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चेतावनी सामने आई है। किडनी की बीमारी यानी क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) महिलाओं में अक्सर समय रहते पहचान में नहीं आ पाती। इसके कारण बीमारी की निगरानी, विशेषज्ञ से सलाह और जरूरी उपचार शुरू होने में देरी हो सकती है। अमेरिकी हार्ट एसोसिएशन (American Heart Association) के 2026 के एक वैज्ञानिक बयान में महिलाओं की किडनी हेल्थ पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं की जैविक संरचना, हार्मोनल बदलाव, गर्भावस्था, मेनोपॉज और कुछ सामाजिक परिस्थितियां किडनी की सेहत को प्रभावित कर सकती हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि किडनी की बीमारी शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देती। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन अंदर ही अंदर किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार CKD की शुरुआती पहचान के लिए रक्त में क्रिएटिनिन से eGFR और पेशाब में एल्ब्यूमिन जैसे परीक्षण महत्वपूर्ण हैं।

महिलाओं में किडनी बीमारी की पहचान में क्यों हो सकती है देरी?

किडनी की कार्यक्षमता का अनुमान लगाने के लिए आमतौर पर रक्त में क्रिएटिनिन के स्तर का इस्तेमाल किया जाता है। क्रिएटिनिन मांसपेशियों से बनने वाला एक अपशिष्ट पदार्थ है। महिलाओं में सामान्यतः पुरुषों की तुलना में मांसपेशियों का द्रव्यमान कम होने के कारण क्रिएटिनिन का स्तर भी अलग हो सकता है। इससे कुछ परिस्थितियों में किडनी की वास्तविक स्थिति का अनुमान चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के वैज्ञानिक बयान में कहा गया है कि महिलाओं में किडनी की बीमारी कभी-कभी देर से पहचानी जा सकती है और उन्हें किडनी विशेषज्ञ तक पहुंचने में भी देरी हो सकती है।

2026 में अमेरिकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के एक अध्ययन में भी किडनी बीमारी के शुरुआती संकेत मिलने और औपचारिक निदान दर्ज होने के बीच लंबे अंतर की बात सामने आई। इस विश्लेषण में महिलाओं में यह देरी पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर महिला में किडनी बीमारी की पहचान देर से होगी, लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि महिलाओं में असामान्य रक्त या पेशाब की जांच को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

किडनी बीमारी की सबसे बड़ी समस्या है कि शुरुआत में लक्षण नहीं दिखते

किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण कार्य करती है। जब किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है, तो शुरुआती दौर में शरीर इसकी भरपाई कर सकता है। इसी वजह से व्यक्ति को बीमारी का पता काफी देर से चल सकता है।

बाद के चरणों में पैरों, टखनों या हाथों में सूजन, अत्यधिक थकान, सांस फूलना, पेशाब में खून, रात में बार-बार पेशाब आना, त्वचा में खुजली, मांसपेशियों में ऐंठन, भूख कम लगना या मतली जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि इन लक्षणों के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर किडनी बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

गर्भावस्था और किडनी की सेहत का भी है गहरा संबंध

महिलाओं की किडनी हेल्थ में गर्भावस्था एक महत्वपूर्ण चरण है। विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं को पहले से CKD है, उनमें गर्भावस्था के दौरान कुछ जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।

वहीं गर्भावस्था के दौरान होने वाली कुछ समस्याएं भविष्य में किडनी और हृदय की सेहत से जुड़ी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए प्री-एक्लेम्पसिया यानी गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर और उससे जुड़ी स्थिति को भविष्य में किडनी तथा हृदय संबंधी जोखिम से जोड़ा गया है।

इसलिए गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए रक्त-पेशाब परीक्षणों को नियमित रूप से कराना महत्वपूर्ण है।

मेनोपॉज के बाद भी महिलाओं को रहना चाहिए सावधान

महिलाओं के शरीर में मेनोपॉज के दौरान कई हार्मोनल बदलाव होते हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के वैज्ञानिक बयान के अनुसार उम्र बढ़ने और मेनोपॉज के साथ होने वाले बदलाव किडनी की सेहत को प्रभावित करने वाले कई जोखिम कारकों से जुड़े हो सकते हैं।

मेनोपॉज के बाद मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल जैसे जोखिम बढ़ सकते हैं, जो किडनी की बीमारी के खतरे से भी जुड़े हैं। इसलिए इस उम्र में केवल स्त्री रोग संबंधी स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और किडनी फंक्शन पर भी ध्यान देना जरूरी है।

लुपस और PCOS जैसी स्थितियों को भी नजरअंदाज न करें

कुछ ऐसी स्वास्थ्य स्थितियां हैं जो महिलाओं में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती हैं। वैज्ञानिक बयान में लुपस जैसी ऑटोइम्यून बीमारी और पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS को किडनी के स्वास्थ्य से जुड़े संभावित जोखिमों में शामिल किया गया है।

विशेष रूप से लुपस नेफ्राइटिस में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली किडनी को प्रभावित कर सकती है। इसलिए जिन महिलाओं को लुपस या कोई दूसरी ऑटोइम्यून बीमारी है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार किडनी की निगरानी करानी चाहिए।

सिर्फ बीमारी ही नहीं, इलाज तक पहुंच भी बड़ी चुनौती

महिलाओं की किडनी हेल्थ से जुड़ी समस्या केवल बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों ने उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में भी अंतर की ओर ध्यान दिलाया है।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार महिलाओं में डायलिसिस शुरू होने और किडनी ट्रांसप्लांट तक पहुंच के मामले में भी अंतर देखा गया है। इसके पीछे आर्थिक कठिनाइयां, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की कमी, परिवार की जिम्मेदारियां, सामाजिक परिस्थितियां और उपचार तक पहुंच जैसी कई वजहें हो सकती हैं।

इसी कारण विशेषज्ञ महिलाओं की किडनी संबंधी रिसर्च में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी और महिला-पुरुष के बीच अलग-अलग परिणामों का विश्लेषण करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

कौन सी महिलाएं नियमित किडनी जांच को लेकर ज्यादा सतर्क रहें?

हर महिला को अपनी स्थिति के अनुसार डॉक्टर से स्वास्थ्य जांच की सलाह लेनी चाहिए। खास तौर पर जिन महिलाओं को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या पहले से किडनी से जुड़ी समस्या है, उन्हें किडनी की जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

जिन महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर या प्री-एक्लेम्पसिया जैसी समस्या रही हो, उन्हें भी आगे के जीवन में अपने डॉक्टर से किडनी और हृदय संबंधी जोखिम के बारे में चर्चा करनी चाहिए। इसी तरह लुपस जैसी ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित महिलाओं में किडनी की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण हो सकती है।

कौन से टेस्ट किडनी की बीमारी पकड़ने में मदद करते हैं?

किडनी की स्थिति जानने के लिए डॉक्टर आमतौर पर रक्त और पेशाब की जांच का इस्तेमाल करते हैं। रक्त में क्रिएटिनिन के आधार पर eGFR का अनुमान लगाया जाता है, जबकि पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच किडनी से प्रोटीन के असामान्य रिसाव का संकेत दे सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार eGFR और यूरिन एल्ब्यूमिन जैसे सरल परीक्षण प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में CKD की पहचान में मदद कर सकते हैं।

इन जांचों की जरूरत हर व्यक्ति में समान नहीं होती। इसलिए किसी भी टेस्ट को खुद से कराने के बजाय डॉक्टर से अपनी उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और जोखिम कारकों के आधार पर सलाह लेना बेहतर है।

महिलाओं को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?

किडनी को स्वस्थ रखने के लिए ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना और धूम्रपान से बचना महत्वपूर्ण है। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखना किडनी की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है।

साथ ही बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द की दवाओं या अन्य दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। यदि किसी महिला को पेशाब में खून, लगातार सूजन, असामान्य थकान, पेशाब में बदलाव या अन्य चिंताजनक लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।

 महिलाओं की किडनी को लेकर जागरूकता अब पहले से ज्यादा जरूरी

2026 में सामने आए वैज्ञानिक विश्लेषण महिलाओं की किडनी हेल्थ को अलग नजरिए से देखने की जरूरत पर जोर देते हैं। समस्या केवल यह नहीं है कि किडनी की बीमारी महिलाओं में हो सकती है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि बीमारी की पहचान और उपचार में देरी न हो।

किडनी की बीमारी कई बार चुपचाप आगे बढ़ती है। इसलिए केवल लक्षण आने का इंतजार करना सही रणनीति नहीं हो सकती, खासकर तब जब महिला को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, ऑटोइम्यून बीमारी या गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का इतिहास हो।

विशेषज्ञों का संदेश साफ है—महिलाओं की किडनी हेल्थ को उनकी पूरी स्वास्थ्य यात्रा का हिस्सा मानना जरूरी है। समय पर रक्त और पेशाब की जांच, जोखिम कारकों की पहचान और डॉक्टर से नियमित सलाह बीमारी को गंभीर स्तर तक पहुंचने से रोकने में मदद कर सकती है।

यह खबर स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी पर आधारित है। किसी भी लक्षण या जांच रिपोर्ट को देखकर खुद से बीमारी का निष्कर्ष न निकालें। लगातार या चिंताजनक लक्षण होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

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