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मैनेजर का WhatsApp हुआ हैक, चैटिंग के जरिए उड़ाए ₹75 लाख! फिर पुलिस के हाथ लगा 1.55 करोड़ का बड़ा सुराग



साइबर अपराध की दुनिया में अपराधी अब सिर्फ फर्जी कॉल, लिंक या ओटीपी के जरिए ही लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग एप की पहचान का इस्तेमाल कर बड़ी रकम की धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं। ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक मैनेजर का व्हाट्सऐप अकाउंट हैक कर चैटिंग के माध्यम से कथित तौर पर 75 लाख रुपये की ठगी कर ली गई।

मामले की जांच में जुटी साइबर क्राइम थाना और सर्विलांस टीम ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपितों के कब्जे से तीन एंड्रायड मोबाइल फोन, नेपाली मोबाइल नंबर और एक चेकबुक बरामद हुई है। जांच के दौरान साइबर ठगी से जुड़े बैंक खातों में करीब 1 करोड़ 55 लाख रुपये की रकम होल्ड कराई गई है। पुलिस अब इस रकम को नियमानुसार वापस कराने की प्रक्रिया में जुटी है।

यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 75 लाख रुपये की कथित ठगी के पीछे सिर्फ एक मोबाइल या बैंक खाते का इस्तेमाल नहीं, बल्कि कई स्तरों पर फैले साइबर नेटवर्क की आशंका सामने आई है।

व्हाट्सऐप हैक हुआ और चैटिंग के जरिए हो गई लाखों की ठगी

पुलिस के अनुसार, साइबर अपराधियों ने एक मैनेजर के व्हाट्सऐप अकाउंट को अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके बाद आरोपितों ने चैटिंग के जरिए बातचीत की और कथित तौर पर भरोसे का फायदा उठाते हुए 75 लाख रुपये की धोखाधड़ी को अंजाम दिया।

इस तरह के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि पीड़ित को शुरुआत में यह अंदाजा ही नहीं हो पाता कि उसके परिचित व्यक्ति या अधिकारी के नाम से बातचीत करने वाला कोई दूसरा व्यक्ति हो सकता है। व्हाट्सऐप पर प्रोफाइल फोटो, नाम और पुरानी बातचीत मौजूद होने की वजह से सामने वाले को संदेश वास्तविक लग सकता है।

हालांकि, इस मामले में मैनेजर का व्हाट्सऐप किस तकनीकी तरीके से हैक किया गया और 75 लाख रुपये किस प्रक्रिया से अलग-अलग खातों तक पहुंचाए गए, इसका विस्तृत तकनीकी विवरण अभी पुलिस की ओर से सार्वजनिक नहीं किया गया है।

तीन आरोपित गिरफ्तार, अलग-अलग जिलों से है संबंध

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. यशवीर सिंह के निर्देशन में की गई कार्रवाई के दौरान पुलिस ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपितों की पहचान विनोद कुमार मिश्रा, लवकेश कुमार सिंह और कमल यादव के रूप में हुई है।

पुलिस के अनुसार, विनोद कुमार मिश्रा महराजगंज जिले के सोनौली क्षेत्र का रहने वाला है। दूसरा आरोपित लवकेश कुमार सिंह बाराबंकी जिले के रामनगर थाना क्षेत्र के सेमरा गांव का निवासी बताया गया है। तीसरे आरोपित कमल यादव का संबंध महराजगंज जिले के चौक क्षेत्र स्थित नक्सा बक्सा गांव से बताया गया है।

पुलिस ने तीनों को अंतरराज्यीय साइबर ठगी गिरोह से जुड़ा बताया है। हालांकि, गिरोह में और कितने लोग शामिल हैं और इन आरोपितों की भूमिका किस स्तर तक थी, इसका पता विस्तृत जांच के बाद ही चल सकेगा।

मोबाइल फोन और चेकबुक बनी जांच की अहम कड़ी

गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने आरोपितों के कब्जे से तीन एंड्रायड मोबाइल फोन बरामद किए हैं। इसके अलावा एक नेपाली मोबाइल नंबर और चेकबुक भी बरामद होने की बात सामने आई है।

मोबाइल फोन साइबर अपराध की जांच में महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य साबित हो सकते हैं। पुलिस इन उपकरणों में मौजूद चैट, कॉल रिकॉर्ड, संपर्क नंबर, बैंकिंग एप से जुड़ी गतिविधियों और अन्य डिजिटल जानकारी की जांच कर सकती है।

वहीं, चेकबुक से जुड़े बैंक खाते की भी जांच की जा सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि ठगी की रकम को किन खातों के जरिए आगे भेजा गया या किन लोगों ने लेनदेन में भूमिका निभाई।

हालांकि, किसी आरोपित के पास नेपाली मोबाइल नंबर मिलने मात्र से उसके किसी विदेशी साइबर नेटवर्क से जुड़े होने की पुष्टि नहीं होती। इस पहलू की वास्तविक स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

1.55 करोड़ रुपये होल्ड, 75 लाख की ठगी से बड़ा नेटवर्क होने की आशंका

इस मामले में पुलिस की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक करीब 1 करोड़ 55 लाख रुपये की धनराशि होल्ड कराना है। पुलिस के अनुसार, साइबर ठगी से जुड़े बैंक खातों में यह रकम मौजूद थी, जिसे आगे के लेनदेन से रोकने के लिए होल्ड कराया गया है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि होल्ड कराई गई रकम 75 लाख रुपये की कथित ठगी से अधिक है। इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि पूरी 1.55 करोड़ रुपये की रकम इसी एक घटना से संबंधित हो। संभव है कि संबंधित खातों में अन्य संदिग्ध लेनदेन भी हुए हों। इसकी पुष्टि बैंकिंग रिकॉर्ड और पुलिस की जांच के बाद ही हो सकेगी।

पुलिस के मुताबिक, अब इस धनराशि को संबंधित प्रक्रिया के तहत वापस कराने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, रकम होल्ड होना और पीड़ित के खाते में पैसा वापस आ जाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। वास्तविक वापसी बैंकिंग और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होगी।

क्या दूसरे लोगों को भी बनाया गया निशाना?

तीन आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने अब एक बड़ा सवाल यह है कि क्या इस नेटवर्क ने सिर्फ एक मैनेजर को निशाना बनाया था या इससे पहले भी कई लोगों से इसी तरह ठगी की गई।

साइबर अपराध में अक्सर एक बैंक खाते, मोबाइल नंबर या डिजिटल पहचान का इस्तेमाल एक से अधिक मामलों में किया जा सकता है। ऐसे में पुलिस आरोपितों के मोबाइल फोन और बैंक खातों की जांच के जरिए पुराने लेनदेन और संभावित पीड़ितों की जानकारी जुटा सकती है।

अगर जांच में कई खातों और अलग-अलग राज्यों के लेनदेन का कनेक्शन सामने आता है, तो यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है।

व्हाट्सऐप पर भरोसा करना पड़ सकता है भारी

आज के समय में व्हाट्सऐप व्यक्तिगत और कारोबारी बातचीत का अहम माध्यम बन चुका है। यही वजह है कि साइबर अपराधियों की नजर भी ऐसे प्लेटफॉर्म पर रहती है।

अगर किसी परिचित व्यक्ति, बॉस, मैनेजर, कारोबारी या रिश्तेदार के व्हाट्सऐप से अचानक पैसे भेजने का संदेश आता है, तो केवल व्हाट्सऐप चैट के आधार पर भुगतान करना जोखिम भरा हो सकता है।

खासकर तब, जब सामने वाला जल्दबाजी करे या बैंक खाते में बड़ी रकम भेजने के लिए दबाव बनाए। ऐसी स्थिति में उसी व्यक्ति को सामान्य फोन कॉल या किसी दूसरे विश्वसनीय माध्यम से संपर्क कर पुष्टि करना बेहद जरूरी है।

OTP और बैंकिंग जानकारी साझा करने से बचें

साइबर ठगी से बचने के लिए किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने से पहले उसकी विश्वसनीयता जांचनी चाहिए। किसी अज्ञात व्यक्ति के कहने पर मोबाइल में कोई संदिग्ध एप डाउनलोड करना या स्क्रीन शेयर करना भी जोखिम पैदा कर सकता है।

इसके अलावा बैंकिंग पासवर्ड, यूपीआई पिन, ओटीपी, कार्ड की जानकारी या अन्य संवेदनशील विवरण किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए।

अगर व्हाट्सऐप अकाउंट से जुड़ी किसी संदिग्ध गतिविधि का पता चले, तो तुरंत अपने मोबाइल नंबर, ईमेल और संबंधित अकाउंट की सुरक्षा जांचनी चाहिए।

ठगी होने पर तुरंत 1930 पर करें शिकायत

अगर किसी व्यक्ति के साथ साइबर धोखाधड़ी हो जाती है, तो शिकायत करने में देरी नहीं करनी चाहिए। भारत में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत की जा सकती है।

जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होती है, उतनी जल्दी संबंधित बैंक खातों में रकम को होल्ड कराने की संभावना बढ़ सकती है। इसके साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है।

तीन गिरफ्तारियों से जांच को मिली नई दिशा

फिलहाल इस मामले में तीन आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की जांच आगे बढ़ गई है। तीन एंड्रायड मोबाइल फोन, नेपाली मोबाइल नंबर और चेकबुक की बरामदगी को जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सबसे अहम बात यह है कि करीब 1.55 करोड़ रुपये की संदिग्ध धनराशि होल्ड कराई गई है, जबकि मामले में 75 लाख रुपये की कथित ठगी की बात सामने आई है।

अब पुलिस डिजिटल साक्ष्यों, बैंक खातों, मोबाइल रिकॉर्ड और आरोपितों के संपर्कों की जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि इस साइबर नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा है और इसके पीछे कौन-कौन लोग सक्रिय हैं।

फिलहाल तीनों आरोपित पुलिस की कार्रवाई के दायरे में हैं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा। यह मामला एक बार फिर बताता है कि डिजिटल दुनिया में किसी परिचित के नाम और व्हाट्सऐप चैट पर आंख मूंदकर भरोसा करना कितना महंगा साबित हो सकता है।

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