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पुतिन से मिलने मॉस्को पहुंचा ईरान, बंद कमरे में क्या हुआ? यूरेनियम और अमेरिका को लेकर सामने आया रूस का बड़ा प्लान!



मॉस्को में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान रूस-ईरान संबंधों और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव की ओर खींच दिया है। पेजेश्कियान 27 अक्टूबर 2026 को मॉस्को पहुंचे थे, जहां उन्होंने गैस एक्सपोर्टिंग कंट्रीज फोरम यानी GECF के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया और इसके साथ ही पुतिन के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी की।

यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और क्षेत्रीय युद्ध को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं। दूसरी तरफ रूस लंबे समय से ईरान के साथ राजनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा सहयोग बढ़ा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मॉस्को सिर्फ तेहरान का रणनीतिक साथी बना रहेगा या फिर अमेरिका और ईरान के बीच किसी संभावित समझौते के लिए मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकता है?

पुतिन के सामने पेजेश्कियान ने क्या कहा?

मॉस्को में पुतिन के साथ बैठक के दौरान पेजेश्कियान ने संकेत दिया कि ईरान रूस के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय देशों में इतनी क्षमता है कि वे अपने विवादों का समाधान अमेरिका पर निर्भर हुए बिना कर सकते हैं।

ईरानी राष्ट्रपति ने विज्ञान, उद्योग, संस्कृति, सुरक्षा और रक्षा सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई। वहीं पुतिन ने कहा कि रूस और ईरान के बीच व्यापार बढ़ रहा है और 2026 के पहले आठ महीनों में द्विपक्षीय व्यापार में 10.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

यानी इस मुलाकात का एजेंडा केवल युद्ध तक सीमित नहीं था। ऊर्जा, व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा और दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

क्या रूस अमेरिका और ईरान के बीच डील करा सकता है?

यही इस पूरी मुलाकात का सबसे दिलचस्प पहलू है।

रूस एक तरफ ईरान का रणनीतिक साझेदार है, तो दूसरी तरफ मॉस्को ने यह संकेत भी दिया है कि वह पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक भूमिका निभाने को तैयार है। अक्टूबर की शुरुआत में पुतिन ने युद्ध समाप्त करने की कोशिशों में मध्यस्थता में भाग लेने की इच्छा जताई थी। दूसरी तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत लंबे समय से मुश्किलों में फंसी हुई है।

ऐसे में रूस के पास एक ऐसा चैनल मौजूद है जिसके जरिए वह तेहरान तक संदेश पहुंचा सकता है।

लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ईरान और अमेरिका के बीच सिर्फ राजनीतिक अविश्वास ही नहीं है, बल्कि परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, सैन्य सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे कई गंभीर मुद्दे भी हैं।

इसलिए केवल पुतिन और पेजेश्कियान की मुलाकात को किसी बड़ी डील का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

परमाणु मुद्दा बना सबसे बड़ा सवाल

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया की चिंता का सबसे बड़ा कारण उसका 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार रहा है।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के अनुसार, 13 जून 2025 तक ईरान के पास लगभग 440.9 किलोग्राम यूरेनियम 60 प्रतिशत तक संवर्धित था। यह आंकड़ा अमेरिकी और इजरायली हमलों से पहले की स्थिति को दर्शाता है। बाद के हमलों के बाद IAEA इस पूरे भंडार की मौजूदा स्थिति को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं कर पाई है।

यही बात अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम को हथियार-ग्रेड स्तर के करीब माना जाता है, हालांकि केवल यूरेनियम का उच्च स्तर तक संवर्धित होना अपने आप में परमाणु हथियार तैयार होने का प्रमाण नहीं है। परमाणु हथियार बनाने के लिए कई अन्य तकनीकी और डिजाइन संबंधी क्षमताओं की भी आवश्यकता होती है।

यही वजह है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत में केवल यूरेनियम की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी लोकेशन, निगरानी और IAEA निरीक्षकों की पहुंच भी बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

अमेरिकी हमलों के बाद कहां है ईरान का यूरेनियम?

यह सवाल अब भी पूरी तरह साफ नहीं है।

IAEA के मुताबिक 2025 के हमलों के बाद एजेंसी को ईरान के प्रभावित परमाणु ठिकानों तक पहले जैसी पहुंच नहीं मिली है। रॉयटर्स की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसी का अनुमान है कि 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का कुछ बड़ा हिस्सा भूमिगत सुरंगों में बचा हो सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक मात्रा और स्थिति को पूरी तरह सत्यापित नहीं किया जा सका है।

यही अनिश्चितता अमेरिका और इजराइल की चिंता बढ़ाती है।

अगर यूरेनियम का बड़ा हिस्सा सुरक्षित है, तो भविष्य में ईरान के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से आगे बढ़ाने की संभावना बनी रह सकती है। दूसरी तरफ ईरान का तर्क है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों से जुड़ा है और वह अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा।

रूस का परमाणु सहयोग क्यों चर्चा में है?

इसी बीच रूस और ईरान के बीच परमाणु ऊर्जा सहयोग का विस्तार हुआ है।

28 अक्टूबर 2026 को रूसी सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम के प्रमुख एलेक्सी लिखाचेव ने बताया कि रूस और ईरान के बीच आठ परमाणु पावर यूनिट्स के लिए समझौते हैं। इनमें छोटे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से जुड़ा एक समझौता भी शामिल है।

बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र में रूस पहले से ही ईरान का प्रमुख तकनीकी साझेदार है। वहां दूसरे और तीसरे रिएक्टर यूनिट पर काम जारी है।

रोसाटॉम ने यह भी बताया है कि बुशहर में रूसी विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाकर लगभग 700 करने की योजना है। फिलहाल साइट पर निर्माण और सेवा से जुड़े रूसी कर्मचारी काम कर रहे हैं।

इससे साफ है कि रूस और ईरान के बीच परमाणु ऊर्जा सहयोग युद्ध और तनाव के बावजूद खत्म नहीं हुआ है।

लेकिन क्या ये परमाणु बम की तैयारी है?

यहीं सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है।

परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाना और परमाणु हथियार बनाना दो अलग-अलग चीजें हैं। रूस द्वारा ईरान में पावर रिएक्टर बनाने की योजना को सीधे परमाणु बम बनाने की मदद के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

बुशहर जैसे पावर रिएक्टर मुख्य रूप से बिजली उत्पादन के लिए होते हैं और उनके लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा एवं निगरानी व्यवस्थाएं अलग होती हैं।

हालांकि, ईरान के संवर्धित यूरेनियम और निरीक्षण व्यवस्था को लेकर पहले से मौजूद विवाद के कारण रूस का बढ़ता परमाणु सहयोग पश्चिमी देशों की नजर में जरूर महत्वपूर्ण है।

यही वजह है कि मॉस्को-तेहरान परमाणु साझेदारी को अमेरिका और इजराइल बहुत करीब से देख रहे हैं।

क्या रूस ईरान को सैन्य मदद भी दे रहा है?

रूस और ईरान के सैन्य संबंध भी पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग बढ़ा है। ईरान ने रूस को शाहेद श्रेणी के ड्रोन उपलब्ध कराए जाने की बात को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई है।

दूसरी तरफ 2026 के युद्ध के दौरान ऐसी रिपोर्टें सामने आईं जिनमें दावा किया गया कि रूस ने ईरान को सैटेलाइट इमेजरी और अन्य खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई। हालांकि, इस तरह के दावों के हर विवरण की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल है। RFE/RL ने भी ऐसी रिपोर्टों का उल्लेख किया है।

इससे संकेत मिलता है कि रूस और ईरान के संबंध केवल व्यापार और ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं।

पुतिन के लिए ईरान इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

रूस के लिए ईरान कई कारणों से महत्वपूर्ण साझेदार है।

पहला कारण पश्चिमी प्रतिबंध हैं। रूस और ईरान दोनों लंबे समय से अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। इसलिए दोनों देश वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करने की कोशिश करते हैं।

दूसरा कारण ऊर्जा है। दोनों देश दुनिया के प्रमुख तेल और गैस उत्पादकों में शामिल हैं। GECF सम्मेलन के दौरान ऊर्जा सुरक्षा और गैस बाजार से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहे। पेजेश्कियान ने मॉस्को में ऊर्जा परिवहन मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया।

तीसरा कारण पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति है। ईरान इस क्षेत्र में रूस का महत्वपूर्ण साझेदार है और मॉस्को तेहरान के साथ संबंधों को कमजोर नहीं करना चाहता।

क्या युद्ध फिर भड़क सकता है?

युद्ध की स्थिति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में रुकावट और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अविश्वास किसी भी समय तनाव बढ़ा सकता है।

इजराइल भी ईरान की परमाणु क्षमता को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता रहा है। दूसरी ओर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पीछे हटने के बजाय अपने अधिकारों पर जोर देता रहा है।

ऐसे माहौल में किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर केवल ईरान और इजराइल तक सीमित नहीं रह सकता। इससे खाड़ी क्षेत्र, तेल बाजार, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

रूस के सामने भी बड़ी चुनौती

रूस ईरान का समर्थन करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मॉस्को हर स्थिति में तेहरान के लिए सीधे युद्ध में उतर जाएगा।

विश्लेषकों के अनुसार रूस को एक तरफ ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध बचाने हैं, वहीं दूसरी तरफ उसे अमेरिका के साथ संभावित कूटनीतिक चैनल भी खुले रखने हैं। इसके अलावा यूक्रेन युद्ध रूस की प्राथमिकताओं में पहले से ही शामिल है।

इसलिए पुतिन की नीति संभवतः समर्थन और कूटनीति के बीच संतुलन बनाने की होगी।

अब आगे क्या होगा?

पेजेश्कियान की मॉस्को यात्रा ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि ईरान रूस से दूरी बनाने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर रूस भी ईरान के साथ आर्थिक, ऊर्जा और परमाणु सहयोग को आगे बढ़ाने में रुचि रखता है।

लेकिन असली परीक्षा अब कूटनीति की होगी।

अगर रूस अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को दोबारा शुरू कराने में सफल होता है तो मॉस्को की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे युद्ध का खतरा कम करने और परमाणु विवाद के समाधान की दिशा में रास्ता खुल सकता है।

लेकिन अगर बातचीत विफल होती है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर संदेह बढ़ता है, तो अमेरिका और इजराइल की तरफ से दबाव फिर बढ़ सकता है।

फिलहाल पुतिन-पेजेश्कियान की मॉस्को मुलाकात को किसी अंतिम डील का संकेत नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि ईरान, रूस और अमेरिका के बीच आगे होने वाली कूटनीतिक चालें पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए बेहद अहम साबित हो सकती हैं।

और सबसे बड़ा सवाल अभी भी यही है—क्या मॉस्को तेहरान का सबसे बड़ा सहारा बनेगा, या पुतिन अमेरिका और ईरान के बीच शांति की वह राह खोल पाएंगे, जिसे महीनों की जंग और बातचीत भी नहीं खोल सकी?

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