DNA रिपोर्ट में बीमारी का खतरा देखकर मत डरिए! 10 लाख लोगों की स्टडी ने खोला ऐसा राज, जानकर बदल जाएगी आपकी सोच
नई दिल्ली: अगर किसी DNA या जेनेटिक टेस्ट की रिपोर्ट में यह लिखा हो कि आपको किसी बीमारी का जेनेटिक रिस्क ज्यादा है, तो जाहिर है कि चिंता बढ़ सकती है। लेकिन क्या ऐसी रिपोर्ट का मतलब यह है कि भविष्य में आपको वह बीमारी जरूर होगी? हाल ही में सामने आई करीब 10 लाख लोगों के जीनोम पर आधारित एक बड़ी स्टडी ने इस सवाल को लेकर बेहद महत्वपूर्ण जानकारी दी है।
यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किए गए इस अध्ययन में करीब 10 लाख लोगों के पूरे जीनोम सीक्वेंस का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि एक सामान्य मानव जीनोम में कितनी जेनेटिक विविधता होती है और बीमारी से जुड़े जेनेटिक संकेतों को किस तरह समझा जाना चाहिए। अध्ययन को Genome Medicine में प्रकाशित किया गया है।
स्टडी की सबसे अहम बात यह है कि किसी व्यक्ति के DNA में बीमारी से जुड़े जेनेटिक वेरिएंट मिलना अपने आप में बीमारी का प्रमाण नहीं है। यानी रिपोर्ट में 'हाई जेनेटिक रिस्क' लिखा होना यह नहीं बताता कि व्यक्ति निश्चित रूप से उस बीमारी से पीड़ित होगा।
करीब 10 लाख लोगों के DNA से क्या पता चला?
शोधकर्ताओं ने दो बड़े जनसंख्या-आधारित बायोबैंक से डेटा का इस्तेमाल किया। इनमें ब्रिटेन का UK Biobank और अमेरिका का All of Us रिसर्च प्रोग्राम शामिल था। दोनों डेटासेट को मिलाकर अध्ययन में लगभग 10 लाख लोगों के पूरे जीनोम की जानकारी का विश्लेषण किया गया।
रिसर्च में पाया गया कि एक व्यक्ति के जीनोम में औसतन लगभग 50 लाख जेनेटिक वेरिएंट हो सकते हैं। इनमें करीब 10 हजार ऐसे वेरिएंट पाए जाते हैं जो जीन के सीक्वेंस को बदल सकते हैं। हालांकि, इनमें से कई बदलाव शरीर पर कोई महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव नहीं डालते।
इसका मतलब है कि DNA में बदलाव होना अपने आप में असामान्य बात नहीं है। मानव शरीर में जेनेटिक विविधता सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
हर व्यक्ति में मिल सकते हैं बीमारी से जुड़े वेरिएंट
अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, औसतन हर व्यक्ति में एक से तीन दुर्लभ जेनेटिक वेरिएंट ऐसे मिल सकते हैं जिन्हें पहले गंभीर आनुवंशिक बीमारियों से जोड़ा गया है।
इसके अलावा लगभग 50 दुर्लभ वेरिएंट ऐसे भी पाए जा सकते हैं जिनका मेडिकल महत्व अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
यह आंकड़ा पहली नजर में डराने वाला लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसी बिंदु पर सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। किसी वेरिएंट का बीमारी से जुड़ा होना और उस वेरिएंट के कारण किसी व्यक्ति में बीमारी विकसित होना—दो अलग बातें हैं।
इसलिए केवल DNA रिपोर्ट देखकर किसी व्यक्ति को बीमार मान लेना सही नहीं होगा।
28 आम बीमारियों पर भी हुई रिसर्च
शोधकर्ताओं ने सिर्फ व्यक्तिगत जेनेटिक वेरिएंट ही नहीं देखे, बल्कि Polygenic Risk Scores यानी PRS का भी अध्ययन किया।
PRS एक ऐसा तरीका है जिसमें कई अलग-अलग जेनेटिक वेरिएंट की जानकारी को मिलाकर किसी बीमारी के प्रति व्यक्ति की जेनेटिक संवेदनशीलता का अनुमान लगाया जाता है।
शोधकर्ताओं ने 28 आम बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़े पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर का विश्लेषण किया। इनमें डायबिटीज, हृदय संबंधी बीमारियां और स्किजोफ्रेनिया जैसी स्थितियां शामिल थीं। अध्ययन में पाया गया कि औसत व्यक्ति को करीब तीन स्थितियों के लिए आबादी के ऊपरी 10 प्रतिशत जेनेटिक रिस्क समूह में रखा जा सकता है।
लेकिन यहां 'टॉप 10 प्रतिशत जेनेटिक रिस्क' का अर्थ 90 प्रतिशत बीमारी होने की संभावना नहीं है।
यह एक महत्वपूर्ण अंतर है, जिसे समझना जरूरी है।
हाई जेनेटिक रिस्क का मतलब बीमारी पक्की नहीं
मान लीजिए किसी व्यक्ति की रिपोर्ट में हृदय रोग का जेनेटिक रिस्क अपेक्षाकृत ज्यादा आया। इसका अर्थ यह हो सकता है कि कुछ दूसरे लोगों की तुलना में उस व्यक्ति में बीमारी की संवेदनशीलता ज्यादा है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति निश्चित रूप से हृदय रोग से पीड़ित होगा।
बीमारी का वास्तविक जोखिम कई चीजों से मिलकर बनता है। इसमें उम्र, परिवार का मेडिकल इतिहास, खान-पान, शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान, वजन, पर्यावरण और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियां भी भूमिका निभा सकती हैं।
यही वजह है कि विशेषज्ञ जेनेटिक रिपोर्ट को अकेले देखने के बजाय उसे व्यक्ति की पूरी मेडिकल स्थिति के साथ समझने की सलाह देते हैं।
स्टडी में एक बड़ी सीमा भी है
इस रिसर्च की एक महत्वपूर्ण सीमा यह है कि शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के जेनेटिक डेटा का विश्लेषण तो किया, लेकिन अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना नहीं था कि इनमें से कितने लोगों को वास्तव में संबंधित बीमारी हुई।
यानी अगर किसी व्यक्ति में किसी बीमारी का जेनेटिक रिस्क ज्यादा पाया गया, तो इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उस व्यक्ति को वह बीमारी बाद में जरूर हुई।
शोधकर्ताओं ने इसी कारण जेनेटिक निष्कर्षों को क्लिनिकल संदर्भ में समझने पर जोर दिया है।
DNA रिपोर्ट में 'Risk' देखकर घबराएं नहीं
आजकल जेनेटिक टेस्टिंग और हेल्थ स्क्रीनिंग का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में रिपोर्ट में 'Risk', 'Variant' या 'High Risk' जैसे शब्द देखकर लोग घबरा सकते हैं।
लेकिन हर जेनेटिक वेरिएंट समान नहीं होता।
कुछ वेरिएंट का प्रभाव वैज्ञानिक रूप से अच्छी तरह स्थापित हो सकता है, जबकि कुछ के बारे में अभी रिसर्च जारी होती है। कई वेरिएंट ऐसे भी होते हैं जिनका शरीर पर प्रभाव बहुत कम या नगण्य हो सकता है।
इसलिए किसी भी जेनेटिक रिपोर्ट की व्याख्या विशेषज्ञ की मदद से करना ज्यादा सुरक्षित है।
क्या लाइफस्टाइल से जेनेटिक रिस्क कम किया जा सकता है?
कई सामान्य बीमारियों में जेनेटिक और पर्यावरणीय दोनों कारकों की भूमिका होती है। इसलिए जेनेटिक संवेदनशीलता होने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को लेकर कुछ नहीं कर सकता।
स्वस्थ खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, धूम्रपान से दूरी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जांच जैसे कदम कई बीमारियों के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
एक अलग अध्ययन में भी पाया गया कि उच्च जेनेटिक जोखिम वाले लोगों में अनुकूल लाइफस्टाइल का संबंध कोरोनरी घटनाओं के कम जोखिम से था। हालांकि, ऐसे आंकड़ों को व्यक्तिगत भविष्यवाणी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
जेनेटिक टेस्ट का असली मतलब क्या है?
इस नई स्टडी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि DNA हमारे स्वास्थ्य की कहानी का एक हिस्सा है, पूरी कहानी नहीं।
किसी व्यक्ति के जीन में बीमारी से जुड़े संकेत हो सकते हैं, लेकिन उन संकेतों का वास्तविक प्रभाव अलग-अलग लोगों में अलग हो सकता है।
यही कारण है कि जेनेटिक टेस्ट की रिपोर्ट को लक्षणों, परिवार के स्वास्थ्य इतिहास, उम्र, जीवनशैली और अन्य मेडिकल जांच के साथ जोड़कर देखना जरूरी है।
करीब 10 लाख लोगों के जीनोम के विश्लेषण वाली इस स्टडी ने एक महत्वपूर्ण गलतफहमी दूर करने में मदद की है। जेनेटिक रिस्क और बीमारी एक ही चीज नहीं हैं।
DNA रिपोर्ट किसी बीमारी के प्रति संभावित संवेदनशीलता का संकेत दे सकती है, लेकिन केवल उस आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि भविष्य में व्यक्ति निश्चित रूप से बीमार होगा।
इसलिए अगर किसी जेनेटिक रिपोर्ट में बीमारी का जोखिम ज्यादा बताया गया है, तो घबराने के बजाय डॉक्टर या जेनेटिक काउंसलर से उसकी सही व्याख्या कराना ज्यादा जरूरी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जेनेटिक विविधता इंसानी शरीर का सामान्य हिस्सा है और बीमारी का वास्तविक जोखिम कई अलग-अलग कारकों के मेल से बनता है।

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