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बिहार के मखाने ने अचानक बदला बाजार का खेल! ₹2,400 किलो तक पहुंचा भाव, आखिर क्यों महंगा हो रहा ‘काला सोना’?



बिहार का मखाना इन दिनों एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में सीमांचल के मखाने की वैश्विक पहचान और 18 से अधिक देशों में इसके निर्यात का उल्लेख किए जाने के बाद घरेलू बाजार में भी मखाने की मांग और कीमतों को लेकर हलचल तेज हो गई है। कभी पारंपरिक जल कृषि से जुड़ा उत्पाद माना जाने वाला मखाना अब सुपरफूड के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है। यही वजह है कि बिहार की मंडियों से लेकर बड़े शहरों के ड्राई फ्रूट बाजार तक मखाने की मांग में तेजी देखी जा रही है।

मखाने को बिहार के कई इलाकों में ‘काला सोना’ भी कहा जाने लगा है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता का सीधा असर बाजार भाव पर दिखाई दे रहा है। खासकर बड़े और सफेद दाने वाले प्रीमियम मखाने की कीमत कई जिलों में 1,000 रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है। कुछ जगहों पर बेहतर ग्रेड और ब्रांडेड पैकिंग वाले मखाने 1,500 रुपये से लेकर 2,400 रुपये प्रति किलो तक बिक रहे हैं।

सीमांचल से देश-विदेश तक बढ़ी मखाने की पहचान

बिहार के सीमांचल क्षेत्र को मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में किसान तालाबों और जलाशयों में मखाने की खेती करते हैं। यहां तैयार होने वाला मखाना अब केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना चुका है।

मखाने की बढ़ती मांग के पीछे इसके पोषण संबंधी गुणों और बदलती खान-पान की आदतों को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। शहरी उपभोक्ता इसे स्नैक, व्रत के भोजन और ड्राई फ्रूट के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यही कारण है कि पैकेटबंद और भुने हुए मखाने की बिक्री भी लगातार बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री द्वारा सीमांचल के मखाने की चर्चा किए जाने के बाद इसके प्रति लोगों की दिलचस्पी और बढ़ने की बात कारोबारी भी बता रहे हैं। सोशल मीडिया और ऑनलाइन बाजारों में भी मखाने की मांग बढ़ने से इसके अलग-अलग ग्रेड को लेकर उपभोक्ताओं की जागरूकता बढ़ी है।

मखाना तैयार करना आसान नहीं, कई चरणों से गुजरता है उत्पाद

मखाने की कीमत को समझने के लिए इसकी उत्पादन प्रक्रिया को समझना भी जरूरी है। तालाब में मखाना उगाने से लेकर उसे बाजार में बेचने योग्य बनाने तक किसानों और मजदूरों को काफी मेहनत करनी पड़ती है।

तालाबों से मखाने के बीज निकालने, उन्हें सुखाने, साफ करने और फिर भूनकर लावा तैयार करने की प्रक्रिया काफी श्रमसाध्य होती है। इसके बाद मखाने के दानों की गुणवत्ता के अनुसार उनकी छंटाई और ग्रेडिंग की जाती है।

बाजार में सामान्य तौर पर मखाने की ग्रेडिंग 4 सूता, 5 सूता और 6 सूता के आधार पर की जाती है। 4 सूता अपेक्षाकृत छोटा दाना माना जाता है, जबकि 5 सूता मध्यम श्रेणी में आता है। 6 सूता का बड़ा, हल्का और दूधिया सफेद दाना प्रीमियम श्रेणी में रखा जाता है।

यही कारण है कि एक ही जिले में भी अलग-अलग गुणवत्ता के मखाने के दाम में काफी अंतर देखने को मिल सकता है।

उत्पादक जिलों में कीमत अपेक्षाकृत संतुलित

मखाना उत्पादन वाले जिलों में स्थानीय उपलब्धता अधिक होने के कारण कीमतें कई उपभोक्ता जिलों की तुलना में नियंत्रित दिखाई दे रही हैं। कटिहार और पूर्णिया इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

कटिहार में मखाने की कीमत लगभग 700 रुपये से 1,000 रुपये प्रति किलो के बीच बताई जा रही है। वहीं पूर्णिया में थोक बाजार में करीब 500 रुपये से 1,000 रुपये प्रति किलो और खुदरा बाजार में लगभग 600 रुपये से 1,200 रुपये प्रति किलो तक कीमत देखी जा रही है।

स्थानीय स्तर पर उत्पादन होने के कारण इन जिलों के किसानों और कारोबारियों को परिवहन लागत का अपेक्षाकृत कम बोझ उठाना पड़ता है। इसका असर स्थानीय बाजार की कीमतों पर भी दिखाई देता है।

इसी बीच कुछ प्रगतिशील किसान मखाना उत्पादन के साथ तालाब में मछली पालन का मॉडल भी अपना रहे हैं। इससे एक ही जल क्षेत्र से दो तरह की आय प्राप्त करने का अवसर मिल रहा है। मखाना और मछली का एकीकृत मॉडल किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का माध्यम बनता जा रहा है।

भागलपुर में उत्पादन नहीं, फिर भी मांग जबरदस्त

भागलपुर मखाना उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र नहीं है, लेकिन यहां इसकी खपत काफी अधिक बताई जा रही है। शहर के बड़े मॉल, ड्राई फ्रूट्स की दुकानों और अन्य खुदरा बाजारों में मखाने की मांग बनी हुई है।

भागलपुर में खुदरा बाजार में मखाने की कीमत लगभग 800 रुपये से 1,200 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। उत्पादक क्षेत्र से दूरी और स्थानीय मांग में अंतर के कारण यहां कीमतों में बढ़ोतरी दिखाई देती है।

इसके अलावा खगड़िया में मखाने का भाव लगभग 1,000 रुपये से 1,400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। जमुई में औसत कीमत करीब 1,000 रुपये, लखीसराय में 900 रुपये से 1,100 रुपये और बांका में करीब 1,000 रुपये से 1,200 रुपये प्रति किलो के बीच बताई जा रही है।

इससे साफ है कि उत्पादन क्षेत्र और उपभोक्ता बाजार के बीच मखाने की कीमतों में बड़ा अंतर बन रहा है।

मधेपुरा में ग्रेड के हिसाब से बदल रहा भाव

मधेपुरा मंडी में मखाने की कीमत उसकी गुणवत्ता और आकार के हिसाब से काफी बदल रही है। यहां 4 सूता मखाने का थोक भाव लगभग 600 से 650 रुपये प्रति किलो बताया जा रहा है, जबकि खुदरा बाजार में इसकी कीमत 750 से 800 रुपये तक पहुंच रही है।

दूसरी तरफ 6 सूता का बड़ा और प्रीमियम दाना खुदरा बाजार में 1,200 रुपये से 1,500 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। यानी छोटे और बड़े दाने के बीच कीमत का अंतर काफी बड़ा है।

ब्रांडेड पैकेट में कीमत और भी ज्यादा हो जाती है। मधेपुरा में कुछ ब्रांडेड मखाना पैकेट करीब 1,700 रुपये से 2,400 रुपये प्रति किलो तक बिकने की बात सामने आई है। पैकिंग, ब्रांड और गुणवत्ता के कारण खुले मखाने और पैकेटबंद मखाने की कीमत में बड़ा अंतर देखा जा सकता है।

किशनगंज और अररिया में भी प्रीमियम मखाने की मांग

किशनगंज में भी मखाने की अलग-अलग ग्रेड के अनुसार कीमत तय हो रही है। यहां 4 सूता मखाना लगभग 700 से 800 रुपये, 5 सूता करीब 1,000 से 1,200 रुपये और 6 सूता मखाना लगभग 1,400 से 1,600 रुपये प्रति किलो तक बताया जा रहा है।

वहीं भुना हुआ और पैक किया गया मखाना 1,800 से 2,200 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। अररिया में भी लगभग इसी तरह की कीमतें देखने को मिल रही हैं।

इससे पता चलता है कि मखाना अब केवल कच्चे कृषि उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड और ब्रांडेड खाद्य उत्पाद के रूप में भी बाजार में अपनी जगह बना रहा है।

मुंगेर में भी छोटे और प्रीमियम दाने के भाव में बड़ा अंतर

मुंगेर की गोला मंडी में भी मखाने की कीमत में काफी अंतर देखने को मिल रहा है। थोक कारोबारियों सनत कुमार और गोपाल साह के अनुसार, थोक बाजार में मखाने का भाव लगभग 600 रुपये से 1,400 रुपये प्रति किलो तक बताया जा रहा है।

खुदरा बाजार में छोटे दाने की कीमत करीब 250 रुपये से 700 रुपये प्रति किलो के बीच बताई गई है, जबकि उच्च गुणवत्ता वाले ब्रांडेड पैक की कीमत लगभग 1,100 रुपये से 1,500 रुपये प्रति किलो तक पहुंच रही है।

यह अंतर इस बात का संकेत है कि मखाने की कीमत केवल उत्पादन लागत पर निर्भर नहीं है। दाने का आकार, रंग, गुणवत्ता, प्रसंस्करण, पैकिंग, ब्रांड और बाजार की मांग जैसे कई कारक अंतिम कीमत तय करते हैं।

किसानों के लिए बढ़ती मांग बनी उम्मीद

मखाने की बढ़ती मांग बिहार के किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रही है। यदि घरेलू बाजार के साथ निर्यात मांग भी मजबूत बनी रहती है तो आने वाले समय में मखाना उत्पादक किसानों को बेहतर बाजार और मूल्य मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

विशेष रूप से सीमांचल के जिलों में मखाना उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उत्पादन, प्रसंस्करण, ग्रेडिंग, पैकिंग, परिवहन और बिक्री से जुड़े कई लोगों को इससे रोजगार मिलता है।

हालांकि कीमतों में तेजी का लाभ किसानों तक कितना पहुंचता है, यह स्थानीय मंडी व्यवस्था और बिचौलियों की भूमिका पर भी निर्भर करेगा। किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए संगठित विपणन, सीधे बाजार से जुड़ाव, आधुनिक प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर ध्यान देना महत्वपूर्ण हो सकता है।

आने वाले दिनों में क्या रहेगा मखाने का भाव?

मखाने की कीमत आगे किस दिशा में जाएगी, यह मुख्य रूप से मांग, उपलब्धता, उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा। यदि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार बढ़ती है तो प्रीमियम ग्रेड के मखाने के दाम मजबूत बने रह सकते हैं।

वहीं स्थानीय उत्पादन वाले क्षेत्रों में पर्याप्त आपूर्ति होने पर सामान्य ग्रेड के मखाने की कीमतों में बहुत ज्यादा तेजी पर नियंत्रण भी रह सकता है।

फिलहाल बिहार के अलग-अलग जिलों में मखाने के भाव में भारी अंतर साफ दिखाई दे रहा है। उत्पादन केंद्रों में जहां उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत कम कीमत पर मखाना मिल रहा है, वहीं गैर-उत्पादक शहरों में परिवहन, मांग और खुदरा मार्जिन के कारण इसकी कीमत काफी बढ़ जा रही है।

मखाना अब सिर्फ तालाबों की फसल नहीं

बिहार का मखाना अब पारंपरिक कृषि उत्पाद की सीमा से बाहर निकलकर एक बड़े खाद्य और निर्यात उत्पाद के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। सीमांचल के तालाबों से निकलने वाला यह उत्पाद देश के बड़े शहरों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच रहा है। प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में इसका उल्लेख होने के बाद इसकी चर्चा और तेज हुई है।

आने वाले समय में यदि किसानों को बेहतर तकनीक, प्रसंस्करण सुविधाएं, बाजार तक सीधी पहुंच और उचित मूल्य मिलता है, तो मखाना बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए और भी महत्वपूर्ण बन सकता है। फिलहाल बाजार में इसकी कीमतों का अंतर यही बता रहा है कि मखाने की मांग तेजी से बदल रही है और उपभोक्ता अब इसके आकार, गुणवत्ता और ब्रांड के हिसाब से कीमत चुकाने के लिए भी तैयार हैं।

 मखाने की कीमतें मंडी, गुणवत्ता, ग्रेड, पैकिंग, स्थान और समय के अनुसार बदल सकती हैं। ऊपर दिए गए भाव उपलब्ध कराए गए बाजार विवरण पर आधारित हैं।

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