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टीबी से पीड़ित 78 वर्षीय बुजुर्ग घर जाने के लिए गिड़गिड़ाता रहा, पत्नी-बेटा-बेटी ने मुंह मोड़ा, बोले- मर जाए तो बता देना



करनाल। बदलते समय के साथ रिश्तों और परिवार की तस्वीर भी बदलती जा रही है। कभी जिस परिवार को इंसान अपने जीवन का सबसे बड़ा सहारा मानता था, उसी परिवार से दूरी कई बुजुर्गों के जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा बनती जा रही है। करनाल में सामने आई एक घटना ने इसी कड़वे सच को उजागर कर दिया। यहां एक वृद्धाश्रम में रह रहे 78 वर्षीय बुजुर्ग से करीब 23 साल बाद उनका परिवार मिलने पहुंचा, लेकिन मुलाकात के बाद जो हुआ, उसने आश्रम में मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया।

बुजुर्ग को उम्मीद थी कि परिवार के लोग उन्हें देखने आए हैं तो शायद अब उन्हें अपने साथ घर ले जाएंगे। उम्र के इस पड़ाव पर वह अपने परिवार के बीच लौटना चाहते थे। उन्होंने परिजनों से घर चलने की गुहार भी लगाई। लेकिन कथित तौर पर परिवार ने उनकी बीमारी और अपनी आर्थिक परेशानियों का हवाला देते हुए उन्हें साथ ले जाने से इनकार कर दिया। परिवार की ओर से आश्रम संचालक को यह तक कहा गया कि अगर बुजुर्ग की तबीयत ज्यादा बिगड़ जाए या उनकी मृत्यु हो जाए तो उन्हें सूचना दे दी जाए, ताकि अंतिम संस्कार किया जा सके।

यह घटना करनाल स्थित सुभद्रा मानव कल्याण सेवा संस्थान में सामने आने की बात कही जा रही है। यहां पिछले करीब छह महीने से यह बुजुर्ग रह रहे हैं। संस्था की ओर से उनका इलाज और देखभाल की जा रही है।

23 साल से परिवार से अलग रह रहे थे बुजुर्ग

जानकारी के अनुसार 78 वर्षीय बुजुर्ग पिछले करीब 23 वर्षों से अपने परिवार से अलग जीवन बिता रहे थे। लंबे समय तक उन्होंने अपने दम पर जिंदगी चलाने की कोशिश की। बताया गया है कि उन्होंने करीब 15 साल तक रिक्शा चलाकर अपना पेट पाला। मेहनत-मजदूरी करके उन्होंने किसी तरह जीवन गुजारा, लेकिन बढ़ती उम्र ने धीरे-धीरे उनका शरीर कमजोर कर दिया।

उम्र बढ़ने के साथ बीमारी ने भी उन्हें घेर लिया। वह टीबी से पीड़ित बताए जा रहे हैं। बीमारी और कमजोरी के कारण उनके लिए खुद की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया था। जब परिस्थितियां ज्यादा खराब हुईं तो करीब छह महीने पहले उन्हें वृद्धाश्रम में शरण मिली।

आश्रम पहुंचने के बाद संस्था ने उनकी देखभाल शुरू की। इलाज और भोजन सहित जरूरत की दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया। हालांकि, बुजुर्ग के मन में अपने परिवार से मिलने की इच्छा लगातार बनी रही।

बीमारी बढ़ी तो परिवार को बुलाया गया

बताया जा रहा है कि हाल के दिनों में बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ने लगी। इसी दौरान उन्होंने अपनी इच्छा से परिवार को बुलाने की बात कही। आश्रम के माध्यम से उनके परिजनों को सूचना दी गई।

काफी समय बाद जब परिवार के लोग उनसे मिलने पहुंचे तो बुजुर्ग की आंखों में आंसू आ गए। करीब 23 साल बाद पत्नी, बेटे और बेटियों को अपने सामने देखकर उनके भीतर पुरानी यादें ताजा हो गईं। उन्हें उम्मीद जगी कि शायद अब परिवार उन्हें अपने साथ ले जाएगा।

बताया गया है कि बुजुर्ग ने परिजनों के सामने हाथ जोड़कर घर चलने की गुहार लगाई। उम्र के अंतिम पड़ाव में किसी बुजुर्ग की सबसे बड़ी इच्छा अक्सर यही होती है कि वह अपने परिवार के बीच रहे। इस बुजुर्ग की भी यही इच्छा थी।

लेकिन मुलाकात का यह भावुक क्षण उस समय दर्दनाक हो गया, जब परिजनों ने उन्हें घर ले जाने से इनकार कर दिया।

परिवार ने बीमारी का हवाला देकर किया इनकार

संस्थान के संचालक नीलू के अनुसार, उन्होंने परिवार को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने परिजनों से कहा कि बुजुर्ग की उम्र काफी अधिक है और वह जीवन के ऐसे दौर में हैं जब उन्हें परिवार के साथ और भावनात्मक सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है।

संस्था की ओर से यह भरोसा भी दिलाया गया कि बुजुर्ग की देखभाल में हर संभव सहयोग किया जाएगा। इसके बावजूद परिवार उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।

परिजनों की ओर से कथित तौर पर कहा गया कि बुजुर्ग बीमार हैं और परिवार उनकी जिम्मेदारी उठाने की स्थिति में नहीं है। परिवार के सदस्यों ने अपनी आर्थिक परेशानियों का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि घर के खर्च पहले से ही मुश्किल से चल रहे हैं और ऐसी स्थिति में लंबे समय से बीमार बुजुर्ग की देखभाल करना उनके लिए संभव नहीं है।

परिवार की ओर से आश्रम संचालक को अपना फोन नंबर भी दिया गया और कहा गया कि यदि बुजुर्ग के साथ कोई अनहोनी हो जाए तो उन्हें सूचना दे दी जाए।

पत्नी और बेटियों ने भी बताई अपनी मजबूरी

बताया जा रहा है कि बुजुर्ग से मिलने उनकी पत्नी, दो बेटियां और बेटा पहुंचे थे। बातचीत के दौरान परिवार की ओर से यह भी कहा गया कि घर के अन्य सदस्य पहले से ही उनका साथ नहीं दे रहे हैं।

परिवार के मुताबिक, छोटा बेटा और बेटी अपनी-अपनी परिस्थितियों के कारण जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं हैं। घर में आर्थिक दबाव होने की बात भी परिजनों ने कही। उनका कहना था कि जब रोजमर्रा का खर्च चलाना ही मुश्किल हो रहा है, तब गंभीर रूप से बीमार बुजुर्ग की जिम्मेदारी उठाना उनके लिए संभव नहीं है।

हालांकि, इस पूरी स्थिति का सबसे भावुक पहलू यह रहा कि जिस बुजुर्ग ने कभी अपने परिवार के लिए मेहनत की होगी, उम्र के अंतिम पड़ाव में उन्हें अपने ही परिवार से साथ रहने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

आश्रम में पसरा भावुक माहौल

जब परिवार के लोग बुजुर्ग को साथ लिए बिना वापस लौट गए तो आश्रम का माहौल बेहद भावुक हो गया। वहां मौजूद अन्य बुजुर्गों और कर्मचारियों ने भी इस घटना को बेहद पीड़ादायक बताया।

आश्रम संचालक के अनुसार, बुजुर्ग को परिवार से मिलने की काफी उम्मीद थी। परिवार के सामने आने के बाद उन्हें लगा था कि शायद अब उन्हें घर जाने का मौका मिलेगा। लेकिन जब परिवार ने उन्हें साथ ले जाने से इनकार कर दिया तो उनकी उम्मीदों को बड़ा झटका लगा।

इस घटना ने वृद्धाश्रम में रहने वाले दूसरे बुजुर्गों को भी अपने जीवन और परिवार की याद दिला दी। कई बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम केवल रहने की जगह नहीं बल्कि उनके जीवन का अंतिम सहारा बन चुका है।

15 साल तक रिक्शा चलाकर कमाया अपना जीवन

इस मामले में बुजुर्ग की जिंदगी की कहानी भी बेहद संघर्षपूर्ण बताई जा रही है। उम्र के एक बड़े हिस्से में उन्होंने रिक्शा चलाकर अपनी रोजी-रोटी कमाई। करीब 15 वर्षों तक वह रिक्शा चलाते रहे।

रिक्शा चलाना आसान काम नहीं है। गर्मी, सर्दी और बारिश में घंटों मेहनत करने के बाद जो आमदनी होती है, उसी से उन्होंने अपना जीवन चलाया। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया।

बीमारी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। टीबी से पीड़ित होने और शारीरिक कमजोरी के कारण वह पहले की तरह काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में उनके पास वृद्धाश्रम की मदद लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।

अब आश्रम में ही चल रहा इलाज

फिलहाल बुजुर्ग को उनके परिवार ने अपने साथ नहीं ले जाया है। वह अभी भी सुभद्रा मानव कल्याण सेवा संस्थान में रह रहे हैं। संस्था की ओर से उनकी देखभाल और इलाज जारी होने की बात कही गई है।

आश्रम की कोशिश है कि बुजुर्ग को इस उम्र में अकेलापन महसूस न हो और उन्हें भोजन, दवा तथा आवश्यक देखभाल मिलती रहे। बीमारी की स्थिति को देखते हुए उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जा रहा है।

हालांकि, आर्थिक और चिकित्सकीय सहायता के अलावा बुजुर्ग को जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत दिखाई देती है, वह है अपनों का साथ। परिवार से मिलने के बाद उन्हें घर लौटने की जो उम्मीद जगी थी, वह पूरी नहीं हो सकी।

रिश्तों के बदलते स्वरूप पर बड़ा सवाल

यह घटना केवल एक बुजुर्ग की कहानी नहीं है, बल्कि समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करती है। आखिर ऐसा क्या होता है कि जिंदगी भर परिवार के लिए मेहनत करने वाला व्यक्ति बुढ़ापे में परिवार के लिए बोझ बन जाता है? क्या आर्थिक परेशानी और बीमारी इतनी बड़ी वजह हो सकती है कि बुजुर्ग को अपने घर में जगह न मिले?

दूसरी ओर, परिवारों की अपनी आर्थिक और सामाजिक परेशानियों को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई परिवार वास्तव में आर्थिक संकट, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और सीमित संसाधनों के कारण बुजुर्गों की देखभाल करने में कठिनाई महसूस करते हैं। लेकिन ऐसे मामलों में परिवार, समाज, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं के बीच सहयोग की जरूरत और बढ़ जाती है।

बुजुर्गों के लिए केवल दवा और भोजन ही पर्याप्त नहीं होते। उन्हें सम्मान, अपनापन और भावनात्मक सुरक्षा की भी जरूरत होती है। जीवन के अंतिम वर्षों में परिवार का एक छोटा-सा सहारा भी उनके लिए बहुत बड़ी ताकत बन सकता है।

करनाल की यह घटना एक बार फिर यही सवाल सामने लाती है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में कहीं परिवार की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पीछे तो नहीं छूट रही है। जिस उम्र में बुजुर्गों को अपने बच्चों और परिवार के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उस उम्र में अगर उन्हें आश्रम का सहारा लेना पड़े, तो यह समाज के लिए निश्चित रूप से आत्ममंथन का विषय है।

फिलहाल 78 वर्षीय बुजुर्ग आश्रम में ही हैं। संस्था उनकी देखभाल कर रही है और इलाज जारी है। लेकिन उनके मन में परिवार के साथ घर लौटने की जो इच्छा थी, वह इस मुलाकात के बाद भी अधूरी रह गई है।

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