अस्पताल के गेट पर महिलाओं को रोककर कहा- ‘पहले ये उतारो’… फिर मचा सियासी घमासान
मुंबई के कूपर अस्पताल से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था और धार्मिक पहनावे को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आरोप है कि मेटरनिटी वार्ड में बुर्का पहनकर पहुंचीं दो महिलाओं को कथित तौर पर प्रवेश से रोक दिया गया और उनसे बुर्का हटाने के लिए कहा गया। महिलाओं का दावा है कि उन्होंने सुरक्षा कर्मियों को अपना परिचय भी दिया और अपना चेहरा दिखाया, इसके बावजूद उन्हें वार्ड में प्रवेश देने से पहले बुर्का उतारने के लिए कहा गया।
मामला सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। एनसीपी (शरद पवार), कांग्रेस और एआईएमआईएम से जुड़े नेताओं ने कथित घटना पर सवाल उठाते हुए अस्पताल प्रशासन से स्पष्टीकरण और जांच की मांग की है। वहीं, दूसरी ओर कुछ नेताओं ने यह भी कहा है कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर सुरक्षा व्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अस्पताल के मेटरनिटी वार्ड के बाहर ऐसा क्या हुआ, जिसके बाद धार्मिक पहनावे को लेकर मामला राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया?
वकील जहांआरा ने लगाया गंभीर आरोप
मामले की शुरुआत अधिवक्ता जहांआरा के आरोपों से हुई। उनके मुताबिक, वह कूपर अस्पताल के मेटरनिटी वार्ड में जाने के लिए पहुंची थीं। उन्होंने बुर्का पहन रखा था। आरोप है कि वार्ड के बाहर मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें रोक दिया।
जहांआरा के अनुसार, उन्होंने सुरक्षा कर्मियों से उन्हें रोकने की वजह पूछी और अपना परिचय भी दिया। उनका दावा है कि इसके बावजूद उन्हें बताया गया कि बुर्का पहनकर मेटरनिटी वार्ड में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
महिला के मुताबिक, सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए उनसे बुर्का हटाने के लिए कहा गया। कथित तौर पर यह भी कहा गया कि बुर्का पहनकर आने वाले लोगों से वार्ड में मौजूद बच्चों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
हालांकि, इस पूरे मामले में अस्पताल प्रशासन की ओर से क्या आधिकारिक नियम लागू थे और सुरक्षा कर्मियों को वास्तव में किस तरह के निर्देश दिए गए थे, यह जांच का विषय है।
दूसरी अधिवक्ता ने भी सुनाई अपनी कहानी
विवाद उस समय और बढ़ गया जब एक अन्य अधिवक्ता जहरा शेख ने भी दावा किया कि उनके साथ भी अस्पताल में कुछ ऐसा ही व्यवहार किया गया था।
जहरा के मुताबिक, वह अपने एक रिश्तेदार से मिलने अस्पताल पहुंची थीं। मेटरनिटी वार्ड के बाहर सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें रोककर बुर्का हटाने के लिए कहा। उनका दावा है कि उन्होंने अपना चेहरा भी दिखाया, लेकिन इसके बावजूद उनसे बुर्का उतारने को कहा गया।
जहरा के अनुसार, उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि जब चेहरा दिखा दिया गया है तो फिर बुर्का हटाने की आवश्यकता क्यों है। कथित तौर पर सुरक्षा का हवाला देते हुए उनसे बुर्का हटाने की मांग की गई।
इन दोनों महिलाओं के आरोप सामने आने के बाद मामले ने सोशल मीडिया पर भी तूल पकड़ लिया। घटना से संबंधित बताए जा रहे वीडियो और दावों की चर्चा होने लगी और देखते ही देखते यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया।
मामले पर राजनीतिक घमासान शुरू
घटना की जानकारी सामने आने के बाद कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने अस्पताल प्रशासन और संबंधित व्यवस्था पर सवाल उठाए।
एनसीपी (शरद पवार) की प्रवक्ता विद्या चव्हाण ने कथित घटना की आलोचना की। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि किसी महिला को उसके धार्मिक पहनावे की वजह से परेशान करना उचित है या नहीं।
उनका कहना है कि महिलाओं को अपनी धार्मिक पहचान और पहनावे के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार पाने का अधिकार है। यदि केवल बुर्का पहनने के कारण किसी महिला को अस्पताल में प्रवेश से रोका गया है, तो इस मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
कांग्रेस नेता चरण सिंह सप्रा ने भी मामले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए जांच की मांग की। उन्होंने अस्पताल प्रशासन से यह स्पष्ट करने को कहा कि मेटरनिटी वार्ड में प्रवेश को लेकर आखिर कौन से सुरक्षा नियम लागू हैं और क्या उन नियमों का पालन सभी लोगों के लिए समान रूप से किया जा रहा है।
AIMIM ने भी उठाए सवाल
एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने भी कथित घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि बुर्का और हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है।
पठान ने सवाल उठाया कि यदि अस्पताल में सुरक्षा जांच जरूरी है तो उसका कोई स्पष्ट और समान नियम होना चाहिए। उनका कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर किसी खास समुदाय के धार्मिक पहनावे को निशाना बनाया जाना उचित नहीं है।
उन्होंने यह मांग भी की कि अगर जांच में यह साबित होता है कि किसी महिला को केवल बुर्का पहनने के कारण अस्पताल में प्रवेश से रोका गया, तो जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही उन्होंने अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सीसीटीवी कैमरों और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने का सुझाव दिया।
मेयर ने मामले को बताया गंभीर
विवाद बढ़ने के बाद मुंबई की मेयर ऋतु तावड़े ने भी मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने कहा कि अस्पताल में आने वाले हर व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए।
मेयर के मुताबिक, बीएमसी द्वारा संचालित अस्पताल में किसी व्यक्ति के धर्म या धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच में किसी बीएमसी कर्मचारी की गलती सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
उनका रुख यह रहा कि अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी है और मरीजों तथा उनके परिजनों के अधिकारों और सम्मान का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
शिवसेना नेता ने रखा अलग पक्ष
वहीं, शिवसेना प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े ने मामले पर अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संभव है कि किसी कर्मचारी की मंशा किसी व्यक्ति को जानबूझकर परेशान करने की न रही हो।
उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है। लेकिन अस्पताल और नगर निगम की जिम्मेदारी है कि वहां सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावी बनी रहे।
यानी इस मामले में एक तरफ धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान का सवाल उठाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ मेटरनिटी वार्ड जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल मौजूद हैं।
आखिर अस्पतालों में सुरक्षा नियम क्या कहते हैं?
मेटरनिटी वार्ड सामान्य अस्पताल के अन्य हिस्सों से अधिक संवेदनशील माना जाता है। यहां नवजात बच्चे, गर्भवती महिलाएं और प्रसव के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रही महिलाएं मौजूद होती हैं। इसलिए अस्पताल प्रशासन आमतौर पर वार्ड में अनधिकृत लोगों के प्रवेश को लेकर विशेष सावधानी बरतता है।
लेकिन सुरक्षा नियमों को किस तरह लागू किया जाए, यही इस विवाद का मुख्य हिस्सा है। यदि किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करनी है तो क्या इसके लिए केवल चेहरा दिखाना पर्याप्त है? क्या किसी विशेष कपड़े को हटाना अस्पताल के लिखित नियमों का हिस्सा है? क्या ऐसा नियम सभी आगंतुकों पर समान रूप से लागू होता है?
इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी
फिलहाल इस मामले में महिलाओं की ओर से लगाए गए आरोप और राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि अस्पताल प्रशासन या सुरक्षा कर्मियों ने जानबूझकर धार्मिक भेदभाव किया।
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सुरक्षा कर्मियों ने किस नियम के आधार पर महिलाओं को रोका था और उनसे बुर्का हटाने के लिए क्यों कहा गया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अस्पताल जैसी जगह पर सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। सुरक्षा के नाम पर किसी व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं होना चाहिए, वहीं संवेदनशील वार्डों में सुरक्षा मानकों से समझौता भी नहीं किया जा सकता।
अब नजर इस बात पर है कि कूपर अस्पताल प्रशासन इस कथित घटना पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देता है और जांच में आखिर क्या सामने आता है। फिलहाल बुर्के को लेकर शुरू हुआ यह विवाद मुंबई में अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और समान व्यवहार—तीनों सवालों को एक साथ सामने ले आया है।

कोई टिप्पणी नहीं