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अचानक दुनिया के देश सोना क्यों बटोर रहे हैं? डॉलर के खिलाफ शुरू हुआ कोई बड़ा खेल तो नहीं!



नई दिल्ली। दुनिया के बाजार में सोने की चमक सिर्फ कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक ऐसा बदलाव चल रहा है, जिस पर दुनियाभर के आर्थिक विशेषज्ञों की नजर है। कई देशों के केंद्रीय बैंक लगातार अपने सोने के भंडार को बढ़ा रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह महज निवेश की रणनीति है या फिर दुनिया की रिजर्व करेंसी व्यवस्था में धीरे-धीरे कोई बड़ा बदलाव आकार ले रहा है?

ताजा आंकड़े बताते हैं कि केंद्रीय बैंकों की सोने में दिलचस्पी पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, पिछले चार वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने औसतन करीब 1,000 टन सोना सालाना जमा किया है, जबकि इससे पहले के दशक में यह औसत लगभग 500 टन था। यानी केंद्रीय बैंकों की सोना जमा करने की रफ्तार लगभग दोगुनी हुई है।

और सबसे बड़ा संकेत यह है कि यह खरीदारी अभी रुकती हुई नजर नहीं आ रही।

आखिर केंद्रीय बैंक सोना क्यों खरीद रहे हैं?

किसी आम निवेशक के लिए सोना महंगाई से बचाव या सुरक्षित निवेश हो सकता है, लेकिन किसी देश के केंद्रीय बैंक के लिए सोने की भूमिका इससे कहीं बड़ी होती है।

केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार को इस तरह रखना चाहते हैं कि आर्थिक संकट, युद्ध, प्रतिबंध, मुद्रा में भारी उतार-चढ़ाव या वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल की स्थिति में उनके पास ऐसा एसेट मौजूद रहे, जिस पर किसी दूसरे देश या संस्था का सीधा नियंत्रण न हो।

यहीं से सोना महत्वपूर्ण हो जाता है।

सोना किसी दूसरे देश की सरकार की देनदारी नहीं है। इसे किसी कंपनी या बैंक की तरह डिफॉल्ट करने का जोखिम नहीं होता। इसी वजह से संकट के समय इसे सुरक्षित परिसंपत्ति माना जाता है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के 2026 सर्वे में 89 प्रतिशत केंद्रीय बैंक रिजर्व मैनेजरों ने कहा कि अगले 12 महीनों में दुनिया के केंद्रीय बैंकों का कुल सोना भंडार बढ़ सकता है। वहीं रिकॉर्ड 45 प्रतिशत ने कहा कि वे खुद अपने संस्थान के सोने के भंडार को बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।

यानी कहानी सिर्फ आज की खरीदारी की नहीं है। कई केंद्रीय बैंक आने वाले समय के लिए भी सोने को अपनी रणनीति में जगह दे रहे हैं।

असली सस्पेंस डॉलर को लेकर है

अब इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सामने आता है—अमेरिकी डॉलर।

दशकों से डॉलर दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार की सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल कारोबार और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका बेहद मजबूत है।

लेकिन केंद्रीय बैंकों के व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई दे रहा है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के 2026 सर्वे में 74 प्रतिशत रिजर्व मैनेजरों ने अनुमान जताया कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी कम हो सकती है। इसके उलट 83 प्रतिशत ने कहा कि पांच साल बाद उनके कुल रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया डॉलर को अचानक छोड़ने जा रही है।

लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि कई देश अपने रिजर्व को एक ही प्रमुख मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय उसमें विविधता लाना चाहते हैं।

यही वजह है कि सोने को लेकर केंद्रीय बैंकों की रणनीति को केवल 'सोने की कीमत बढ़ने' के नजरिए से देखना अधूरा होगा।

चीन की खरीदारी ने भी बढ़ाया ध्यान

इस बदलाव में चीन का नाम खास तौर पर सामने आता है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, चीन ने जुलाई में भी करीब 20 टन सोना खरीदा और यह उसकी लगातार 21वीं महीने की खरीदारी थी। 2026 में जुलाई तक चीन ने करीब 60 टन सोना जोड़ा था और उसका आधिकारिक स्वर्ण भंडार लगभग 2,366 टन पहुंच गया था।

चीन अकेला देश नहीं है।

पोलैंड भी तेजी से अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ा रहा है। जुलाई में उसने करीब 8 टन सोना खरीदा और 2026 में जुलाई तक उसकी कुल खरीद लगभग 90 टन पहुंच गई थी। पोलैंड का कुल स्वर्ण भंडार करीब 640 टन बताया गया, जो उसके कुल रिजर्व का लगभग 28 प्रतिशत है।

कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और चेक गणराज्य जैसे देशों में भी सोने की खरीदारी देखने को मिली है।

इससे एक बात साफ होती है—यह किसी एक देश की रणनीति नहीं है।

संकट के समय सोना क्यों काम आता है?

केंद्रीय बैंकों के लिए सोने की सबसे बड़ी ताकत इसकी 'सुरक्षित संपत्ति' वाली छवि है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के 2026 सर्वे में 90 प्रतिशत केंद्रीय बैंक अधिकारियों ने संकट के समय सोने के प्रदर्शन को इसे रखने का प्रमुख कारण बताया। 84 प्रतिशत ने इसे लंबे समय के लिए मूल्य सुरक्षित रखने वाला एसेट माना और 82 प्रतिशत ने पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन को प्रमुख कारण बताया।

इसके अलावा भू-राजनीतिक जोखिम भी महत्वपूर्ण है।

युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध, व्यापार युद्ध या देशों के बीच तनाव बढ़ने पर किसी देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सोना एक ऐसा रिजर्व एसेट है, जिसका मूल्य किसी एक देश की मुद्रा से सीधे जुड़ा नहीं है।

इसी वजह से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों में सोने को भू-राजनीतिक जोखिम से बचाव के तौर पर देखने की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई है।

अब सिर्फ सोना खरीदना ही नहीं, उसे कहां रखना है यह भी अहम

इस पूरी कहानी का एक और कम चर्चित पहलू है—सोने की स्टोरेज लोकेशन।

केंद्रीय बैंक सिर्फ सोना खरीदने के बारे में नहीं सोच रहे, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि उनका सोना रखा कहां जाए।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के सर्वे के अनुसार, पिछले 12 महीनों में 9 प्रतिशत केंद्रीय बैंकों ने घरेलू स्तर पर सोना रखने की हिस्सेदारी बढ़ाई। वहीं 10 प्रतिशत ने विदेशों में रखे अपने सोने की स्टोरेज लोकेशन को डायवर्सिफाई किया।

सितंबर 2026 की रिपोर्ट में भी सोने की स्टोरेज व्यवस्था में बदलाव का संकेत मिलता है। वेनेजुएला ने करीब 4 अरब डॉलर मूल्य के सोने को वापस मंगाने का अनुरोध किया, जबकि यूरोप में भी कुछ केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार की लोकेशन और सुरक्षा व्यवस्था पर दोबारा विचार कर रहे हैं।

नीदरलैंड ने भी मार्च से अगस्त 2026 के बीच करीब 86 टन सोना यूरोप की ओर स्थानांतरित किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम और रिजर्व की तरलता को बेहतर करने की जरूरत जैसे कारण बताए गए हैं।

यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 'कितना सोना है?'

सवाल यह भी बन गया है कि 'सोना कहां रखा है और संकट की स्थिति में उस पर किसका नियंत्रण रहेगा?'

भारत भी इस बदलाव से अछूता नहीं

भारत में भी विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की भूमिका बढ़ी है।

रॉयटर्स की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 के अंत तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7 प्रतिशत हो गई थी, जबकि सितंबर 2025 के अंत में यह 13.92 प्रतिशत थी।

हालांकि इस बदलाव को केवल केंद्रीय बैंक की आक्रामक खरीदारी के रूप में देखना सही नहीं होगा, क्योंकि सोने की कीमत में बदलाव भी रिजर्व के मूल्य और हिस्सेदारी को प्रभावित करता है।

फिर भी यह बताता है कि भारत के रिजर्व मैनेजमेंट में भी सोने का महत्व लगातार बना हुआ है।

क्या दुनिया डॉलर छोड़ने वाली है?

यही वह सवाल है, जो इस पूरी कहानी को सबसे ज्यादा दिलचस्प बनाता है।

सीधा जवाब है—अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।

डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में से एक है। केंद्रीय बैंकों द्वारा सोना खरीदना यह साबित नहीं करता कि वे डॉलर को तुरंत छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

असल में कई देश अपनी रणनीति में विविधता ला रहे हैं।

यानी एक तरफ डॉलर, यूरो और दूसरी प्रमुख मुद्राएं हैं, तो दूसरी तरफ सोना एक ऐसा रिजर्व एसेट है जो किसी दूसरे देश की मुद्रा या सरकार पर सीधे निर्भर नहीं है।

इसीलिए इस पूरी प्रक्रिया को 'डॉलर खत्म होने' के बजाय रिजर्व डायवर्सिफिकेशन के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।

सोने की बढ़ती मांग का आम आदमी पर क्या असर?

केंद्रीय बैंकों की खरीदारी का असर आम निवेशक और उपभोक्ता पर भी पड़ सकता है।

अगर वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक लगातार बड़ी मात्रा में सोना खरीदते हैं और निवेशकों की मांग भी मजबूत रहती है, तो सोने की कीमतों को समर्थन मिल सकता है। हालांकि सोने की कीमतें ब्याज दरों, डॉलर की मजबूती, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव, निवेश मांग और आर्थिक परिस्थितियों सहित कई कारकों से प्रभावित होती हैं।

इसलिए केंद्रीय बैंकों की खरीदारी को देखकर यह मान लेना कि सोने की कीमत हमेशा बढ़ती ही रहेगी, सही नहीं होगा।

2026 में भी सोने में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। रॉयटर्स ने अगस्त में रिपोर्ट किया था कि केंद्रीय बैंकों की मांग और व्यापक आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच सोने की कीमत में फिर तेजी आई थी।

कहानी का असली राज क्या है?

दुनिया के केंद्रीय बैंक सोना इसलिए नहीं खरीद रहे कि उन्हें सिर्फ सोने की कीमत बढ़ने की उम्मीद है।

इसके पीछे एक बड़ा रणनीतिक बदलाव दिखाई देता है।

भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है। आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा विविध बनाना चाहते हैं। और ऐसे समय में सोना उन्हें एक ऐसा रिजर्व एसेट देता है, जो किसी एक देश की मुद्रा या सरकार पर सीधे निर्भर नहीं है।

यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी का औसत लगभग दोगुना हुआ है और 2026 में भी खरीदारी जारी है। जुलाई में केंद्रीय बैंकों ने कुल मिलाकर 23 टन सोना नेट खरीदा, जबकि जनवरी से जुलाई तक रिपोर्ट की गई नेट खरीद लगभग 130 टन रही।

इसलिए दुनिया में सोने की चमक को केवल बाजार की तेजी के तौर पर देखना शायद पूरी कहानी नहीं है।

असली कहानी रिजर्व की है। असली सवाल डॉलर की भूमिका का है। और सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि आने वाले वर्षों में दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने धन की सुरक्षा के लिए सोने को कितनी बड़ी भूमिका देते हैं।

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