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मौत से सिर्फ 2 मिनट दूर थे 8 लोग… तभी आया एक फोन, पहाड़ पर भागे और बच गईं सभी की जान!



हिसार/काठमांडू। नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ ने सिर्फ नदियों के किनारे बसे गांवों और शहरों को ही नहीं उजाड़ा, बल्कि दर्जनों जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचाया। बाढ़ का असर इतना भयावह था कि कई इलाकों में देखते ही देखते सड़कें, पुल, घर और हाइड्रोपावर परियोजनाएं पानी और मलबे में समा गईं। इस त्रासदी के बीच हजारों परिवार अपनों की तलाश में भटकते रहे। इसी भयावह आपदा के बीच हरियाणा के हिसार से जुड़ी एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसमें महज दो मिनट पहले आए एक फोन ने आठ लोगों की जिंदगी बचा दी।

हिसार की शांत विहार कॉलोनी में रहने वाले लीलापति शर्मा के बड़े साले विष्णु प्रसाद नेपाल के अरगा खांची क्षेत्र के रहने वाले हैं। वह त्रिशूली नदी क्षेत्र की हाइड्रोपावर परियोजना में हेड कुक के तौर पर काम करते थे। 26 अगस्त की सुबह जब अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हुआ, तब विष्णु को इसकी जानकारी मिली। परिवार के अनुसार, खतरे की सूचना मिलने के बाद उन्होंने समय गंवाए बिना अपने साथियों को इसकी जानकारी दी और सभी लोग परियोजना के पास मौजूद पहाड़ी की ऊंचाई की ओर भागे।

यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे अहम फैसला साबित हुआ।

बाढ़ के पानी का वेग इतना ज्यादा था कि परियोजना और उसके आसपास का इलाका देखते ही देखते तबाही के मंजर में बदल गया। नेपाल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ। नेपाल की प्रारंभिक रिपोर्टों के मुताबिक बाढ़ ने बोटेकोशी-त्रिशूली नदी गलियारे में कई बिजली परियोजनाओं, ट्रांसमिशन लाइनों और अन्य बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया।

फोन आया और बदल गई पूरी कहानी

विष्णु प्रसाद और उनके साथ मौजूद सात अन्य लोगों के लिए वह कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण थे। परिवार के अनुसार, बाढ़ आने से करीब दो मिनट पहले विष्णु के पास फोन आया था। उन्हें जैसे ही बाढ़ के पानी के आने की जानकारी मिली, उन्होंने अपने साथियों को सतर्क किया।

इसके बाद सभी लोग परियोजना के आसपास मौजूद पहाड़ी की ओर निकल गए।

पहाड़ी पर चढ़ने की वजह से वे अचानक बढ़े पानी की चपेट में आने से बच गए। नीचे जिस इलाके में कुछ देर पहले तक कामकाज चल रहा था, वहां बाढ़ का पानी और मलबा तेजी से फैल रहा था। विष्णु और उनके साथियों ने ऊंचाई पर पहुंचकर अपनी जान बचाई।

लेकिन जान बचाने के बाद भी उनकी मुश्किल खत्म नहीं हुई थी।

इलाका बाढ़ और मलबे से घिर चुका था। रास्ते टूट चुके थे और सामान्य संपर्क व्यवस्था प्रभावित हो गई थी। विष्णु को कुछ समय जंगल में भी रहना पड़ा। इस दौरान उनका परिवार उनसे संपर्क करने की कोशिश करता रहा, लेकिन फोन नहीं लग पा रहा था।

हिसार में बैठे लीलापति शर्मा और उनके परिवार के लिए ये घंटे बेहद बेचैनी भरे थे।

जब प्रोजेक्ट तबाह होने की खबर पहुंची तो बढ़ी चिंता

जैसे-जैसे नेपाल से बाढ़ की भयावह तस्वीरें और खबरें सामने आने लगीं, हिसार में रहने वाले परिवार की चिंता बढ़ती गई। जिस हाइड्रोपावर परियोजना में विष्णु काम करते थे, वहां भी बाढ़ से भारी नुकसान की जानकारी सामने आई।

नेपाल के बोटेकोशी-त्रिशूली क्षेत्र में बाढ़ के कारण कई जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा। कुछ परियोजनाओं में कर्मचारी और मजदूर लापता भी हुए। Upper Trishuli-3B परियोजना में तो बड़ी संख्या में कर्मचारियों और मजदूरों के संपर्क से बाहर होने की सूचना सामने आई थी।

ऐसे माहौल में लीलापति शर्मा का परिवार लगातार विष्णु के बारे में जानकारी जुटाने में लगा रहा।

लीलापति ने बताया कि करीब चार दिन तक परिवार को विष्णु की स्थिति को लेकर पूरी जानकारी नहीं मिल पा रही थी। बस इतनी उम्मीद थी कि वह सुरक्षित होंगे। बाढ़ में परियोजनाओं के तबाह होने और लोगों के लापता होने की खबरों के बीच परिवार के लिए हर गुजरता घंटा भारी पड़ रहा था।

फिर एक दिन शाम को अचानक विष्णु की आवाज सुनाई दी।

उन्होंने किसी परिचित को फोन करके बताया कि वह सुरक्षित हैं और जंगल में हैं।

यह खबर परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थी।

चार दिन तक अटकी रही सांस

परिवार के लिए सबसे बड़ी राहत यही थी कि विष्णु जिंदा और सुरक्षित थे। लेकिन वह अभी सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाए थे। बाढ़ ने आसपास के रास्तों और संपर्क व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था। इसलिए उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने और फिर काठमांडू लाने में भी समय लगा।

लीलापति के अनुसार, करीब तीन दिन बाद उनका संपर्क हुआ और बाद में रेस्क्यू टीम विष्णु को काठमांडू की ओर ले जा रही थी।

जिस समय परिवार को उनकी कोई खबर नहीं मिल रही थी, उसी समय नेपाल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बचाव अभियान चल रहा था। दुर्गम पहाड़ी इलाकों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचना राहत और बचाव टीमों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था।

26 अगस्त की आपदा के बाद भी कई दिनों तक सुरंगों और मलबे में फंसे लोगों को बचाने का अभियान जारी रहा। हाल के दिनों में त्रिशूली क्षेत्र की परियोजनाओं से कुछ लोगों को जिंदा बाहर निकाले जाने की घटनाओं ने उम्मीद भी जगाई है।

नेपाल में तबाही का मंजर

26 अगस्त को बोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई भयावह बाढ़ का असर आगे त्रिशूली और नारायणी नदी तंत्र तक पहुंचा। नेपाल की तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार, बाढ़ का एक बड़ा पानी का प्रवाह तिब्बत की ओर से बोटेकोशी में आया और फिर नीचे की ओर बढ़ता हुआ त्रिशूली तथा नारायणी नदी तक पहुंचा।

बाढ़ ने कई जगहों पर घर, सड़कें और पुल बहा दिए। हाइड्रोपावर परियोजनाओं के साथ-साथ बिजली ट्रांसमिशन का ढांचा भी प्रभावित हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित परियोजनाओं की सूची में Upper Trishuli-1, Rasuwagadhi, Chilime, Langtang Khola, Upper Trishuli-3A और अन्य परियोजनाएं शामिल थीं।

5 सितंबर तक नेपाल सरकार की ओर से राहत, खोज और बचाव अभियान जारी रहने की जानकारी दी गई थी। बाढ़ से रासुवा, नुवाकोट, धादिंग सहित कई इलाकों में भारी नुकसान हुआ है।

इस त्रासदी की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आपदा के कई दिन बाद भी बड़ी संख्या में लोग लापता या संपर्क से बाहर बताए जा रहे थे। राहत और बचाव एजेंसियां मलबे, सुरंगों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में लगातार तलाश कर रही थीं।

आज हिसार में दी जाएगी मृतकों को श्रद्धांजलि

नेपाल में आई इस भीषण प्राकृतिक आपदा में जान गंवाने वाले लोगों को हिसार में भी श्रद्धांजलि दी जाएगी। नेपाली समाज के दो संगठनों—प्रवासी नेपाली संघ भारत और मूल प्रवाह अखिल भारत नेपाली एकता समाज नगर समिति—की ओर से 6 सितंबर को शाम 6 बजे क्रांतिमान पार्क में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाएगी।

इस दौरान नेपाल की त्रासदी में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी जाएगी और उनके परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की जाएगी।

वहीं, विष्णु प्रसाद की कहानी इस भयावह आपदा के बीच उम्मीद की एक अलग तस्वीर पेश करती है। जिस समय बाढ़ ने अपने रास्ते में आने वाली चीजों को तबाह कर दिया, उसी समय एक फोन कॉल, कुछ मिनटों की सतर्कता और पहाड़ की ऊंचाई तक पहुंचने के फैसले ने आठ लोगों को मौत के मुंह से निकाल लिया।

हिसार में बैठा परिवार कई दिनों तक जिस खबर का इंतजार कर रहा था, आखिरकार वह राहत की खबर बनकर आई—विष्णु जिंदा थे।

एक फोन ने चेताया, कुछ मिनटों ने फैसला बदल दिया और एक पहाड़ी ने आठ जिंदगियों को अपने आंचल में बचा लिया।

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