पाकिस्तान में 100 साल पुराने हिंदू मंदिर के साथ क्या हुआ? भारत ने जताई चिंता, सामने आया चौंकाने वाला विवाद!
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 100 साल से अधिक पुराने हिंदू मंदिर को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित ऐतिहासिक हिंदू पूजा स्थल के ढांचे को 21 अगस्त 2026 को नुकसान पहुंचने के बाद पाकिस्तान के अल्पसंख्यक संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अब भारत सरकार ने भी इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और पाकिस्तान से घटना की तत्काल एवं पारदर्शी जांच कराने की मांग की है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने मंदिर की स्थिति को लेकर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि किसी ऐतिहासिक अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल की सुरक्षा में अधिकारियों की कथित विफलता गंभीर विषय है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत पाकिस्तान के नारोवाल के सिराज गांव में एक ऐतिहासिक हिंदू मंदिर के नष्ट होने की खबरों को लेकर चिंतित है और ऐसी घटना की स्पष्ट रूप से निंदा करता है।
भारत ने पाकिस्तान सरकार से मामले की शीघ्र और पारदर्शी जांच कराने, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने और मंदिर को दोबारा बहाल करने की दिशा में कदम उठाने की अपील की है। साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।
21 अगस्त को क्या हुआ था?
यह मंदिर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित था। यह इलाका लाहौर से करीब 130 किलोमीटर की दूरी पर है। स्थानीय रिपोर्टों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मंदिर की उम्र करीब 100 से 125 वर्ष बताई जा रही है।
21 अगस्त को मंदिर के ढांचे को नुकसान पहुंचने की खबर सामने आई। इसके बाद पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े संगठनों ने आरोप लगाया कि मंदिर को जानबूझकर गिराया गया, ताकि उसके आसपास की जमीन का इस्तेमाल नजदीकी मदरसे या धार्मिक शिक्षण संस्थान के विस्तार के लिए किया जा सके।
इस आरोप के बाद मामला केवल स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे।
मंदिर को लेकर दो अलग-अलग दावे
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर को लेकर पाकिस्तान में दो अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अधिकार संगठन पाकिस्तान मसीहा मिल्लत पार्टी ने आरोप लगाया है कि मंदिर को कुछ लोगों ने गिराया और बाद में वहां से ईंटें तथा मंदिर के ऊपरी हिस्से की धातु की सामग्री भी हटाई गई। संगठन ने अधिकारियों पर धार्मिक स्थल की सुरक्षा में विफल रहने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है।
वहीं पाकिस्तान के Evacuee Trust Property Board यानी ETPB ने मंदिर को जानबूझकर गिराए जाने के आरोप से इनकार किया है। बोर्ड के अधिकारी के मुताबिक, मंदिर काफी पुराना था और भारी बारिश के कारण उसका ढांचा गिर गया। ETPB ने यह भी कहा है कि मंदिर की अपनी जमीन किसी को लीज पर नहीं दी गई थी, हालांकि उसके आसपास की जमीन को लेकर अलग व्यवस्था रही है।
पंजाब सरकार ने भी बारिश के कारण मंदिर के एक हिस्से के गिरने की बात कही है और इसके पुनर्निर्माण/बहाली का आश्वासन दिया है।
यानी फिलहाल मंदिर के साथ वास्तव में क्या हुआ—इसे लेकर आरोप और सरकारी दावे अलग-अलग हैं। यही वजह है कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग लगातार तेज हो रही है।
मदरसे की जमीन से जुड़ा विवाद क्या है?
मंदिर को लेकर विवाद का एक बड़ा पहलू आसपास की जमीन से जुड़ा हुआ है। अल्पसंख्यक संगठन का कहना है कि मंदिर के बगल की जमीन पहले एक मदरसे के लिए लीज पर दी गई थी। संगठन के अनुसार, बाद में लीज रद्द किए जाने के बावजूद जमीन पर कब्जे को लेकर विवाद बना रहा।
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, ETPB अधिकारी ने माना कि मंदिर के आसपास की जमीन पहले एक सेमिनरी को लीज पर दी गई थी, लेकिन मंदिर की अपनी जमीन को किसी संस्था को लीज पर दिए जाने से इनकार किया। अधिकारी ने यह भी कहा कि मंदिर काफी पुराना था और बोर्ड आगे इसकी बहाली को लेकर फैसला करेगा।
यही जमीन से जुड़ा विवाद मंदिर के ढांचे को नुकसान पहुंचने के मामले को और संवेदनशील बना रहा है।
भारत ने क्यों जताई इतनी चिंता?
भारत सरकार का कहना है कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थल की सुरक्षा संबंधित सरकार की जिम्मेदारी होती है। विदेश मंत्रालय ने इस घटना को लेकर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवाल भी उठाए हैं।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान से घटना की जांच करने के साथ-साथ जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाने और मंदिर को बहाल करने की मांग की है। भारत ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान को अपने अल्पसंख्यक नागरिकों और उनकी सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
भारत की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब मंदिर की स्थिति को लेकर पाकिस्तान में ही अल्पसंख्यक संगठन जांच और पुनर्निर्माण की मांग कर रहे हैं।
पाकिस्तान में भी उठी मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग
मंदिर को लेकर विवाद सामने आने के बाद पाकिस्तान के अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। पाकिस्तान मसीहा मिल्लत पार्टी के अध्यक्ष असलम परवेज सहोत्रा ने पंजाब के अतिरिक्त गृह सचिव से मुलाकात कर मामले में कार्रवाई की मांग की थी।
संगठन ने आरोप लगाया कि मंदिर की सुरक्षा में स्थानीय प्रशासन नाकाम रहा। साथ ही मंदिर को उसके मूल स्वरूप में दोबारा बनाने और हिंदू मंदिरों, सिख गुरुद्वारों तथा ईसाई धार्मिक स्थलों की सुरक्षा मजबूत करने की मांग भी की गई है।
जांच से साफ होगा असली मामला
फिलहाल इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंदिर का ढांचा आखिर किन परिस्थितियों में गिरा या गिराया गया।
अगर अल्पसंख्यक संगठनों के आरोप सही हैं और मंदिर को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया, तो यह ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की सुरक्षा को लेकर गंभीर मामला होगा। दूसरी ओर, यदि सरकारी अधिकारियों का दावा सही है कि भारी बारिश के कारण ढांचा गिरा, तो भी यह सवाल बना रहेगा कि इतने पुराने और ऐतिहासिक मंदिर की स्थिति पहले से कितनी कमजोर थी और उसकी सुरक्षा व संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए थे।
मंदिर की जमीन और आसपास की संपत्ति को लेकर पुराने विवाद की भी जांच जरूरी हो सकती है। इसके अलावा घटनास्थल की स्थिति, उपलब्ध रिकॉर्ड, स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
100 से 125 साल पुराना यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पाकिस्तान के क्षेत्र में मौजूद हिंदू समुदाय की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा स्थल भी माना जा रहा है। ऐसे में इसके ढांचे को नुकसान पहुंचने से धार्मिक स्थल के संरक्षण को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत ने भी इसी पहलू पर जोर देते हुए पाकिस्तान से मंदिर को बहाल करने और अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
अब निगाहें पाकिस्तान सरकार और स्थानीय प्रशासन की जांच पर हैं। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि सिराज गांव का सदियों पुराना धार्मिक स्थल प्राकृतिक कारणों से क्षतिग्रस्त हुआ या उसके पीछे किसी तरह की मानवीय कार्रवाई थी। जब तक जांच पूरी नहीं होती, दोनों पक्षों के दावों में से किसी एक को अंतिम सत्य मानना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल इतना जरूर है कि एक ऐतिहासिक हिंदू मंदिर को लेकर उठे विवाद ने भारत-पाकिस्तान के बीच अल्पसंख्यकों और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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