पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान से बवाल, चीफ इमाम इलियासी बोले- 'मुसलमानों को...'
नई दिल्ली। पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी के एक हालिया बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। अंसारी ने एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर के दौरान जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी एक पुरानी टिप्पणी का हवाला देते हुए भारत के सामने हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को एक गंभीर चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया। उनके इस बयान के बाद ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी ने इसकी कड़ी आलोचना की और कहा कि किसी भी समुदाय को लेकर ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए, जिनसे लोगों में उकसावे या तनाव की भावना पैदा हो।
अंसारी की टिप्पणी और उसके बाद आई प्रतिक्रियाओं ने एक बार फिर भारत में धर्म, नागरिक राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और राजनीतिक पहचान से जुड़े सवालों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इस पूरे मामले में अलग-अलग पक्षों ने अलग-अलग दृष्टिकोण सामने रखे हैं।
एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में क्या बोले हामिद अंसारी?
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने नई दिल्ली में आयोजित एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में हिस्सा लिया था। कार्यक्रम का आयोजन दिवंगत संविधान विशेषज्ञ और लेखक एजी नूरानी के जीवन और कार्यों को याद करने के लिए किया गया था। इसी दौरान अंसारी ने नूरानी की पुस्तक The RSS: A Menace to India का संदर्भ दिया।
अंसारी ने पुस्तक के संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी एक पुरानी टिप्पणी का उल्लेख किया। उनके अनुसार, नेहरू ने एक बैठक के दौरान भारत के लिए साम्यवाद की तुलना में हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को अधिक गंभीर खतरे के रूप में देखा था।
यह टिप्पणी अंसारी की ओर से सीधे उनके अपने निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि नेहरू से जुड़ी ऐतिहासिक टिप्पणी के संदर्भ में प्रस्तुत की गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, इसका रिकॉर्ड पूर्व विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया द्वारा दर्ज की गई एक बैठक से संबंधित बताया गया है, जिसका उल्लेख नूरानी की पुस्तक में किया गया था।
नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर भी उठाया सवाल
अपने भाषण में हामिद अंसारी ने केवल पुराने राजनीतिक संदर्भ का उल्लेख नहीं किया, बल्कि मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर भी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव के बीच अंतर की बात कही। अंसारी के अनुसार, हाल के वर्षों में ऐसी प्रवृत्तियां दिखाई दी हैं, जिनमें नागरिकों की पहचान को धार्मिक आधार पर अलग-अलग देखने की कोशिश की जाती है। उन्होंने इसे नागरिक समानता और सामाजिक समरसता के संदर्भ में चिंता का विषय बताया।
अंसारी ने यह भी कहा कि धार्मिक पहचान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने की प्रवृत्ति समाज में असहिष्णुता, अलगाव और असुरक्षा की भावना को बढ़ा सकती है। उनका भाषण मुख्य रूप से राष्ट्रवाद, नागरिक अधिकारों और धार्मिक पहचान से जुड़े प्रश्नों पर केंद्रित था।
इमाम उमर अहमद इलियासी ने क्यों जताई आपत्ति?
अंसारी के बयान के बाद ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय को लेकर ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए, जिनसे लोगों को भड़काने या उकसाने का रास्ता खुले।
इलियासी ने अंसारी के बयान को निंदनीय बताते हुए आरोप लगाया कि इस तरह की टिप्पणियों से देश का माहौल प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें आशंका है कि इस प्रकार की बयानबाजी के पीछे माहौल खराब करने की कोई बड़ी साजिश हो सकती है। यह साजिश वाला दावा इलियासी का आरोप है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
इलियासी ने यह भी आरोप लगाया कि अंसारी सत्ता और महत्वपूर्ण पदों पर रहते समय अलग तरीके से सार्वजनिक भूमिका निभाते थे, जबकि अब उनके बयानों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों का उल्लेख अधिक दिखाई दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि अंसारी मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी छवि सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी इलियासी की राजनीतिक व्याख्या है, जिसे तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।
मोहन भागवत के बयानों का भी किया जिक्र
इमाम इलियासी ने अपनी प्रतिक्रिया में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के कुछ बयानों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अंसारी को उन बयानों पर भी ध्यान देना चाहिए, जिनमें भागवत ने भारतीयों के डीएनए को एक बताया था।
इलियासी ने मस्जिदों के नीचे शिवलिंग तलाशने से बचने से जुड़े भागवत के बयान का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, यदि धार्मिक सद्भाव और सामाजिक शांति की बात की जाती है तो ऐसे बयानों को भी चर्चा में शामिल किया जाना चाहिए।
इस तरह इलियासी ने अंसारी की टिप्पणी का जवाब देते हुए यह तर्क रखा कि सार्वजनिक बहस में केवल एक पक्ष की टिप्पणियों को सामने रखने के बजाय अलग-अलग नेताओं के उन बयानों पर भी चर्चा होनी चाहिए, जिनमें धार्मिक सद्भाव और साझा नागरिक पहचान की बात कही गई है।
बीजेपी और वीएचपी की ओर से भी प्रतिक्रिया
हामिद अंसारी की टिप्पणी पर केवल इमाम इलियासी ने ही प्रतिक्रिया नहीं दी। भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े नेताओं ने भी उनके बयान की आलोचना की।
रिपोर्टों के मुताबिक, बीजेपी ने अंसारी की टिप्पणी को लेकर कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा पर सवाल उठाए और इसे हिंदू समुदाय से संबंधित राजनीति के संदर्भ में देखा। वहीं वीएचपी नेता विनोद बंसल ने भी अंसारी के बयान की आलोचना की।
इस प्रतिक्रिया के बाद विवाद का दायरा और बढ़ गया है। हालांकि, अंसारी के भाषण का मूल संदर्भ एजी नूरानी की पुस्तक, नेहरू से जुड़ी ऐतिहासिक टिप्पणी और नागरिक राष्ट्रवाद से संबंधित उनके विचार थे।
बयान के बाद फिर तेज हुई राजनीतिक बहस
हामिद अंसारी के बयान ने भारत में धर्म और राजनीति के संबंध को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है। एक तरफ अंसारी ने सांप्रदायिकता और धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकों के बीच अंतर किए जाने को लेकर चिंता जताई है। दूसरी तरफ उनके आलोचक इसे समाज में विभाजन बढ़ाने वाला बयान मान रहे हैं।
इमाम इलियासी ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि मुस्लिम समुदाय को किसी भी राजनीतिक बयान के माध्यम से भड़काने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। वहीं अंसारी के भाषण में नागरिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक मूल्यों से संबंधित चिंताओं को सामने रखा गया था।
फिलहाल यह विवाद राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम में अलग-अलग पक्षों के बयान सामने आ चुके हैं, लेकिन अंसारी की टिप्पणी के राजनीतिक अर्थ और उसके प्रभाव को लेकर अलग-अलग दलों और संगठनों की व्याख्या एक-दूसरे से अलग है।
विवाद का केंद्र क्या है?
पूरे मामले का केंद्र मूल रूप से तीन मुद्दे हैं—हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को लेकर अंसारी द्वारा नेहरू की ऐतिहासिक टिप्पणी का हवाला, नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच अंतर को लेकर उनकी चिंता, तथा इस बयान पर इमाम इलियासी सहित अन्य संगठनों की प्रतिक्रिया।
अंसारी ने जिस ऐतिहासिक टिप्पणी का उल्लेख किया, वह उनके भाषण का एक संदर्भ था। वहीं इलियासी ने इसे वर्तमान सामाजिक माहौल के संदर्भ में देखा और इसकी आलोचना की।
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की ओर से और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि एक ऐतिहासिक टिप्पणी के संदर्भ से शुरू हुआ यह विवाद अब भारत में राष्ट्रवाद, धर्म और राजनीति को लेकर व्यापक सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है।

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