डायबिटीज की दवा खाते-खाते थक गए? रिपोर्ट में शुगर नॉर्मल आते ही क्या बंद कर सकते हैं दवा, जानिए वो सच जो हर मरीज को पता होना चाहिए!
नई दिल्ली। डायबिटीज की रिपोर्ट हाथ में आते ही मरीज के मन में सबसे पहला सवाल अक्सर यही होता है—अब दवा कितने दिन खानी पड़ेगी? क्या जिंदगीभर दवा चलती रहेगी? अगर शुगर सामान्य हो जाए तो क्या दवा बंद की जा सकती है?
ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि डायबिटीज ऐसी बीमारी है जिसका इलाज केवल कुछ दिनों की दवा से पूरा नहीं होता। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर डायबिटीज मरीज को एक जैसी दवा और एक जैसी अवधि तक दवा लेनी ही पड़ेगी। इलाज की जरूरत व्यक्ति की डायबिटीज के प्रकार, ब्लड शुगर, HbA1c, उम्र, वजन, दूसरी बीमारियों और शरीर की दवा के प्रति प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।
खासकर टाइप-2 डायबिटीज में कुछ लोगों की शुगर वजन कम करने, खान-पान में बदलाव और नियमित शारीरिक गतिविधि से इतनी बेहतर हो सकती है कि डॉक्टर दवाओं की मात्रा कम कर दें या कुछ परिस्थितियों में दवा बंद करने पर भी विचार कर सकते हैं। इसे डायबिटीज रिमिशन कहा जा सकता है। लेकिन यह फैसला केवल डॉक्टर की निगरानी में ही होना चाहिए।
सबसे पहले समझिए—डायबिटीज एक जैसी नहीं होती
डायबिटीज को आम तौर पर एक ही बीमारी समझ लिया जाता है, लेकिन इसके अलग-अलग प्रकार हैं। सबसे प्रमुख हैं टाइप-1 डायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज।
टाइप-1 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन बहुत कम बनाता है या लगभग नहीं बनाता। ऐसे मरीजों के लिए इंसुलिन जीवनरक्षक उपचार है और इसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित रूप से लेना पड़ता है।
दूसरी तरफ टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का प्रभाव ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता और समय के साथ इंसुलिन बनाने की क्षमता भी कम हो सकती है। इसमें शुरुआत से ही हर व्यक्ति का इलाज एक जैसा नहीं होता।
किसी मरीज को केवल जीवनशैली में बदलाव की सलाह दी जा सकती है, जबकि किसी को दवा की जरूरत होती है। कुछ मरीजों में एक दवा पर्याप्त होती है और कुछ को एक से अधिक दवाओं की आवश्यकता पड़ सकती है।
शुगर सामान्य आते ही दवा बंद करना सबसे बड़ी गलती
कई मरीजों के साथ ऐसा होता है कि कुछ महीनों तक दवा लेने के बाद उनकी ब्लड शुगर सामान्य आने लगती है। इसके बाद वे सोचते हैं कि अब बीमारी ठीक हो गई और खुद से दवा बंद कर देते हैं।
यही सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
दवा के कारण शुगर नियंत्रित हो रही हो तो दवा बंद करने के बाद ब्लड शुगर दोबारा बढ़ सकती है। कई बार मरीज को तुरंत कोई लक्षण भी महसूस नहीं होते, लेकिन लंबे समय तक बढ़ी हुई शुगर शरीर के अलग-अलग अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है।
इसलिए अगर रिपोर्ट बेहतर आई है तो इसका मतलब यह नहीं कि मरीज अपने आप दवा छोड़ दे। डॉक्टर यह तय करते हैं कि दवा की मात्रा कम करनी है, दवा बदलनी है या कुछ समय तक बिना दवा के निगरानी की जा सकती है।
क्या टाइप-2 डायबिटीज में दवा कभी बंद हो सकती है?
हां, कुछ लोगों में ऐसा संभव है, लेकिन इसे हर मरीज पर लागू नहीं किया जा सकता।
टाइप-2 डायबिटीज के कुछ मरीजों में वजन कम होने और लंबे समय तक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से ब्लड शुगर काफी बेहतर हो सकती है। कुछ लोगों में ऐसी स्थिति भी आ सकती है जहां बिना ग्लूकोज कम करने वाली दवा के ब्लड शुगर और HbA1c डायबिटीज की सीमा से नीचे बना रहे।
इसे आम तौर पर रिमिशन कहा जाता है।
लेकिन रिमिशन को डायबिटीज का स्थायी इलाज समझना सही नहीं है। वजन दोबारा बढ़ने, जीवनशैली बिगड़ने या समय के साथ बीमारी के बढ़ने पर शुगर फिर बढ़ सकती है।
इसलिए दवा बंद होने के बाद भी नियमित जांच और डॉक्टर की निगरानी जरूरी रहती है।
वजन कम करने से क्यों बदल सकता है डायबिटीज का नियंत्रण?
टाइप-2 डायबिटीज और शरीर में अतिरिक्त वजन के बीच गहरा संबंध हो सकता है। खासकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकती है।
जब किसी व्यक्ति का वजन चिकित्सकीय रूप से उचित तरीके से कम होता है तो कुछ लोगों में इंसुलिन संवेदनशीलता बेहतर हो सकती है और ब्लड शुगर पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर डायबिटीज मरीज को केवल वजन कम करने से दवा की जरूरत खत्म हो जाएगी। डायबिटीज कितने समय से है, अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने की क्षमता कितनी बची है और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियां क्या हैं—इन सभी बातों का महत्व होता है।
किसे लंबे समय तक दवा की जरूरत पड़ सकती है?
जिन लोगों की ब्लड शुगर जीवनशैली में बदलाव के बावजूद लक्ष्य से ऊपर रहती है, उन्हें लंबे समय तक दवा की जरूरत पड़ सकती है।
अगर किसी मरीज को डायबिटीज कई वर्षों से है और शरीर की इंसुलिन बनाने की क्षमता काफी कम हो चुकी है तो दवा की जरूरत बनी रह सकती है।
इसी तरह जिन लोगों को डायबिटीज के साथ हृदय रोग, किडनी की बीमारी या अन्य जटिलताएं हैं, उनके लिए दवा का चयन केवल शुगर कम करने के आधार पर नहीं किया जाता। कुछ दवाएं ऐसे मरीजों में हृदय या किडनी से जुड़े लाभ भी दे सकती हैं। इसलिए केवल शुगर सामान्य आने के आधार पर दवा बंद करना उचित नहीं है।
हर दवा का काम सिर्फ शुगर कम करना नहीं
डायबिटीज की दवाओं को लेकर एक आम धारणा है कि उनका एकमात्र उद्देश्य ब्लड शुगर कम करना है। लेकिन आधुनिक डायबिटीज उपचार में कुछ दवाओं के दूसरे संभावित फायदे भी देखे जाते हैं।
मरीज की स्थिति के अनुसार डॉक्टर ऐसी दवा चुन सकते हैं जो ब्लड शुगर नियंत्रण के साथ वजन, हृदय या किडनी से जुड़े जोखिम को ध्यान में रखे।
इसलिए किसी दूसरे मरीज को देखकर अपनी दवा बदलना या बंद करना बिल्कुल सही तरीका नहीं है।
इंसुलिन लेने वाले मरीज क्या कभी इंसुलिन बंद कर सकते हैं?
यह सवाल खास तौर पर टाइप-2 डायबिटीज वाले मरीज पूछते हैं।
कुछ टाइप-2 मरीजों को बीमारी के किसी चरण में इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है। बाद में डॉक्टर की निगरानी में स्थिति बदलने पर इंसुलिन की जरूरत कम हो सकती है या उपचार का तरीका बदला जा सकता है।
लेकिन टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन जरूरी होता है, क्योंकि शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता।
इसलिए किसी परिचित को देखकर यह तय करना कि इंसुलिन हमेशा लेना पड़ता है या नहीं, सही नहीं है। डायबिटीज का प्रकार और व्यक्ति की मेडिकल स्थिति सबसे महत्वपूर्ण है।
दवा के साथ खान-पान और व्यायाम भी जरूरी
डायबिटीज की दवा लेने का मतलब यह नहीं कि खान-पान और शारीरिक गतिविधि की जरूरत खत्म हो गई।
टाइप-2 डायबिटीज के प्रबंधन में संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, वजन का प्रबंधन और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का सही तरीके से इस्तेमाल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कई लोगों में जीवनशैली में सुधार के बाद दवाओं की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन इसका फैसला रक्त जांच और चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर होना चाहिए।
कब डॉक्टर से दवा की समीक्षा करानी चाहिए?
अगर आपकी HbA1c लगातार लक्ष्य से कम है, बार-बार लो ब्लड शुगर की समस्या हो रही है, वजन में बड़ा बदलाव आया है या आपकी जीवनशैली में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है, तो डॉक्टर से दवा की समीक्षा के बारे में बात की जा सकती है।
इसी तरह यदि शुगर लगातार ज्यादा आ रही है तो यह संकेत हो सकता है कि वर्तमान उपचार में बदलाव की जरूरत है।
दवा की मात्रा खुद से कम या ज्यादा करना उचित नहीं है।
खासकर इंसुलिन या ऐसी दवाओं के मामले में जिनसे लो ब्लड शुगर का जोखिम हो सकता है, बिना चिकित्सकीय सलाह बदलाव नुकसानदायक हो सकता है।
तो आखिर कितने साल तक चलती है डायबिटीज की दवा?
इसका कोई एक तय जवाब नहीं है।
किसी मरीज को कुछ समय के लिए दवा की जरूरत हो सकती है, जबकि किसी दूसरे को लंबे समय तक। कुछ टाइप-2 मरीजों में पर्याप्त वजन घटने और अन्य बदलावों के बाद डॉक्टर की निगरानी में दवा बंद करने की स्थिति आ सकती है। वहीं कुछ मरीजों में बीमारी की प्रकृति ऐसी होती है कि उपचार लंबे समय तक जारी रखना पड़ता है।
इसलिए “डायबिटीज की दवा जिंदगीभर चलती है” और “शुगर ठीक होते ही दवा बंद कर देनी चाहिए”—दोनों बातें हर मरीज के लिए सही नहीं हैं।
सबसे महत्वपूर्ण है कि उपचार का फैसला आपकी रिपोर्ट और आपकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति देखकर किया जाए।
याद रखें ये 5 बातें
पहली: शुगर सामान्य आने का मतलब हमेशा डायबिटीज खत्म होना नहीं है।
दूसरी: डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद नहीं करनी चाहिए।
तीसरी: टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन बेहद जरूरी उपचार है।
चौथी: कुछ टाइप-2 मरीजों में वजन और जीवनशैली में बड़े सुधार के बाद रिमिशन संभव हो सकता है।
पांचवीं: दवा कम या बंद होने के बाद भी नियमित ब्लड शुगर और HbA1c की निगरानी जरूरी है।
आखिर में सबसे अहम बात यह है कि डायबिटीज का इलाज किसी एक गोली या एक रिपोर्ट से तय नहीं होता। आपकी दवा कितने समय तक चलेगी, यह आपकी बीमारी के प्रकार, शुगर नियंत्रण, शरीर की स्थिति और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए अगली बार रिपोर्ट सामान्य आए तो खुशी जरूर मनाइए, लेकिन दवा खुद से बंद करने के बजाय अपने डॉक्टर से यह जरूर पूछिए कि क्या अब आपके इलाज की समीक्षा करने का समय आ गया है।

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