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9 हजार प्लास्टिक बोतलों का बना ये क्लासरूम! बच्चों की 2 KM की मुश्किल ऐसे हुई खत्म, देखकर रह जाएंगे हैरान



स्कूल तक पहुंचने के लिए रोज कुछ मिनट का सफर करना ज्यादातर बच्चों के लिए सामान्य बात है। लेकिन जब किसी बच्चे को पढ़ाई के लिए रोजाना दो किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करनी पड़े और रास्ता भी खराब होने के साथ-साथ व्यस्त सड़क से होकर गुजरता हो, तो स्कूल जाना एक चुनौती बन जाता है। खासकर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए दूरी, सड़क की स्थिति और सुरक्षित आवागमन जैसी समस्याएं उनकी पढ़ाई पर सीधा असर डाल सकती हैं।

मिस्र के एक गांव में बच्चों के सामने भी कुछ ऐसी ही परेशानी थी। स्कूल दूर होने के कारण उन्हें प्रतिदिन लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। गांव में शैक्षणिक सुविधाओं की कमी के बीच बच्चों की पढ़ाई को आसान बनाने के लिए एक अनोखी पहल की गई। यहां ऐसा इको क्लासरूम तैयार किया गया, जिसकी दीवारों में हजारों इस्तेमाल हो चुकी प्लास्टिक बोतलों का इस्तेमाल किया गया।

इस क्लासरूम की खासियत सिर्फ इसकी निर्माण तकनीक नहीं है, बल्कि यह भी है कि इसे स्थानीय जरूरतों, पर्यावरण और सामुदायिक भागीदारी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया। निर्माण में प्लास्टिक बोतलों के साथ-साथ पुराने दरवाजे, खिड़कियां, लकड़ी के पैलेट, बांस, स्थानीय मिट्टी और पुराने निर्माण से मिले सामान का भी इस्तेमाल किया गया।

स्कूल जाने के लिए बच्चों को तय करना पड़ता था 2 किलोमीटर से ज्यादा रास्ता

यह अनोखा इको क्लासरूम मिस्र के फायूम इलाके के एजबेट इशाक गांव में तैयार किया गया। उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार, जब इस प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई थी, उस समय गांव में करीब 1,000 लोग रहते थे और यह मुख्य रूप से ग्रामीण कृषि क्षेत्र था।

गांव में बच्चों के लिए पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। ऐसे में उन्हें पढ़ाई के लिए नजदीकी स्कूल तक पहुंचने के लिए रोजाना दो किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती थी।

दूरी अपने आप में एक समस्या थी, लेकिन परेशानी यहीं खत्म नहीं होती थी। बच्चों को जिस रास्ते से गुजरना पड़ता था, उसका एक हिस्सा व्यस्त सड़क से होकर जाता था। सड़क की स्थिति भी बेहतर नहीं थी। छोटे बच्चों के लिए रोजाना इस रास्ते से आना-जाना उनके परिवारों के लिए चिंता का विषय बन सकता था।

ऐसे में गांव के भीतर ही बच्चों के लिए सीखने और पढ़ने की जगह तैयार करने का विचार सामने आया।

9 हजार से ज्यादा प्लास्टिक बोतलों का हुआ इस्तेमाल

इस प्रोजेक्ट की सबसे ज्यादा चर्चा इसकी निर्माण तकनीक को लेकर हुई। क्लासरूम की दीवारों के निर्माण में 9 हजार से ज्यादा इस्तेमाल की जा चुकी प्लास्टिक बोतलों को शामिल किया गया।

इन खाली प्लास्टिक बोतलों को फेंकने के बजाय उनमें रेत भरी गई और फिर उन्हें निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया। इस तरह ऐसी वस्तु का दोबारा उपयोग किया गया, जिसे सामान्य तौर पर कचरे के रूप में देखा जाता है।

प्लास्टिक कचरे की समस्या दुनिया के कई हिस्सों में गंभीर चुनौती बनी हुई है। ऐसे में निर्माण के दौरान उपलब्ध बेकार सामग्री का पुन: उपयोग करने का यह तरीका पर्यावरणीय दृष्टि से भी ध्यान आकर्षित करता है।

हालांकि क्लासरूम केवल प्लास्टिक बोतलों से नहीं बनाया गया था। निर्माण में स्थानीय मिट्टी से बने ब्लॉक, बांस और प्राकृतिक मिट्टी जैसी सामग्रियों का भी उपयोग किया गया।

पुराने क्लिनिक के सामान को भी मिला नया जीवन

इको क्लासरूम की एक और खास बात यह रही कि निर्माण के लिए नए संसाधनों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय आसपास उपलब्ध पुरानी सामग्रियों को भी दोबारा उपयोग में लाया गया।

बताया गया है कि पास में गिराए गए एक पुराने क्लिनिक से प्राप्त टूटे हुए कंक्रीट और दोबारा इस्तेमाल किए गए बलुआ पत्थर को इमारत की नींव में लगाया गया। इस तरह पुराने निर्माण से निकली सामग्री को बेकार छोड़ने के बजाय नए भवन में उपयोग किया गया।

यह तरीका निर्माण लागत और संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। साथ ही इससे यह संदेश भी मिलता है कि किसी पुराने सामान का उपयोग खत्म होने के बाद भी उसे नए उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

पुराने दरवाजे और खिड़कियां भी नहीं गईं बेकार

क्लासरूम के निर्माण में पुरानी चीजों को दोबारा इस्तेमाल करने का सिलसिला यहीं नहीं रुका। पुराने दरवाजों और खिड़कियों को ठीक करके उन्हें इमारत में फिर से लगाया गया।

इसी तरह फेंके गए लकड़ी के पैलेट का इस्तेमाल बच्चों के लिए डेस्क और बेंच तैयार करने में किया गया। इससे क्लासरूम के अंदर बैठने की व्यवस्था भी स्थानीय और पुन: उपयोग की गई सामग्री के जरिए तैयार हुई।

फर्श में प्राकृतिक मिट्टी का इस्तेमाल किया गया, जबकि छत के निर्माण में बांस का उपयोग किया गया। इस तरह पूरी संरचना में अलग-अलग प्राकृतिक और पुन: उपयोग योग्य सामग्रियों को जगह दी गई।

पानी बचाने के लिए बनाया गया वेस्टवॉटर सिस्टम

परियोजना में केवल भवन निर्माण और प्लास्टिक कचरे के पुन: उपयोग पर ध्यान नहीं दिया गया। पानी के इस्तेमाल को लेकर भी एक व्यवस्था तैयार की गई।

क्लासरूम में एक विशेष वेस्टवॉटर सिस्टम लगाया गया, जिसके जरिए इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा उपयोग में लाने की व्यवस्था की गई। इस पानी का इस्तेमाल लैंडस्केपिंग यानी आसपास के क्षेत्र में पौधों और हरियाली से जुड़े कामों में किया जा सकता था।

इससे परियोजना का उद्देश्य केवल बच्चों को पढ़ने के लिए एक कमरा उपलब्ध कराना नहीं रहा, बल्कि भवन को संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की अवधारणा से जोड़ना भी था।

गांव के बच्चों और युवाओं ने भी लिया निर्माण में हिस्सा

इस इको क्लासरूम की कहानी में सामुदायिक भागीदारी भी महत्वपूर्ण हिस्सा रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परियोजना की शुरुआत बच्चों और उनके माता-पिता के साथ डिजाइन वर्कशॉप से हुई थी।

इसका मतलब यह था कि क्लासरूम का डिजाइन केवल विशेषज्ञों द्वारा तय नहीं किया गया, बल्कि जिन लोगों को भविष्य में इसका इस्तेमाल करना था, उनकी जरूरतों को भी समझने की कोशिश की गई।

गांव के युवाओं को निर्माण से संबंधित तकनीकों की ट्रेनिंग दी गई। बच्चों और युवाओं के अलावा काहिरा की यूनिवर्सिटीज से जुड़े छात्रों ने भी वर्कशॉप में भाग लिया।

इन गतिविधियों के दौरान प्लास्टिक की बोतलों में रेत भरने जैसे काम भी किए गए। इससे स्थानीय समुदाय केवल भवन का लाभ लेने वाला समूह नहीं रहा, बल्कि निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा भी बना।

बच्चों की जरूरत के हिसाब से तय किया गया डिजाइन

परियोजना को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि बच्चों से उनकी जरूरतों के बारे में बातचीत की गई। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों ने खुले में खेलने और पढ़ने के लिए जगह की जरूरत बताई थी।

इसके बाद क्लासरूम के डिजाइन में ऐसी जगहों को भी शामिल किया गया। यानी इस इमारत को सिर्फ चार दीवारों और छत वाली पारंपरिक कक्षा के रूप में तैयार नहीं किया गया।

डिजाइन में बच्चों के सीखने, खेलने और खुले वातावरण में गतिविधियां करने की जरूरतों को भी ध्यान में रखा गया। इससे यह प्रोजेक्ट बच्चों की वास्तविक जरूरतों के साथ जुड़ गया।

जनवरी से जून 2022 के बीच पूरा हुआ निर्माण

इस इको क्लासरूम का निर्माण जनवरी से जून 2022 के बीच पूरा किया गया था। बाद में इसे 2023 के होलसिम अवॉर्ड्स में मिडिल ईस्ट और अफ्रीका क्षेत्र में 'Acknowledgement' यानी मान्यता भी मिली।

इस परियोजना की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक साथ कई समस्याओं को संबोधित करने की कोशिश की गई। एक तरफ बच्चों के लिए स्थानीय स्तर पर पढ़ाई की सुविधा तैयार की गई, दूसरी तरफ प्लास्टिक कचरे और पुरानी निर्माण सामग्री को दोबारा इस्तेमाल किया गया।

इसके अलावा गांव के लोगों, युवाओं और छात्रों को निर्माण प्रक्रिया में शामिल करके सामुदायिक भागीदारी को भी बढ़ावा दिया गया।

एक छोटा क्लासरूम बना बड़ी सोच की मिसाल

एजबेट इशाक का इको क्लासरूम यह दिखाता है कि किसी समस्या का समाधान हमेशा महंगे और नए संसाधनों से ही नहीं किया जाना जरूरी है। कई बार स्थानीय संसाधनों, पुराने सामान और समुदाय की भागीदारी के जरिए भी उपयोगी ढांचा तैयार किया जा सकता है।

यहां हजारों प्लास्टिक बोतलों को कचरे के बजाय निर्माण सामग्री का हिस्सा बनाया गया। पुराने दरवाजों और खिड़कियों को दोबारा इस्तेमाल किया गया। लकड़ी के पुराने पैलेट बच्चों के फर्नीचर में बदले गए। पुराने निर्माण से मिले सामान को नींव में उपयोग किया गया और पानी के पुन: इस्तेमाल की व्यवस्था भी बनाई गई।

सबसे अहम बात यह रही कि इस पूरी पहल का केंद्र बच्चे रहे। जिन बच्चों को पहले पढ़ाई के लिए रोजाना दो किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती थी, उनके लिए गांव के भीतर ही सीखने की जगह तैयार करने की कोशिश की गई।

इस तरह मिस्र के इस छोटे से गांव में तैयार हुआ इको क्लासरूम शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, रिसाइक्लिंग और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़ने वाली पहल के रूप में सामने आया। यह कहानी यह भी बताती है कि जब किसी परियोजना में स्थानीय लोगों और बच्चों की जरूरतों को केंद्र में रखा जाता है, तो उसका असर केवल एक इमारत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे समुदाय के लिए बदलाव का माध्यम बन सकता है।

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