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वैज्ञानिक भी मानते हैं शरीर के इन अंगों की हैरान करने वाली कमजोरी, नुकसान के बाद नहीं बनते पहले जैसे



कभी चोट, गंभीर बीमारी या किसी बड़े हादसे के बाद शरीर का कोई हिस्सा इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है कि उसे पहले जैसी स्थिति में लाना आसान नहीं होता। ऐसे में एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि आखिर क्या दवाइयों या आधुनिक इलाज की मदद से शरीर के हर अंग को पूरी तरह दोबारा बनाया जा सकता है? क्या हमारा शरीर खुद क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को बनाकर किसी अंग को पहले जैसा कर सकता है?

इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इंसानी शरीर में खुद को रिपेयर करने और कुछ हद तक दोबारा बनाने की प्राकृतिक क्षमता जरूर मौजूद है, लेकिन यह क्षमता हर अंग और हर तरह के ऊतक में समान नहीं होती। कुछ ऊतक चोट के बाद काफी अच्छी तरह ठीक हो सकते हैं, जबकि कुछ महत्वपूर्ण अंगों में कोशिकाओं और उनके जटिल नेटवर्क को पहले जैसा बनाना बेहद कठिन होता है।

मेडिकल साइंस के अनुसार, शरीर के कुछ हिस्सों में कोशिकाओं के दोबारा बनने की क्षमता काफी सीमित होती है। खासतौर पर ब्रेन, स्पाइनल कॉर्ड और हार्ट जैसे महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचने के बाद उन्हें पूरी तरह पहले जैसा बनाना बड़ी चुनौती माना जाता है।

ब्रेन को नुकसान पहुंचने के बाद क्या होता है?

दिमाग हमारे शरीर के सबसे जटिल अंगों में से एक है। इसमें अरबों न्यूरॉन्स और उनके बीच बेहद जटिल कनेक्शन होते हैं। यही कनेक्शन हमारे सोचने, समझने, बोलने, याद रखने, चलने और शरीर की दूसरी गतिविधियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब किसी व्यक्ति को गंभीर ब्रेन इंजरी होती है या स्ट्रोक के कारण दिमाग के किसी हिस्से में नुकसान पहुंचता है, तो क्षतिग्रस्त तंत्रिका कोशिकाओं और उनके जटिल कनेक्शन को बिल्कुल उसी तरह दोबारा बनाना बेहद मुश्किल होता है।

यही कारण है कि गंभीर ब्रेन इंजरी के बाद कुछ लोगों में बोलने, चलने, याददाश्त या शरीर के किसी हिस्से को नियंत्रित करने जैसी समस्याएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि ब्रेन इंजरी के बाद मरीज में सुधार नहीं हो सकता। इलाज, दवाओं, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और न्यूरो-रिहैबिलिटेशन की मदद से कई मरीज अपनी खोई हुई क्षमताओं में काफी सुधार कर सकते हैं।

लेकिन सुधार होने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि क्षतिग्रस्त न्यूरॉन्स पूरी तरह नए बन गए हैं। कई बार मस्तिष्क के बचे हुए हिस्से और दूसरे न्यूरल नेटवर्क कुछ कार्यों को अपनाने में मदद करते हैं।

स्पाइनल कॉर्ड की चोट क्यों गंभीर होती है?

स्पाइनल कॉर्ड यानी रीढ़ की हड्डी के अंदर मौजूद तंत्रिका तंत्र का हिस्सा दिमाग और शरीर के बीच संदेश पहुंचाने का बेहद महत्वपूर्ण रास्ता है।

यदि स्पाइनल कॉर्ड को गंभीर चोट लगती है, तो इसका असर शरीर के कई हिस्सों पर पड़ सकता है। चोट की जगह और गंभीरता के आधार पर व्यक्ति के हाथ-पैरों की ताकत, संवेदना और शरीर के दूसरे कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

स्पाइनल कॉर्ड की सबसे बड़ी समस्या यह है कि गंभीर चोट के बाद क्षतिग्रस्त तंत्रिका कोशिकाओं और उनके बीच मौजूद जटिल कनेक्शन को पहले जैसी स्थिति में वापस लाना बेहद मुश्किल होता है।

दुनियाभर में वैज्ञानिक इस क्षेत्र में लगातार रिसर्च कर रहे हैं। स्टेम सेल, न्यूरल रिपेयर, टिश्यू इंजीनियरिंग और दूसरी रिजनरेटिव तकनीकों के जरिए यह समझने की कोशिश की जा रही है कि क्षतिग्रस्त स्पाइनल कॉर्ड की कार्यक्षमता को किस तरह बेहतर तरीके से बहाल किया जा सकता है।

फिर भी अभी ऐसी कोई सामान्य चिकित्सा पद्धति उपलब्ध नहीं है जो हर गंभीर स्पाइनल कॉर्ड चोट को पूरी तरह पहले जैसा कर दे।

हार्ट अटैक के बाद दिल में क्यों बन जाता है निशान?

दिल भी उन अंगों में शामिल है जिनकी नई मांसपेशी बनाने की क्षमता सीमित होती है।

हार्ट अटैक के दौरान हृदय की मांसपेशियों तक पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। यदि यह स्थिति लंबे समय तक रहती है तो हृदय की कुछ मांसपेशी कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं या मर सकती हैं।

गंभीर नुकसान के बाद शरीर उस हिस्से की मरम्मत के लिए वहां स्कार टिश्यू यानी निशान वाला ऊतक बना सकता है। यह सामान्य हृदय की मांसपेशी की तरह सिकुड़कर प्रभावी ढंग से रक्त पंप नहीं करता।

यही वजह है कि बड़े हार्ट अटैक के बाद कुछ लोगों में दिल की पंपिंग क्षमता कम हो सकती है। नुकसान कितना हुआ है, यह व्यक्ति की स्थिति और हृदय के प्रभावित हिस्से पर निर्भर करता है।

वैज्ञानिक हार्ट की मांसपेशियों को दोबारा बनाने और उसकी कार्यक्षमता बहाल करने के लिए कई रिजनरेटिव तकनीकों पर शोध कर रहे हैं। लेकिन गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त वयस्क हृदय को पूरी तरह मूल स्थिति में वापस बनाना अभी भी बड़ी मेडिकल चुनौती है।

क्या शरीर खुद को रिपेयर नहीं करता?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। वास्तव में हमारा शरीर हर समय खुद को रिपेयर करता रहता है।

अगर त्वचा पर छोटी चोट लगती है तो कुछ समय बाद घाव भर जाता है। हड्डी टूटने के बाद शरीर उसे जोड़ने की प्रक्रिया शुरू करता है। शरीर के कई ऊतक लगातार पुरानी कोशिकाओं को हटाकर नई कोशिकाएं बनाते रहते हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

रिपेयर और रिजनरेशन एक ही चीज नहीं हैं।

रिपेयर का मतलब है कि शरीर क्षतिग्रस्त हिस्से को भरने और उसकी कार्यक्षमता को बहाल करने की कोशिश करता है। वहीं रिजनरेशन में खोए हुए ऊतक को दोबारा इस तरह बनाना शामिल होता है कि उसकी संरचना और कार्यक्षमता काफी हद तक पहले जैसी हो जाए।

इसी कारण किसी चोट के बाद निशान बन जाना और किसी अंग का बिल्कुल पहले जैसा बन जाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

लिवर को क्यों माना जाता है खास?

इंसानी शरीर में लिवर यानी यकृत अपनी बेहतरीन रिजनरेटिव क्षमता के लिए जाना जाता है।

यदि लिवर का कुछ हिस्सा किसी बीमारी, चोट या सर्जरी के कारण हट जाता है, तो बचा हुआ लिवर टिश्यू बढ़कर काफी हद तक अपनी आवश्यक क्षमता को बहाल कर सकता है।

यही वजह है कि लिवर को मानव शरीर के उन अंगों में गिना जाता है जिनमें असाधारण पुनर्निर्माण क्षमता होती है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि लिवर हर स्थिति में पूरी तरह ठीक हो सकता है। लंबे समय तक चलने वाली बीमारी, अत्यधिक स्कारिंग, सिरोसिस या गंभीर क्षति के मामलों में लिवर की सामान्य संरचना और कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि लिवर को कितना भी नुकसान हो जाए, वह हमेशा अपने आप पूरी तरह ठीक हो जाएगा।

त्वचा और हड्डियों में भी होती है बेहतर रिकवरी

शरीर के कुछ अन्य हिस्से भी चोट के बाद अच्छी तरह ठीक हो सकते हैं। त्वचा इसका सबसे सामान्य उदाहरण है। कटने या चोट लगने के बाद शरीर नई कोशिकाओं का निर्माण करता है और धीरे-धीरे घाव भरने लगता है।

इसी तरह हड्डियों में भी खुद को ठीक करने की उल्लेखनीय क्षमता होती है। हड्डी टूटने के बाद शरीर उस जगह पर नई हड्डी बनाने की प्रक्रिया शुरू करता है।

हालांकि यहां भी चोट का प्रकार, व्यक्ति की उम्र, पोषण, रक्त की आपूर्ति और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियां रिकवरी को प्रभावित कर सकती हैं।

भविष्य में क्या अंग दोबारा बनाए जा सकेंगे?

मेडिकल साइंस में रिजनरेटिव मेडिसिन तेजी से विकसित हो रही है। वैज्ञानिक स्टेम सेल, टिश्यू इंजीनियरिंग, सेल रिप्रोग्रामिंग और दूसरी तकनीकों की मदद से क्षतिग्रस्त ऊतकों को दोबारा बनाने के तरीकों पर शोध कर रहे हैं।

भविष्य में ऐसी तकनीकें विकसित होने की उम्मीद है जो आज मुश्किल माने जाने वाले कई अंगों और ऊतकों की मरम्मत को बेहतर बना सकें।

लेकिन किसी तकनीक का प्रयोगशाला में सफल होना और उसका आम मरीजों के लिए सुरक्षित तथा प्रभावी उपचार बन जाना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी नई रिजनरेटिव थेरेपी को लेकर बिना विशेषज्ञ की सलाह के दावा या उम्मीद करना उचित नहीं है।

गंभीर चोट में समय पर इलाज क्यों जरूरी है?

अगर किसी व्यक्ति को सिर में गंभीर चोट लगी है, रीढ़ पर चोट आई है, हार्ट अटैक के लक्षण हैं या किसी अंग को गंभीर नुकसान पहुंचा है, तो घरेलू उपचार या केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।

समय पर इलाज मिलने से कई मामलों में आगे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है और रिकवरी की संभावना बेहतर हो सकती है।

इंसानी शरीर में खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता मौजूद है, लेकिन हर अंग की यह क्षमता अलग-अलग होती है। त्वचा, हड्डियों और खासतौर पर लिवर में रिपेयर और रिजनरेशन की क्षमता अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है, जबकि ब्रेन, स्पाइनल कॉर्ड और हार्ट जैसे अंगों में गंभीर क्षति के बाद पूरी संरचना और कार्यक्षमता को पहले जैसा बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण है।

मेडिकल साइंस लगातार ऐसे उपचार विकसित करने की कोशिश कर रहा है जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और ऊतकों को बेहतर तरीके से रिपेयर कर सकें। आने वाले समय में रिजनरेटिव मेडिसिन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन फिलहाल किसी गंभीर अंग क्षति के बाद इलाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सही समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता और उचित रिहैबिलिटेशन ही है।

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