रोज जिस सरसों के तेल में बनता है खाना, विदेशों में क्यों उठे इस पर सवाल? सामने आया इरुसिक एसिड का बड़ा राज!
भारतीय रसोई की पहचान केवल मसालों और पारंपरिक व्यंजनों से नहीं होती, बल्कि अलग-अलग तरह के खाद्य तेल भी हमारे खान-पान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सरसों का तेल इनमें एक खास स्थान रखता है। इसकी तेज खुशबू, तीखा स्वाद और विशिष्ट रंग के कारण उत्तर भारत, पूर्वी भारत और देश के कई अन्य हिस्सों में इसका इस्तेमाल लंबे समय से खाना पकाने, अचार बनाने और पारंपरिक व्यंजनों में किया जाता रहा है।
लेकिन सरसों के तेल को लेकर एक सवाल अक्सर सामने आता है—अगर यह भारत में खाने के लिए इस्तेमाल होता है, तो फिर अमेरिका में इसके साथ अलग तरह के नियम क्यों हैं? क्या सरसों का तेल वास्तव में स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है? और आखिर इसमें मौजूद इरुसिक एसिड क्या होता है?
इस विषय को समझने के लिए अमेरिका और यूरोप के नियमों के बीच अंतर समझना जरूरी है। अमेरिका में खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी FDA ने expressed mustard oil को लेकर सख्त नियामकीय रुख अपनाया है। इसका मुख्य कारण कुछ प्रकार के सरसों के तेल में इरुसिक एसिड की अपेक्षाकृत अधिक मात्रा होना है।
वहीं यूरोप को लेकर यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि वहां सरसों के तेल पर पूर्ण प्रतिबंध है। यूरोपीय संघ में खाद्य पदार्थों में इरुसिक एसिड की अधिकतम सीमा तय की गई है। यानी वहां मुख्य जोर तेल में मौजूद इरुसिक एसिड की मात्रा को निर्धारित सीमा के भीतर रखने पर है।
क्या है इरुसिक एसिड?
इरुसिक एसिड एक प्रकार का मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड है। यह प्राकृतिक रूप से सरसों और रेपसीड जैसी कुछ फसलों के बीजों से प्राप्त तेल में पाया जाता है। अलग-अलग किस्मों और तेलों में इसकी मात्रा अलग हो सकती है।
पारंपरिक सरसों के तेल में इरुसिक एसिड की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। दूसरी ओर कुछ ऐसी किस्में भी विकसित की गई हैं जिनमें इरुसिक एसिड की मात्रा काफी कम होती है।
यही अंतर खाद्य सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी तेल में मौजूद फैटी एसिड की संरचना उसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए अलग-अलग देशों के खाद्य नियामक तेलों में कुछ विशेष पदार्थों की अधिकतम स्वीकार्य मात्रा तय करते हैं।
इरुसिक एसिड को लेकर चिंता क्यों है?
इरुसिक एसिड को लेकर वैज्ञानिक चिंता मुख्य रूप से पशुओं पर किए गए अध्ययनों से सामने आई है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में इरुसिक एसिड वाले तेल का सेवन करने से प्रयोगशाला में कुछ पशुओं के हृदय की मांसपेशियों में वसा जमा होने जैसी स्थिति देखी गई।
इस स्थिति को मायोकार्डियल लिपिडोसिस कहा जाता है। हालांकि पशुओं में देखे गए प्रभावों को सीधे मनुष्यों पर लागू नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि इस विषय को समझते समय वैज्ञानिक प्रमाणों और नियामकीय सीमाओं के बीच अंतर करना जरूरी है।
खाद्य सुरक्षा संस्थाओं ने उपलब्ध अध्ययनों के आधार पर इरुसिक एसिड के सेवन के लिए सुरक्षित सीमा तय करने की कोशिश की है। इसी वजह से कई देशों में खाद्य तेलों में इसकी मात्रा को नियंत्रित किया जाता है।
अमेरिका में सरसों के तेल को लेकर क्या नियम हैं?
अमेरिका में expressed mustard oil यानी बीजों से निकाला गया सरसों का तेल, जिसे खाना पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, नियामकीय जांच के दायरे में आता है।
अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अनुसार कुछ expressed mustard oil में इरुसिक एसिड की मात्रा काफी अधिक हो सकती है। इसी कारण ऐसे तेल को खाद्य उपयोग के लिए स्वीकार नहीं किया जाता और आयात के दौरान उस पर कार्रवाई हो सकती है।
यही वजह है कि अमेरिका में कुछ भारतीय और दक्षिण एशियाई बाजारों में मिलने वाले सरसों के तेल की बोतलों पर "For External Use Only" यानी केवल बाहरी इस्तेमाल के लिए लिखा दिखाई देता है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। अमेरिका में सरसों के तेल से संबंधित सभी उत्पादों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जाता। खाने के लिए इस्तेमाल होने वाले expressed mustard oil और flavoring के लिए इस्तेमाल होने वाले volatile mustard oil अलग उत्पाद हो सकते हैं।
इसलिए यह कहना कि अमेरिका में "सरसों का तेल पूरी तरह प्रतिबंधित है", पूरी तस्वीर नहीं बताता।
यूरोप में क्या स्थिति है?
यूरोप को लेकर भी सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जाते हैं। अक्सर कहा जाता है कि यूरोप में सरसों का तेल पूरी तरह बैन है। लेकिन वास्तविक स्थिति इससे अलग है।
यूरोपीय संघ में खाद्य पदार्थों में इरुसिक एसिड की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है। सामान्य वनस्पति तेलों के लिए एक सीमा तय है, जबकि mustard oil और कुछ अन्य विशेष तेलों के लिए अलग सीमा निर्धारित की गई है।
इसका मतलब यह है कि यूरोप में सरसों के तेल के मामले में मुख्य सवाल यह है कि उसमें इरुसिक एसिड की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक तो नहीं है।
इसलिए "यूरोप में सरसों का तेल बैन है" कहना एक सामान्यीकृत दावा होगा। अधिक सही बात यह है कि वहां इरुसिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जाता है।
भारत में सरसों के तेल की स्थिति क्या है?
भारत में सरसों का तेल लंबे समय से खाद्य तेल के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। देश में खाद्य तेलों के लिए खाद्य सुरक्षा मानक निर्धारित किए गए हैं और सरसों के तेल को भी इन मानकों के तहत नियंत्रित किया जाता है।
भारत में पारंपरिक mustard-seed oil की संरचना में इरुसिक एसिड की मात्रा अधिक हो सकती है। इसके अलावा कम इरुसिक एसिड वाली कुछ किस्मों के तेल भी उपलब्ध हैं।
यानी केवल "सरसों का तेल" नाम सुनकर सभी उत्पादों को एक जैसा मानना सही नहीं है। तेल की किस्म, बीज की गुणवत्ता, उत्पादन प्रक्रिया और उसकी फैटी एसिड संरचना में अंतर हो सकता है।
क्या सरसों का तेल खाने से तुरंत नुकसान होता है?
यह कहना सही नहीं होगा कि सरसों का तेल खाते ही किसी व्यक्ति को नुकसान हो जाएगा। स्वास्थ्य पर किसी खाद्य पदार्थ का प्रभाव उसकी मात्रा, सेवन की अवधि, व्यक्ति की कुल डाइट और स्वास्थ्य स्थिति जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
इरुसिक एसिड को लेकर वैज्ञानिक चिंताएं मुख्य रूप से अधिक मात्रा और लंबे समय तक सेवन से जुड़े अध्ययनों पर आधारित हैं। इसलिए इस विषय को लेकर डर फैलाने के बजाय वैज्ञानिक और नियामकीय जानकारी को समझना जरूरी है।
अगर किसी व्यक्ति की डाइट में सरसों का तेल शामिल है तो केवल सोशल मीडिया पर वायरल किसी दावे के आधार पर अचानक तेल बदलने या बंद करने का फैसला करना जरूरी नहीं है।
तेल खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
खाद्य तेल खरीदते समय सबसे पहले पैकेट या बोतल पर दी गई जानकारी पढ़ें। निर्माता, पैकिंग, बैच नंबर, इस्तेमाल की अवधि और अन्य आवश्यक विवरणों को जरूर देखें।
तेल किसी भरोसेमंद ब्रांड या विश्वसनीय स्रोत से खरीदना बेहतर रहता है। अगर तेल में असामान्य गंध, रंग या स्वाद दिखाई दे तो उसका इस्तेमाल करने से बचें।
खाद्य तेल को भी सही तरीके से स्टोर करना जरूरी है। बहुत ज्यादा गर्मी, रोशनी या लंबे समय तक गलत तरीके से रखे जाने पर तेल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
क्या केवल एक ही तेल इस्तेमाल करना जरूरी है?
किसी व्यक्ति की डाइट में किस प्रकार का तेल शामिल होना चाहिए, यह उसकी कुल खान-पान की आदतों और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।
कुछ लोग सरसों के तेल का इस्तेमाल करते हैं, जबकि कुछ परिवार मूंगफली, तिल, सोयाबीन, सूरजमुखी या अन्य वनस्पति तेलों का इस्तेमाल करते हैं।
स्वस्थ खान-पान के लिए केवल तेल का चुनाव ही महत्वपूर्ण नहीं है। कुल आहार, सब्जियों और फलों का सेवन, साबुत अनाज, प्रोटीन, शारीरिक गतिविधि और भोजन की मात्रा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अगर किसी व्यक्ति को हृदय रोग, कोलेस्ट्रॉल की समस्या, डायबिटीज या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है तो उसे अपने डॉक्टर या योग्य पोषण विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर सच क्या है?
सरसों के तेल को लेकर अमेरिका और यूरोप के नियमों की चर्चा अक्सर इस दावे के साथ की जाती है कि "विदेशों में सरसों के तेल को जहर माना जाता है।" यह दावा जरूरत से ज्यादा सरल है।
असल मुद्दा इरुसिक एसिड की मात्रा से जुड़ा है। कुछ प्रकार के सरसों के तेल में इसकी मात्रा काफी अधिक हो सकती है और इसी वजह से कुछ देशों ने खाद्य उपयोग के लिए इसके स्तर को नियंत्रित किया है।
अमेरिका में expressed mustard oil को लेकर खाद्य नियामकीय प्रतिबंध और आयात संबंधी कार्रवाई के प्रावधान मौजूद हैं। वहीं यूरोपीय संघ में इरुसिक एसिड के लिए अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है।
भारत में सरसों का तेल खाद्य तेल के रूप में निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत आता है। इसलिए इस विषय को केवल "सरसों का तेल अच्छा है या खराब" के रूप में देखना सही नहीं होगा।
सबसे जरूरी बात यह है कि उपभोक्ता तेल की गुणवत्ता, उत्पाद की जानकारी और अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य जरूरतों को ध्यान में रखे। अगर किसी व्यक्ति को पहले से कोई बीमारी है या वह अपनी डाइट को लेकर चिंतित है, तो डॉक्टर या योग्य पोषण विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे उचित तरीका है।
यह लेख सामान्य स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा संबंधी जानकारी के लिए है। किसी व्यक्ति के लिए कौन-सा खाद्य तेल उचित है, यह उसकी स्वास्थ्य स्थिति और कुल आहार पर निर्भर कर सकता है। किसी भी बड़े आहार परिवर्तन से पहले योग्य डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ की सलाह लें।

कोई टिप्पणी नहीं