जवानों की पीठ का बोझ होगा गायब! कोटा के इंजीनियर ने बनाया ऐसा एक्सोसूट, सेना भी हुई प्रभावित
कोटा। भारतीय सेना के जवानों को देश की सुरक्षा के लिए कई बार ऐसी परिस्थितियों में घंटों और दिनों तक काम करना पड़ता है, जहां सामान्य इंसान के लिए कुछ किलोमीटर चलना भी चुनौती बन जाता है। राजस्थान की तपती रेत हो, बर्फ से ढकी पहाड़ियां हों या घने और दुर्गम जंगल—सैनिकों को अपने साथ हथियार, गोला-बारूद, राशन और दूसरे जरूरी सैन्य उपकरण लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। भारी वजन का यह बोझ समय के साथ जवानों के शरीर पर भी असर डालता है।
इसी चुनौती को कम करने के लिए राजस्थान के कोटा के इंजीनियर गौरव राय की टीम ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो आने वाले समय में सैनिकों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। इसे ‘हनुमंता एक्सो-1’ नाम दिया गया है। इसका एडवांस वर्जन अब ‘हनुमंता एक्सो 1.2’ के रूप में तैयार किया जा चुका है।
दावा है कि यह ह्यूमन एक्सोसूट जवानों के शरीर पर पड़ने वाले भारी वजन के दबाव को काफी हद तक कम कर सकता है। तकनीक को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि सैनिक भारी सैन्य सामग्री के साथ आगे बढ़ते समय कम थकान महसूस करें और उनकी गतिशीलता बनी रहे।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस एक्सोसूट का शुरुआती मॉडल जहां करीब 11.1 किलो वजन का था, वहीं तकनीकी सुधार के बाद इसका वजन घटाकर करीब 7.5 किलो किए जाने की जानकारी सामने आई है।
जवान के कंधे का बोझ कम करने का दावा
सेना के जवानों को लंबे समय तक भारी वजन उठाकर चलना पड़ता है। कई परिस्थितियों में उनके कंधों पर करीब 50-60 किलो तक का सामान होने की बात सामने आती है। लंबे समय तक इस तरह वजन उठाने से पीठ, घुटनों और पैरों पर दबाव बढ़ सकता है।
‘हनुमंता एक्सो-1’ इसी समस्या को कम करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इसके इस्तेमाल से जवान को अपने ऊपर लदे वजन का काफी कम हिस्सा ही महसूस होने का दावा किया जा रहा है।
कुछ दावों में यह क्षमता 80 से 90 प्रतिशत तक भार कम महसूस होने के रूप में बताई गई है। हालांकि, वास्तविक परिस्थितियों में किसी सैनिक को कितना भार महसूस होगा, यह वजन, भू-भाग, गति, उपकरण की सेटिंग और परीक्षण के परिणामों पर निर्भर करेगा। इसलिए इन आंकड़ों को फिलहाल तकनीक के विकास से जुड़े दावे के तौर पर देखना जरूरी है।
100 से 200 किलो तक भार के साथ चलने का लक्ष्य
इस एक्सोसूट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसकी संभावित भार वहन क्षमता को लेकर है। इसे इस तरह विकसित किया जा रहा है कि जवान 100 से 200 किलो तक के भारी सामान को संभालने और उसके साथ आगे बढ़ने में सक्षम हो सकें।
इसमें हथियार, गोला-बारूद, सैन्य उपकरण और अन्य जरूरी सामान शामिल हो सकते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सैनिक अपने शरीर पर सीधे 200 किलो वजन उठाएंगे। एक्सोसूट का उद्देश्य भार का कुछ हिस्सा एक यांत्रिक सपोर्ट सिस्टम के जरिए जमीन तक पहुंचाना और शरीर पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है।
यही वजह है कि अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सैन्य परीक्षणों में सफल साबित होती है, तो इसका इस्तेमाल उन परिस्थितियों में किया जा सकता है जहां सैनिकों को भारी सामान के साथ लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
क्या है ‘हनुमंता एक्सो-1’ का सिस्टम?
इस एक्सोसूट की कार्यप्रणाली को समझें तो यह शरीर के साथ मिलकर काम करने वाली एक तरह की यांत्रिक संरचना है। इसमें डेल्टा स्प्रिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है।
इसका उद्देश्य पीठ और शरीर पर लदे भार को पैरों और जूतों के जरिए जमीन की ओर ट्रांसफर करना है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है कि शरीर पर आने वाले वजन को सीधे मांसपेशियों पर डालने के बजाय एक मैकेनिकल सिस्टम उसका बड़ा हिस्सा नीचे जमीन तक पहुंचाने में मदद करता है।
स्प्रिंग आधारित सिस्टम जवान के पैरों की गतिविधियों के साथ तालमेल बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। जवान जब चलता है या दौड़ता है, तो एक्सोसूट उसकी मूवमेंट के अनुसार प्रतिक्रिया करता है।
यानी इसका मकसद जवान की जगह चलना नहीं, बल्कि जवान की प्राकृतिक ताकत को सपोर्ट करना है।
पिता की परेशानी देखकर आया आइडिया
इस तकनीक के पीछे एक व्यक्तिगत अनुभव भी जुड़ा बताया जाता है। इंजीनियर गौरव राय को एक्सोसूट तैयार करने का विचार उनके पिता सतेंद्र राय से मिला, जो सेना में अधिकारी रह चुके हैं।
लंबे समय तक सैन्य सेवा के दौरान भारी बैग और सामान लेकर गश्त करने का अनुभव उनके पिता को रहा। बताया जाता है कि आज भी उन्हें घुटनों और पीठ से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
गौरव ने जवानों की इस समस्या को सिर्फ एक व्यक्तिगत अनुभव के तौर पर नहीं देखा, बल्कि इसे तकनीकी समाधान में बदलने का फैसला किया। इसी सोच से एक्सोसूट पर काम आगे बढ़ा।
2023 में शुरू हुआ था काम
जानकारी के मुताबिक, इस तकनीक पर काम वर्ष 2023 में एआईसी आईआईटी दिल्ली के सोनीपत कैंपस से जुड़े इनक्यूबेशन इकोसिस्टम में शुरू हुआ था। इसके बाद लगातार डिजाइन, टेस्टिंग और तकनीकी सुधार किए गए।
शुरुआती मॉडल के बाद टीम ने कम वजन और बेहतर उपयोगिता वाले नए वर्जन पर काम किया। करीब डेढ़ महीने के भीतर ‘हनुमंता एक्सो 1.2’ तैयार करने का दावा किया गया है।
नए मॉडल में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव इसका वजन कम करना है। शुरुआती मॉडल का वजन लगभग 11.1 किलो था, जिसे घटाकर 7.5 किलो के आसपास किया गया है। इसका मतलब यह है कि जवान को एक्सोसूट पहनने के बाद खुद इस उपकरण का वजन भी अतिरिक्त रूप से उठाना होगा, इसलिए वजन कम करना तकनीक की उपयोगिता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
कोटा में बन रहा, सोनीपत में हो रही टेस्टिंग
इस ह्यूमन एक्सोसूट का निर्माण कोटा में किया जा रहा है, जबकि इसके तकनीकी परीक्षण और सुधार से जुड़ा काम सोनीपत में किया जा रहा है।
टीम अटल इनक्यूबेशन सेंटर से जुड़े संस्थागत सहयोग के साथ इसके डिजाइन और लैब टेस्टिंग पर काम कर रही है। तकनीक को सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि सैनिकों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर इसके नए वर्जन विकसित किए जा रहे हैं।
किसी भी सैन्य उपकरण के लिए सिर्फ लैब में सफल होना पर्याप्त नहीं होता। उसे अलग-अलग मौसम, भू-भाग, तापमान और वास्तविक उपयोग जैसी परिस्थितियों में भी परखा जाना जरूरी होता है। एक्सोसूट के मामले में भी आगे यही सबसे महत्वपूर्ण चरण होगा।
सेना और DRDO के सामने हो चुका है प्रेजेंटेशन
जानकारी के अनुसार, इस तकनीक का प्रेजेंटेशन भारतीय रक्षा विश्वविद्यालय के अधिकारियों के माध्यम से सेना और DRDO के समक्ष भी किया जा चुका है।
बताया गया है कि सेना की तरफ से तकनीक को उपयोगी माना गया और इसे आगे AI से लैस करने का सुझाव भी दिया गया। अगर भविष्य के मॉडल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम जोड़ा जाता है तो एक्सोसूट जवान की चाल, भार और शरीर की गतिविधियों के अनुसार ज्यादा स्मार्ट तरीके से प्रतिक्रिया कर सकता है।
हालांकि, इस तरह की क्षमता को वास्तविक सैन्य इस्तेमाल के लिए अपनाने से पहले विस्तृत परीक्षण और प्रमाणन की आवश्यकता होगी।
पेटेंट की भी तैयारी
इस स्वदेशी तकनीक को लेकर पेटेंट प्रक्रिया शुरू किए जाने की भी तैयारी है। अगर तकनीक का पेटेंट होता है तो इससे इसके बौद्धिक संपदा अधिकार सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक विकसित करने का उद्देश्य केवल सैन्य जरूरत पूरी करना नहीं है, बल्कि देश के भीतर रिसर्च, डिजाइन और निर्माण की क्षमता को मजबूत करना भी है।
जवानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है यह तकनीक?
सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ हथियार चलाना नहीं होती। उन्हें कई बार भारी उपकरणों के साथ कठिन भूभाग पर घंटों चलना पड़ता है। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी, रेगिस्तान में गर्मी और जंगलों में कठिन रास्ते उनकी शारीरिक क्षमता की कड़ी परीक्षा लेते हैं।
ऐसे में यदि कोई एक्सोसूट जवान के शरीर पर पड़ने वाले भार को कम कर दे, तो उसकी ऊर्जा का इस्तेमाल दूसरे महत्वपूर्ण कामों में किया जा सकता है।
सैनिक ज्यादा देर तक सक्रिय रह सके, उसकी थकान कम हो और भारी सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना आसान हो—इसी दिशा में इस तकनीक की सबसे बड़ी उपयोगिता देखी जा रही है।
क्या भविष्य में बदल जाएगी सैनिकों की युद्ध क्षमता?
‘हनुमंता एक्सो-1’ अभी विकास और परीक्षण के चरण से गुजर रही तकनीक है। इसलिए इसे तुरंत सेना के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में आने वाला उपकरण मानना जल्दबाजी होगी।
लेकिन अगर इसके दावे वास्तविक परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों में सफल साबित होते हैं, तो यह सैनिकों की लॉजिस्टिक्स और शारीरिक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
एक ऐसा उपकरण जो सैनिक की प्राकृतिक गतिविधियों में बाधा डाले बिना भारी वजन संभालने में सहायता करे, भविष्य के युद्धक्षेत्र में काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
कोटा में तैयार हो रहा ‘हनुमंता एक्सो 1.2’ फिलहाल एक तकनीकी प्रयोग से आगे बढ़कर सेना की जरूरतों के अनुरूप विकसित किए जा रहे स्वदेशी समाधान की तस्वीर पेश करता है। आने वाले परीक्षण यह तय करेंगे कि 7.5 किलो का यह एक्सोसूट वास्तव में मैदान में जवानों का बोझ कितना कम कर पाता है और क्या यह 100-200 किलो तक के भारी भार के साथ उनकी गतिशीलता और सहनशक्ति को अपेक्षित स्तर तक बढ़ा सकता है।

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