तेल के खेल में आया सबसे बड़ा ट्विस्ट! सऊदी अरब ने यूरोप की सप्लाई रोकी, अब इस देश से भेज रहा तेल
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल सऊदी अरब के सामने इस समय कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। देश की महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के बाद यनबू बंदरगाह से होने वाले तेल प्रवाह पर असर पड़ा है। इसके बाद सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल के निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल तेज कर दिया है।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान करीब 60 मिलियन बैरल कच्चे तेल को ओमान के सोहार के आसपास शिप-टू-शिप ट्रांसफर के जरिए आगे भेजने की योजना पर काम कर रही है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य रेड सी के रास्ते प्रभावित हुई सप्लाई की भरपाई करना और खासकर एशियाई ग्राहकों तक कच्चे तेल की आपूर्ति बनाए रखना है।
इस घटनाक्रम का असर यूरोप पर भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, अरामको ने कम से कम दो यूरोपीय रिफाइनिंग कंपनियों को अक्टूबर में सऊदी क्रूड की सप्लाई नहीं मिलने की जानकारी दी है। इससे यूरोपीय रिफाइनरों को दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।
60 मिलियन बैरल तेल को ओमान के रास्ते भेजने की तैयारी
सऊदी अरब के लिए ओमान का सोहार इस समय एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक ट्रांसफर पॉइंट बनकर सामने आया है। रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब के रास तनूरा जैसे गल्फ टर्मिनलों से लोड किए गए कच्चे तेल को बड़े टैंकरों के जरिए ओमान के सोहार के आसपास ले जाया जा रहा है। वहां समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल ट्रांसफर किया जा सकता है।
इसे Ship-to-Ship Transfer कहा जाता है। इस प्रक्रिया में तेल को बंदरगाह पर उतारने के बजाय समुद्र में ही एक टैंकर से दूसरे टैंकर में स्थानांतरित किया जाता है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर और अक्टूबर में इस वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए करीब 60 मिलियन बैरल सऊदी क्रूड भेजने की योजना है। यह लगभग 1 से 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के औसत के बराबर है और इससे एशिया की ओर जाने वाली सप्लाई को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
आखिर सऊदी अरब को रूट बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब की East-West Pipeline है। यह करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन देश के पूर्वी हिस्से के प्रमुख तेल उत्पादन क्षेत्रों को पश्चिम में स्थित यनबू बंदरगाह से जोड़ती है।
इस पाइपलाइन को मूल रूप से इसलिए बनाया गया था ताकि सऊदी अरब को अपने तेल निर्यात के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े। पाइपलाइन के जरिए पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल पश्चिमी तट तक पहुंचाया जाता है, जहां से इसे समुद्री रास्ते से आगे भेजा जा सकता है।
हालिया ड्रोन हमले में पाइपलाइन के कई पंपिंग स्टेशनों को नुकसान पहुंचने की खबर सामने आई। इसके बाद यनबू से होने वाली क्रूड लोडिंग प्रभावित हुई। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, पाइपलाइन की मरम्मत में तीन से पांच सप्ताह लग सकते हैं, जबकि दूसरी रिपोर्टों में पूर्ण क्षमता बहाल होने में इससे अधिक समय लगने की संभावना भी बताई गई है।
सऊदी तेल का एशिया की तरफ बढ़ा रुख
पाइपलाइन में व्यवधान के बाद सऊदी अरब ने अपने गल्फ टर्मिनलों से तेल की लोडिंग बढ़ाई है। रॉयटर्स के मुताबिक, रास तनूरा और रास अल-जुआइमा जैसे टर्मिनलों से लोडिंग बढ़कर करीब 4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई थी। वहीं ओमान के सोहार के पास वैकल्पिक शिप-टू-शिप व्यवस्था के जरिए एशियाई ग्राहकों को तेल की पेशकश की जा रही है।
इसमें Arab Light, Arab Medium और Arab Heavy जैसे सऊदी क्रूड ग्रेड शामिल हैं। एशिया सऊदी अरब के तेल का बड़ा बाजार है और चीन, दक्षिण कोरिया, जापान तथा भारत जैसे देश इसके प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं।
रॉयटर्स के अनुसार, सोहार के पास होने वाले वैकल्पिक ट्रांसफर से चीन, दक्षिण कोरिया, भारत और जापान जैसे खरीदारों तक सप्लाई बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है?
भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है और इसकी रिफाइनिंग इंडस्ट्री को लगातार बड़ी मात्रा में क्रूड की जरूरत होती है। इसलिए सऊदी तेल की सप्लाई में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय रिफाइनरियों और घरेलू ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस घटनाक्रम से भारत को सीधे तौर पर “बड़ा फायदा” ही होगा। अगर सऊदी अरब एशियाई खरीदारों के लिए वैकल्पिक सप्लाई बनाए रखने में सफल रहता है, तो भारतीय रिफाइनरों के लिए उपलब्धता संबंधी दबाव कम हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, होर्मुज से जुड़े जोखिम, टैंकरों की उपलब्धता, बीमा लागत और माल ढुलाई के महंगे होने से आयात लागत पर दबाव भी पड़ सकता है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि सुपरटैंकरों की फ्रेट दरें शुरुआती अक्टूबर की लोडिंग के लिए काफी ऊंची पहुंच गई हैं। यानी तेल उपलब्ध होने के बावजूद उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत बढ़ सकती है।
यूरोप को क्यों झटका लगा?
सऊदी तेल की सप्लाई में बदलाव का सबसे सीधा असर यूरोपीय ग्राहकों पर देखने को मिल रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, अरामको ने कम से कम दो यूरोपीय रिफाइनिंग ग्राहकों को बताया है कि उन्हें अक्टूबर में सऊदी क्रूड नहीं मिलेगा।
यूरोप की कुछ रिफाइनरियां अब वैकल्पिक स्रोतों की तरफ देख रही हैं। इनमें नॉर्थ सी, अमेरिका और दूसरे क्षेत्रों से कच्चे तेल की खरीद शामिल है। पोलैंड की कंपनी ओर्लेन जैसे खरीदारों ने भी वैकल्पिक क्रूड स्रोत तलाशने शुरू किए हैं।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब के अलग-अलग क्रूड ग्रेड की गुणवत्ता और सल्फर प्रोफाइल हर वैकल्पिक तेल से समान नहीं होती। कुछ रिफाइनरियां विशेष प्रकार के मिडिल ईस्ट क्रूड को प्रोसेस करने के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। इसलिए सप्लायर बदलने पर सिर्फ कीमत ही नहीं, बल्कि रिफाइनिंग प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
क्या इससे कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी?
मध्य-पूर्व में तेल आपूर्ति को लेकर किसी भी बड़े व्यवधान का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ सकता है। पाइपलाइन हमले के बाद तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली और ब्रेंट क्रूड कुछ समय के लिए 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया।
हालांकि, वैकल्पिक सप्लाई रूट सक्रिय होने और सऊदी अरब द्वारा गल्फ से अतिरिक्त तेल भेजने की कोशिशों के बाद बाजार की चिंता कुछ कम हुई है। रॉयटर्स के मुताबिक, 60 मिलियन बैरल की संभावित अतिरिक्त गल्फ सप्लाई की खबर के बाद तेल वायदा कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली।
लेकिन बाजार के लिए सबसे बड़ा सवाल अभी भी यही है कि पाइपलाइन कितने समय तक प्रभावित रहती है। अगर मरम्मत जल्दी पूरी होती है तो दबाव कम हो सकता है। इसके उलट लंबे समय तक व्यवधान रहने पर वैश्विक सप्लाई और शिपिंग लागत पर दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी अरब के लिए भी आसान नहीं है यह रास्ता
वैकल्पिक रूट सऊदी अरब को तेल निर्यात जारी रखने में मदद कर रहा है, लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां हैं। समुद्र में शिप-टू-शिप ट्रांसफर के लिए पर्याप्त टैंकर उपलब्ध होना जरूरी है। इसके अलावा सुरक्षा, बीमा और फ्रेट लागत भी महत्वपूर्ण हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज से जुड़े सुरक्षा जोखिम और क्षेत्रीय तनाव के कारण इस तरह के वैकल्पिक ऑपरेशन सामान्य परिस्थितियों की तुलना में ज्यादा महंगे और जटिल हो सकते हैं।
जापान ने भी सप्लाई को लेकर दी राहत की जानकारी
एशिया के अन्य बड़े तेल खरीदार भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। जापान की पेट्रोलियम एसोसिएशन के अध्यक्ष शुनिची कितो के अनुसार, जापानी रिफाइनरों ने नवंबर तक के लिए पर्याप्त कच्चे तेल की व्यवस्था कर ली है। इससे फिलहाल जापान में तत्काल सप्लाई संकट की चिंता कुछ कम हुई है।
इससे संकेत मिलता है कि सऊदी सप्लाई में व्यवधान के बावजूद एशियाई खरीदार वैकल्पिक शिपमेंट और स्टॉक के जरिए तत्काल जरूरतों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।
अब आगे क्या होगा?
सऊदी अरब के लिए आने वाले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। एक तरफ ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की मरम्मत और यनबू से निर्यात बहाल करने की कोशिश होगी, तो दूसरी तरफ गल्फ टर्मिनलों और ओमान के सोहार के आसपास वैकल्पिक ट्रांसफर जारी रखने की चुनौती होगी।
अगर पाइपलाइन जल्द आंशिक या पूरी क्षमता से दोबारा शुरू हो जाती है तो वैश्विक तेल बाजार पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन अगर मरम्मत में ज्यादा समय लगता है, तो सऊदी अरब को लंबे समय तक वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब ने तेल की सप्लाई पूरी तरह रोकने के बजाय रूट बदलकर उसे जारी रखने की कोशिश की है। करीब 60 मिलियन बैरल क्रूड को सितंबर-अक्टूबर में ओमान के सोहार के पास शिप-टू-शिप ट्रांसफर के जरिए आगे भेजने की योजना इसी रणनीति का हिस्सा है।
यानी रेड सी की परेशानी ने वैश्विक तेल व्यापार का रास्ता जरूर बदल दिया है, लेकिन फिलहाल सऊदी अरब वैकल्पिक रास्तों के जरिए अपने प्रमुख एशियाई ग्राहकों तक कच्चा तेल पहुंचाने की कोशिश में जुटा हुआ है। दूसरी ओर, यूरोपीय रिफाइनरों को कुछ सऊदी कार्गो रद्द होने के बाद दूसरे सप्लायरों की तरफ देखना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में पाइपलाइन की मरम्मत की रफ्तार, होर्मुज की स्थिति, टैंकरों की उपलब्धता और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात यह तय करेंगे कि इस पूरे घटनाक्रम का वैश्विक तेल बाजार पर असर कितना लंबा चलता है।

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