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इंसान के शरीर में लगाई सूअर की किडनी… 271 दिन तक करती रही काम, फिर अचानक बंद हो गई! डॉक्टर भी तलाशते रहे वजह



मेडिकल साइंस की दुनिया में अंग प्रत्यारोपण को लेकर एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। अमेरिका में डॉक्टरों ने जेनेटिक रूप से बदली गई सूअर की किडनी को एक इंसान में ट्रांसप्लांट किया, जो 271 दिनों तक काम करती रही। इसे अब तक के सबसे लंबे समय तक काम करने वाले सूअर-किडनी प्रत्यारोपण के मामलों में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

इस ट्रांसप्लांट से गुजरने वाले मरीज का नाम टिम एंड्रयूज़ बताया गया है। उनके लिए यह प्रयोग केवल मेडिकल रिसर्च का हिस्सा नहीं था, बल्कि जीवन में उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया। सूअर की किडनी काम करने के दौरान उन्हें कई महीनों तक नियमित डायलिसिस पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।

हालांकि, 271 दिनों के बाद प्रत्यारोपित किडनी ने काम करना बंद कर दिया और डॉक्टरों को उसे निकालना पड़ा। इसके बाद एंड्रयूज़ को कुछ समय के लिए फिर डायलिसिस करानी पड़ी। बाद में उन्हें मानव डोनर से किडनी मिल गई, जो फिलहाल अच्छी तरह काम कर रही है।

सात साल तक किडनी का इंतजार बताया गया था

टिम एंड्रयूज़ को टाइप-2 डायबिटीज के कारण किडनी की गंभीर बीमारी हो गई थी। धीरे-धीरे उनकी किडनी की कार्यक्षमता बेहद कम होती गई और उन्हें डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगी।

उनकी स्थिति इसलिए भी मुश्किल थी क्योंकि उन्हें बताया गया था कि मानव डोनर से किडनी मिलने में करीब सात साल तक का समय लग सकता है। दूसरी तरफ लंबे समय तक डायलिसिस पर रहने वाले मरीजों के लिए स्वास्थ्य संबंधी जोखिम लगातार बने रहते हैं।

ऐसे हालात में सूअर की किडनी का प्रत्यारोपण उनके लिए एक प्रयोगात्मक विकल्प के तौर पर सामने आया। एंड्रयूज़ ने इसे अपने लिए उम्मीद से जोड़कर देखा। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया ने उन्हें मशीन से कुछ समय के लिए आजादी दी और सामान्य जीवन जीने का मौका दिया।

25 जनवरी 2025 को हुआ था ट्रांसप्लांट

बताई गई जानकारी के मुताबिक, जब 25 जनवरी 2025 को टिम एंड्रयूज़ का ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन किया गया, तब उनकी उम्र 66 वर्ष थी।

डॉक्टरों ने जेनेटिक रूप से संशोधित सूअर से प्राप्त किडनी को उनके शरीर में प्रत्यारोपित किया। खास बात यह रही कि किडनी ने ट्रांसप्लांट के बाद काम करना शुरू कर दिया।

यह अंग करीब 271 दिनों तक काम करता रहा। इसके बाद अक्टूबर 2025 में डॉक्टरों को इसे शरीर से निकालना पड़ा।

इसके बाद एंड्रयूज़ को करीब 82 दिनों तक डायलिसिस करानी पड़ी। जनवरी 2026 में उन्हें आखिरकार मानव डोनर से किडनी प्राप्त हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, नई मानव किडनी फिलहाल ठीक तरह से काम कर रही है।

आखिर क्या है ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन?

ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन ऐसी मेडिकल तकनीक है, जिसमें किसी दूसरे जानवर के अंग, ऊतक या कोशिकाओं को इंसान के शरीर में इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है।

इस दिशा में सूअर को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका एक कारण यह है कि सूअर के कई अंगों का आकार और शारीरिक संरचना इंसानों के अंगों से काफी हद तक मेल खाती है। इसके अलावा सूअरों को नियंत्रित परिस्थितियों में बड़ी संख्या में पालना भी संभव है।

लेकिन सामान्य सूअर की किडनी को सीधे इंसान के शरीर में प्रत्यारोपित करना संभव नहीं है। इंसान का इम्यून सिस्टम उसे बाहरी अंग के रूप में पहचान सकता है और उस पर बेहद तीव्र प्रतिरोधी प्रतिक्रिया शुरू कर सकता है।

यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने सूअर के जीन में विशेष बदलाव करने की दिशा में काम किया है।

जेनेटिक बदलाव क्यों जरूरी हैं?

इंसानी शरीर का इम्यून सिस्टम लगातार यह पहचानने की कोशिश करता है कि शरीर में मौजूद कोशिकाएं अपनी हैं या बाहरी। यदि उसे कोई अंग बाहरी प्रतीत होता है, तो वह उसे नष्ट करने के लिए प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू कर सकता है।

सूअर की किडनी के मामले में यह प्रतिक्रिया बेहद गंभीर हो सकती है। इसलिए वैज्ञानिक ऐसी किडनी विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिनमें ऐसे जेनेटिक बदलाव हों जो इंसानी इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया को कम कर सकें।

बताई गई रिसर्च में युकाटन मिनिएचर पिग जैसे विशेष रूप से विकसित सूअरों का इस्तेमाल किया गया। इनके जीन में कई तरह के बदलाव किए गए हैं। इनका उद्देश्य सूअर की कोशिकाओं की उन विशेषताओं को बदलना है, जिन्हें इंसानी प्रतिरक्षा प्रणाली आसानी से पहचानकर उन पर हमला कर सकती है।

इसके अलावा कुछ इंसानी जीन भी शामिल किए जाते हैं, ताकि अंग को इंसानी शरीर में ज्यादा अनुकूल वातावरण मिल सके।

वैज्ञानिकों के लिए संक्रमण का जोखिम भी एक बड़ी चिंता है। इसलिए सूअर के जीनोम में मौजूद संभावित वायरल तत्वों को निष्क्रिय करने से जुड़े बदलाव भी किए जाते हैं।

शुरुआत में आई थी इम्यून सिस्टम की चुनौती

टिम एंड्रयूज़ के मामले में भी शुरुआत पूरी तरह आसान नहीं थी। प्रत्यारोपण के बाद कुछ ऐसे संकेत मिले थे, जिनसे आशंका हुई कि उनका शरीर नई किडनी को अस्वीकार करने की कोशिश कर रहा है।

डॉक्टरों ने उनकी दवाओं में बदलाव किया और स्थिति को नियंत्रित करने में सफलता मिली। इसके बाद किडनी लंबे समय तक काम करती रही।

लेकिन लगभग छह महीने बाद समस्या फिर सामने आने लगी। किडनी की रक्त वाहिकाओं में नुकसान के संकेत दिखाई देने लगे और अंग में सूजन भी विकसित हुई। धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता कम होती गई और आखिरकार किडनी ने काम करना बंद कर दिया।

दिलचस्प बात यह थी कि डॉक्टरों को किडनी पर एंटीबॉडी के उस तरह के हमले के स्पष्ट संकेत नहीं मिले, जिसकी आमतौर पर आशंका की जाती है। इसलिए किडनी के विफल होने का सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका।

क्या अब डायलिसिस से मिल सकती है मुक्ति?

यही इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। दुनिया के कई देशों में हजारों मरीज किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार करते हैं, जबकि उपलब्ध डोनर अंगों की संख्या जरूरत के मुकाबले काफी कम है।

अमेरिका में करीब एक लाख लोग किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं और हर साल लगभग 25 हजार ट्रांसप्लांट होने की बात बताई गई है। ब्रिटेन में भी हजारों मरीज किडनी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में हैं।

ऐसे में यदि जेनेटिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी भविष्य में सुरक्षित और लंबे समय तक इंसान के शरीर में काम करने लगे, तो यह अंगों की कमी की समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

मास जनरल ब्रिघम के सेंटर फॉर ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज से जुड़े डॉक्टर लियोनार्डो रिएला ने अंगों की कमी को गंभीर समस्या बताते हुए ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन को ऐसे मरीजों के लिए संभावित विकल्प के रूप में देखा है, जिनके पास तत्काल मानव डोनर उपलब्ध नहीं है।

अभी रास्ता लंबा है

हालांकि 271 दिनों तक सूअर की किडनी का काम करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसे अभी सामान्य इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता। यह क्षेत्र अभी भी शोध और क्लिनिकल परीक्षणों के दौर में है।

सबसे बड़ी चुनौतियों में इम्यून सिस्टम द्वारा अंग को अस्वीकार करना, रक्त वाहिकाओं को होने वाला नुकसान, संक्रमण का जोखिम और लंबे समय तक अंग के सुरक्षित तरीके से काम करने की क्षमता शामिल हैं।

टिम एंड्रयूज़ का मामला यह जरूर दिखाता है कि जेनेटिक रूप से संशोधित पशु अंग इंसानी शरीर में कुछ समय तक काम कर सकते हैं। लेकिन साथ ही यह भी सामने आता है कि इस तकनीक को पूरी तरह सुरक्षित और नियमित उपचार बनाने के लिए अभी कई सवालों के जवाब खोजने बाकी हैं।

मेडिकल साइंस के लिए क्यों अहम है यह मामला?

टिम एंड्रयूज़ के शरीर में 271 दिनों तक सूअर की किडनी का काम करना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह भविष्य की उस संभावित चिकित्सा व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसमें मानव डोनर का इंतजार करते मरीजों को अस्थायी तौर पर पशु अंग की मदद मिल सके।

अगर वैज्ञानिक इस तकनीक को और सुरक्षित बनाते हुए अंगों की कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने में सफल होते हैं, तो भविष्य में किडनी फेलियर से जूझ रहे मरीजों के लिए यह बड़ी उम्मीद बन सकती है।

फिलहाल एंड्रयूज़ को मानव डोनर की किडनी मिल चुकी है और वह काम कर रही है। लेकिन उनकी कहानी ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या आने वाले समय में इंसानी जिंदगी बचाने के लिए डोनर की किडनी का इंतजार खत्म हो जाएगा और जेनेटिक रूप से बदली गई सूअर की किडनी एक अस्थायी 'ब्रिज' बन सकेगी? यही सवाल अब ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन पर चल रही रिसर्च को और महत्वपूर्ण बनाता है।

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