सिर्फ 5-7 दिन का तेल बचा! महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल, बढ़ सकती है महंगाई… सऊदी की इस बड़ी घटना से मचा हड़कंप
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब की एक बेहद अहम तेल पाइपलाइन पर ड्रोन हमले ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। सऊदी अरब ने हमले के बाद अपनी रणनीतिक ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को एहतियातन बंद कर दिया है। यह पाइपलाइन देश के पूर्वी हिस्से में स्थित तेल उत्पादन क्षेत्रों को लाल सागर के तट पर मौजूद यानबू बंदरगाह से जोड़ती है।
इस पाइपलाइन का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के जरिए तेल की आवाजाही पहले से ही गंभीर दबाव में है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन एक वैकल्पिक रास्ते के तौर पर बेहद महत्वपूर्ण बन गई थी। हाल के महीनों में इसी रास्ते से करीब 40 से 50 लाख बैरल तेल प्रतिदिन तक भेजा जा रहा था। यह मात्रा वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग 4 से 5 फीसदी के बराबर है।
सबसे बड़ी चिंता अब यह है कि अगर पाइपलाइन की आवाजाही लंबे समय तक बहाल नहीं हुई तो यानबू में मौजूद तेल का स्टॉक सीमित अवधि के बाद खत्म हो सकता है। बाजार सूत्रों और रिपोर्टों के मुताबिक, मौजूदा भंडार से करीब 5 से 7 दिनों तक निर्यात जारी रखने की क्षमता हो सकती है। इसके बाद अगर वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनती है तो वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई का बड़ा झटका देखने को मिल सकता है।
ड्रोन हमले के बाद क्यों बंद करनी पड़ी पाइपलाइन?
सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को कई ड्रोन से निशाना बनाया गया। सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि हमले रियाद और मदीना क्षेत्रों में हुए और इसमें कुछ लोग घायल हुए तथा पाइपलाइन के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा। अधिकारियों ने कहा कि नुकसान का आकलन और मरम्मत का काम किया जा रहा है।
सऊदी अरब ने हमले के बाद तत्काल किसी सैन्य जवाबी कार्रवाई के बजाय पाइपलाइन को सुरक्षित करने और नुकसान का आकलन करने पर ध्यान दिया है। सऊदी पक्ष के अनुसार, इराकी प्रधानमंत्री की अपील के बाद फिलहाल जवाबी कार्रवाई नहीं करने का फैसला लिया गया है, जबकि साथ ही रियाद ने अपनी सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखा है।
रिपोर्टों के अनुसार हमले में इस्तेमाल किए गए ड्रोन इराक की दिशा से आए थे। इराक ने भी मामले की जांच शुरू की है। हालांकि हमले के पीछे किसी विशेष संगठन की अंतिम जिम्मेदारी को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इस पहलू पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
पाइपलाइन क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन करीब 1,200 किलोमीटर लंबी है। इसका सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा यह है कि इसके जरिए सऊदी अरब अपने पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को सीधे लाल सागर के तट तक पहुंचा सकता है।
इसका मतलब है कि तेल को फारस की खाड़ी से निकलकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने की जरूरत नहीं पड़ती। यही कारण है कि जब हॉर्मुज में तनाव बढ़ा और समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ा, तब इस पाइपलाइन का महत्व अचानक काफी बढ़ गया।
हाल के समय में सऊदी अरब ने इस वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल बढ़ाया था। रिपोर्टों के मुताबिक पाइपलाइन के जरिए रोजाना करीब 40 से 50 लाख बैरल कच्चा तेल यानबू तक पहुंच रहा था।
अब इसके बंद होने से सऊदी अरब के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पाइपलाइन की मरम्मत करनी होगी और दूसरी तरफ मौजूदा स्टॉक से अपने ग्राहकों को तेल की आपूर्ति बनाए रखनी होगी।
यानबू का स्टॉक कितने दिन चलेगा?
यही सवाल इस समय वैश्विक तेल बाजार के लिए सबसे अहम बना हुआ है।
रिपोर्टों के मुताबिक यानबू बंदरगाह पर मौजूद तेल भंडार से करीब 5 से 7 दिनों तक निर्यात जारी रखा जा सकता है। यानी अगर पाइपलाइन जल्द दोबारा चालू नहीं होती है तो कुछ ही दिनों बाद सऊदी अरब की निर्यात क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि सऊदी अरब के पास कुछ वैकल्पिक भंडारण और निर्यात विकल्प भी मौजूद हैं। मिस्र के ऐन सुखना और सिदी केरिर बंदरगाहों पर मौजूद स्टॉक से भी सीमित अवधि तक ग्राहकों को तेल की आपूर्ति की जा सकती है। लेकिन ये विकल्प लंबे समय तक सऊदी अरब की नियमित आपूर्ति का पूरा विकल्प नहीं बन सकते।
यही वजह है कि बाजार अब यह देख रहा है कि पाइपलाइन कितनी जल्दी दोबारा शुरू होती है।
मरम्मत में लग सकता है कई सप्ताह का समय
पाइपलाइन को हुए नुकसान की वास्तविक गंभीरता अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसी वजह से इसे दोबारा सामान्य क्षमता पर शुरू करने में कितना समय लगेगा, इसको लेकर भी अलग-अलग अनुमान सामने आ रहे हैं।
कुछ रिपोर्टों में मरम्मत में 5 से 6 सप्ताह तक का समय लगने की संभावना जताई गई है। हालांकि बाजार से जुड़े कुछ जानकारों का मानना है कि पूरी मरम्मत होने से पहले पाइपलाइन के कुछ हिस्सों को सीमित क्षमता के साथ दोबारा चालू किया जा सकता है।
अगर ऐसा संभव होता है तो सऊदी अरब पर तत्काल सप्लाई संकट का दबाव कुछ कम हो सकता है। लेकिन अगर पाइपलाइन लंबे समय तक पूरी तरह बंद रहती है तो वैश्विक तेल बाजार में कमी की आशंका बढ़ जाएगी।
पहले से दबाव में है वैश्विक तेल बाजार
यह संकट ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक तेल बाजार पहले ही सामान्य स्थिति में नहीं है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की आवाजाही में व्यवधान और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने सप्लाई को प्रभावित किया है।
इसी बीच सऊदी अरब का अपना तेल उत्पादन भी हाल के महीनों में काफी नीचे आया है। रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी में सऊदी अरब का उत्पादन करीब 1.09 करोड़ बैरल प्रतिदिन था, जो अगस्त में घटकर करीब 62 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह तीन दशक से अधिक समय का बेहद निचला स्तर बताया जा रहा है।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण निर्यात पाइपलाइन का बंद होना बाजार के लिए और बड़ा झटका बन सकता है।
4 फीसदी तेल सप्लाई पर असर की आशंका
ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए हाल में भेजी जा रही तेल की मात्रा वैश्विक सप्लाई के करीब 4 फीसदी के बराबर थी। इसलिए अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध कच्चे तेल की मात्रा में बड़ी कमी आ सकती है।
तेल बाजार में सप्लाई और मांग का संतुलन बहुत संवेदनशील होता है। यदि अचानक कई लाख बैरल प्रतिदिन की सप्लाई बाजार से हट जाए तो कीमतों में तेज प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।
यही कारण है कि पाइपलाइन बंद होने की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा चुकी हैं।
महंगा तेल भारत के लिए भी बड़ी चिंता
कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए भी चिंता का विषय है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर सीधे देश के आयात बिल पर पड़ सकता है।
अगर लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं तो इसका असर रुपये की विनिमय दर, व्यापार घाटे और महंगाई पर भी पड़ सकता है। पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ने पर परिवहन खर्च बढ़ता है और इसका असर सामान की ढुलाई से लेकर कई उद्योगों तक पहुंच सकता है।
एविएशन सेक्टर, केमिकल उद्योग, प्लास्टिक, पेंट, लॉजिस्टिक्स और कई अन्य क्षेत्रों की लागत भी ऊर्जा कीमतों से प्रभावित होती है।
यानी सऊदी अरब की पाइपलाइन में आई यह समस्या सिर्फ एक तेल कंपनी या एक देश की समस्या नहीं है। अगर सप्लाई में लंबे समय तक व्यवधान रहता है तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
अब निगाहें पाइपलाइन की बहाली पर
फिलहाल बाजार की सबसे बड़ी नजर इस बात पर है कि सऊदी अरब अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को कितनी जल्दी बहाल करता है। अगर कुछ दिनों के भीतर सीमित क्षमता में भी संचालन शुरू हो जाता है तो वैश्विक बाजार पर दबाव कुछ कम हो सकता है।
लेकिन अगर मरम्मत में कई सप्ताह लगते हैं और इस दौरान वैकल्पिक सप्लाई भी पर्याप्त नहीं होती है तो तेल बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यानबू के मौजूदा स्टॉक को लेकर है। यदि 5 से 7 दिनों के भीतर पाइपलाइन से तेल की आवाजाही बहाल नहीं होती है, तो सऊदी अरब को अपने निर्यात को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक बंदरगाहों और भंडार पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पश्चिम एशिया की किसी एक महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति लाइन में व्यवधान का असर हजारों किलोमीटर दूर बैठे देशों और करोड़ों उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। अब आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह संकट सीमित रहता है या वैश्विक तेल बाजार के लिए एक बड़े सप्लाई शॉक में बदल जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं