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100 डॉलर के बाद अब 70-75 डॉलर! तेल के खेल में आया बड़ा ट्विस्ट, भारत में सस्ता हो सकता है पेट्रोल-डीजल?



पश्चिम एशिया में जारी तनाव और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच वैश्विक कच्चे तेल बाजार में चिंता का माहौल बना हुआ है। पिछले कुछ समय में क्षेत्र में बढ़े तनाव का सीधा असर तेल की सप्लाई और कीमतों पर देखने को मिला था। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई थीं, जिससे दुनिया भर के तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ गई थी। हालांकि, अब बाजार में कुछ राहत के संकेत दिखाई देने लगे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई से कच्चे तेल का निर्यात बताया जा रहा है।

यूएई का कच्चे तेल का निर्यात अब युद्ध से पहले जनवरी-फरवरी 2026 के स्तर के काफी करीब पहुंच गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, यूएई का निर्यात प्री-वॉर स्तर से महज 0.02 फीसदी नीचे है। बाजार के लिए यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिल रहा है कि पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद क्षेत्र से तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप नहीं हुई है। यानी जिस तरह की व्यापक सप्लाई बाधित होने की आशंका जताई जा रही थी, फिलहाल तस्वीर उससे कुछ अलग नजर आ रही है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर दबाव के बावजूद यूएई ने निकाला वैकल्पिक रास्ता

पश्चिम एशिया से होने वाली तेल सप्लाई के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। इस रास्ते पर तनाव बढ़ने से दुनिया के सामने तेल की सप्लाई बाधित होने का खतरा पैदा हो जाता है। इसी वजह से जब क्षेत्र में तनाव बढ़ा तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला।

लेकिन यूएई ने अपनी तेल सप्लाई को जारी रखने के लिए वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया है। हबशान-फुजैराह पाइपलाइन के जरिए कच्चे तेल को फुजैराह पोर्ट तक पहुंचाया जा रहा है। इस व्यवस्था का फायदा यह है कि तेल की आवाजाही को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती।

इसके अलावा मंदूस अंडरग्राउंड स्टोरेज की करीब 4.2 करोड़ बैरल क्षमता भी यूएई की सप्लाई व्यवस्था को मजबूती देती है। इस तरह पाइपलाइन और स्टोरेज क्षमता मिलकर यूएई को तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी तेल निर्यात बनाए रखने में मदद कर रहे हैं।

यही वजह है कि ग्लोबल ऑयल मार्केट में अब सप्लाई को लेकर बनी कुछ चिंता कम होती दिखाई दे रही है। बाजार में यह उम्मीद बढ़ रही है कि अगर वैकल्पिक रास्तों से तेल की सप्लाई लगातार जारी रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों पर बना अतिरिक्त दबाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।

100 डॉलर के पार पहुंचा तेल, अब 70-75 डॉलर की उम्मीद

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई थी। कच्चे तेल की कीमतों में इतनी तेज वृद्धि का असर दुनिया के लगभग सभी बड़े आयातक देशों पर पड़ता है। तेल महंगा होने का मतलब है कि देशों को ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।

अब यूएई से निर्यात के मजबूत बने रहने और क्षेत्र में वैकल्पिक सप्लाई रूट के इस्तेमाल से बाजार में उस तेजी का दबाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है। यदि तेल की सप्लाई सामान्य बनी रहती है और ब्रेंट क्रूड आने वाले समय में 70-75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचता है, तो तेल आयात करने वाले देशों को बड़ी राहत मिल सकती है।

भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।

भारत के तेल आयात बिल में आ सकती है बड़ी कमी

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। तेल की कीमत बढ़ने पर देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जबकि कीमत कम होने पर आयात बिल में सीधी राहत मिलती है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर भारत को एक बैरल कच्चा तेल खरीदने के लिए 100 डॉलर खर्च करने पड़ रहे हों और अंतरराष्ट्रीय कीमत घटकर 75 डॉलर हो जाए, तो हर बैरल पर 25 डॉलर की संभावित बचत हो सकती है। भारत रोजाना बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए प्रति बैरल कीमत में छोटी-सी कमी भी लंबे समय में देश के कुल आयात खर्च पर बड़ा असर डाल सकती है।

तेल की कीमतों में गिरावट से भारत को विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर भी राहत मिल सकती है। कम कीमत पर तेल खरीदने का मतलब है कि समान मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के लिए पहले की तुलना में कम डॉलर की जरूरत होगी।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या पड़ेगा असर?

कच्चे तेल की कीमतों में कमी का असर पेट्रोल और डीजल की लागत पर भी पड़ सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत कम हो जाएंगी।

घरेलू ईंधन की कीमत तय होने में कई कारक भूमिका निभाते हैं। इनमें कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स तथा तेल कंपनियों की लागत शामिल हैं। इसलिए कच्चे तेल में गिरावट का पूरा फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लग सकता है।

फिर भी अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक 70-75 डॉलर के आसपास बना रहता है, तो ईंधन की लागत पर दबाव कम हो सकता है। इसका अप्रत्यक्ष फायदा ट्रांसपोर्ट और माल ढुलाई के क्षेत्र को भी मिल सकता है। डीजल की कीमतें और परिवहन लागत कम रहने से सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का खर्च नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

महंगाई पर भी पड़ सकता है सकारात्मक असर

तेल सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ट्रक, बस, मालवाहक वाहन और अन्य परिवहन साधनों की लागत में ईंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब ईंधन महंगा होता है तो माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और इसका असर कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।

इसके विपरीत अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं, तो परिवहन लागत में बढ़ोतरी का दबाव कम हो सकता है। इससे महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, खाद्य पदार्थों और दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर मौसम, उत्पादन, मांग और आपूर्ति जैसे कई अन्य कारकों का भी प्रभाव होता है।

चालू खाते के घाटे को भी मिल सकती है राहत

भारत के लिए सस्ता कच्चा तेल सिर्फ ईंधन की कीमतों का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध देश के व्यापार संतुलन और चालू खाते के घाटे यानी CAD से भी है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर भारत को तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे आयात बिल बढ़ता है और चालू खाते पर दबाव आ सकता है। वहीं, अगर तेल की कीमत कम होती है तो समान मात्रा में आयात के लिए कम विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।

इससे देश के आयात बिल पर दबाव घट सकता है और विदेशी मुद्रा की मांग भी कुछ कम हो सकती है। तेल की कीमतों में लंबे समय तक नरमी रुपये के लिए भी अपेक्षाकृत राहत देने वाली स्थिति बन सकती है, हालांकि रुपये की चाल पर वैश्विक बाजार, अमेरिकी डॉलर, पूंजी प्रवाह और अन्य आर्थिक कारकों का भी असर होता है।

भारत के लिए यूएई का वैकल्पिक तेल रूट क्यों अहम?

भारत जैसे बड़े तेल आयातक के लिए सिर्फ यह देखना महत्वपूर्ण नहीं है कि तेल कितना महंगा है, बल्कि यह भी जरूरी है कि तेल की सप्लाई कितनी सुरक्षित और लगातार बनी हुई है।

यूएई का फुजैराह रूट इस लिहाज से काफी अहम है। अगर तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते तेल की आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैकल्पिक पाइपलाइन और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर सप्लाई को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

वर्तमान स्थिति में यूएई की सप्लाई अपेक्षाकृत मजबूत बने रहना बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। दूसरी ओर, इराक और सऊदी अरब से होने वाले निर्यात में गिरावट तथा ईरान से तेल निर्यात में बड़ी बाधा ने सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाई है। ऐसे समय में यूएई का निर्यात प्री-वॉर स्तर के करीब बने रहना वैश्विक बाजार के लिए महत्वपूर्ण राहत है।

आगे क्या होगा, इस पर रहेगी नजर

फिलहाल तेल बाजार के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि पश्चिम एशिया में तनाव किस दिशा में जाता है और वैकल्पिक रास्तों से तेल की सप्लाई कितनी देर तक सामान्य बनी रहती है। अगर यूएई और दूसरे उत्पादक देश लगातार निर्यात बनाए रखने में सफल रहते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी धीरे-धीरे कम हो सकती है।

अगर ब्रेंट क्रूड 70-75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में लौटता है और वहां लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत के लिए यह कई मोर्चों पर राहत की खबर होगी। इससे तेल आयात बिल, विदेशी मुद्रा खर्च, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर ऊर्जा लागत का दबाव कम हो सकता है।

हालांकि, पश्चिम एशिया की स्थिति अभी भी संवेदनशील है। इसलिए आने वाले दिनों में तेल की कीमतों का रुख सिर्फ मांग और सप्लाई से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की निर्यात क्षमता से भी तय होगा। ऐसे में यूएई की मजबूत होती सप्लाई फिलहाल बाजार के लिए राहत का संकेत जरूर है, लेकिन पूरी तरह सामान्य स्थिति लौटने के लिए पश्चिम एशिया में तनाव का कम होना भी उतना ही जरूरी रहेगा।

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