न दर्द, न कोई चेतावनी… फिर भी दिल पर मंडरा रहा बड़ा खतरा! इन 3 नंबरों में छिपा है जिंदगी-मौत का राज
नई दिल्ली, 6 सितंबर 2026: दिल की बीमारी को लेकर अक्सर लोगों को लगता है कि खतरा तब शुरू होता है जब सीने में दर्द, सांस फूलना या धड़कन तेज होने जैसे लक्षण दिखाई दें। लेकिन हकीकत यह है कि दिल की सेहत को प्रभावित करने वाली कई समस्याएं शरीर में काफी पहले शुरू हो सकती हैं और शुरुआत में इनके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर के आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से इन तीनों को हृदय स्वास्थ्य से जुड़े अहम संकेतक मानते हैं। खास चिंता की बात यह है कि हाई ब्लड प्रेशर, खराब कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज कई लोगों में एक साथ दिखाई देते हैं। जब ये तीनों समस्याएं मौजूद हों तो रक्त वाहिकाओं और हृदय पर दबाव बढ़ सकता है।
खतरा इसलिए ज्यादा है क्योंकि शुरुआत में पता नहीं चलता
हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर 'साइलेंट' समस्या कहा जाता है। कई लोगों को इसका पता तब चलता है जब वे किसी दूसरी वजह से डॉक्टर के पास जाकर BP चेक कराते हैं। लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है और समय के साथ धमनियों, किडनी और आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है।
यही वजह है कि सिर्फ यह मान लेना कि 'मुझे कोई परेशानी महसूस नहीं हो रही' सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है। नियमित जांच से कई जोखिमों को काफी पहले पहचाना जा सकता है।
पहला नंबर- ब्लड प्रेशर
जब रक्त शरीर में प्रवाहित होता है तो वह धमनियों की दीवारों पर दबाव डालता है। इसी को ब्लड प्रेशर कहा जाता है। अगर यह दबाव लंबे समय तक ज्यादा बना रहे तो हृदय को लगातार ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है।
समय के साथ हाई ब्लड प्रेशर धमनियों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे उनमें प्लाक जमा होने की प्रक्रिया आसान हो सकती है और हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए BP की जांच केवल तब नहीं करनी चाहिए जब सिरदर्द या चक्कर जैसी परेशानी हो। कई लोगों में हाई BP बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी मौजूद रह सकता है।
दूसरा नंबर- कोलेस्ट्रॉल
कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए जरूरी पदार्थ है, लेकिन खून में कुछ प्रकार के लिपिड का असामान्य स्तर हृदय के लिए चिंता का कारण बन सकता है। खासतौर पर LDL यानी 'खराब' कोलेस्ट्रॉल का स्तर ज्यादा होने पर धमनियों की दीवारों में प्लाक जमा होने का खतरा बढ़ सकता है।
भारत में कोलेस्ट्रॉल को लेकर सामने आए एक बड़े अध्ययन ने भी चिंता बढ़ाई है। ICMR-INDIAB अध्ययन के मुताबिक 87.3 फीसदी भारतीय वयस्कों में किसी न किसी तरह का dyslipidemia पाया गया। इसका मतलब है कि लगभग 10 में से 9 वयस्कों में रक्त में वसा से जुड़े कम से कम एक मानक में असामान्यता देखी गई।
अध्ययन में सबसे आम समस्या कम HDL यानी 'अच्छे' कोलेस्ट्रॉल की रही। यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि कम उम्र के वयस्कों में भी इसका प्रसार देखा गया है।
तीसरा नंबर- ब्लड शुगर
डायबिटीज को अक्सर केवल 'शुगर की बीमारी' समझ लिया जाता है, लेकिन लंबे समय तक बढ़ी हुई ब्लड शुगर शरीर की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।
इससे हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि डायबिटीज वाले लोगों के लिए केवल ब्लड शुगर को नियंत्रित करना ही नहीं, बल्कि ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
ब्लड शुगर का आकलन अलग-अलग जांचों से किया जाता है। डॉक्टर व्यक्ति की स्थिति के अनुसार फास्टिंग शुगर, पोस्ट-मीम शुगर या HbA1c जैसी जांचों की सलाह दे सकते हैं।
जब तीनों साथ आ जाएं तो बढ़ सकता है खतरा
सबसे अहम बात यह है कि हाई BP, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज को हमेशा अलग-अलग समस्याओं की तरह नहीं देखना चाहिए।
हाई ब्लड प्रेशर धमनियों की दीवारों पर दबाव बढ़ाता है। बढ़ा हुआ LDL कोलेस्ट्रॉल धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया से जुड़ा है। वहीं लंबे समय तक बढ़ी हुई ब्लड शुगर रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।
जब ये जोखिम एक साथ मौजूद हों तो हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसी कारण डॉक्टर किसी व्यक्ति का इलाज तय करते समय केवल एक रिपोर्ट नहीं देखते, बल्कि पूरे cardiovascular risk profile को ध्यान में रखते हैं।
भारत में कोलेस्ट्रॉल को लेकर चिंता क्यों बढ़ी?
भारत में सामने आए ICMR-INDIAB अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि कोलेस्ट्रॉल की समस्या केवल मोटापे या डायबिटीज वाले लोगों तक सीमित नहीं है।
अध्ययन में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों में भी dyslipidemia पाया गया जो डायबिटीज, हाई BP और मोटापे से प्रभावित नहीं थे।
इसका मतलब यह है कि बाहर से स्वस्थ दिखाई देने वाला व्यक्ति भी अपने लिपिड प्रोफाइल में असामान्यता से अनजान हो सकता है।
यही वजह है कि केवल शरीर का वजन देखकर यह मान लेना कि दिल पूरी तरह स्वस्थ है, सही तरीका नहीं है।
क्या सिर्फ वजन देखकर दिल की सेहत का अंदाजा लगाया जा सकता है?
नहीं। वजन स्वास्थ्य का केवल एक हिस्सा है। किसी व्यक्ति का BP सामान्य हो सकता है लेकिन कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ हो सकता है। किसी व्यक्ति का वजन सामान्य हो सकता है लेकिन ब्लड शुगर या अन्य मेटाबॉलिक जोखिम मौजूद हो सकते हैं।
दिल की सेहत का आकलन करते समय उम्र, परिवार में हृदय रोग का इतिहास, धूम्रपान, खान-पान, शारीरिक गतिविधि, तनाव, ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल जैसे कई कारकों को देखा जाता है।
दिल को सुरक्षित रखने के लिए क्या करें?
हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए जीवनशैली की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। खाने में अत्यधिक नमक, ज्यादा तला हुआ भोजन और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को सीमित करना उपयोगी हो सकता है।
नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, धूम्रपान से दूरी और संतुलित आहार भी महत्वपूर्ण हैं। फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और फाइबर युक्त भोजन को आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है।
अगर डॉक्टर ने BP, डायबिटीज या कोलेस्ट्रॉल की दवा लिखी है तो उसे अपनी मर्जी से बंद नहीं करना चाहिए। दवा की मात्रा या समय में बदलाव भी डॉक्टर की सलाह से ही करना बेहतर है।
युवा उम्र में भी जांच क्यों जरूरी?
दिल की बीमारी को केवल बुजुर्गों से जोड़कर देखना अब पर्याप्त नहीं है। जीवनशैली में बदलाव, कम शारीरिक गतिविधि, असंतुलित खान-पान, तनाव और धूम्रपान जैसे कारक कम उम्र में भी हृदय संबंधी जोखिमों को प्रभावित कर सकते हैं।
ICMR-INDIAB के आंकड़ों में कम उम्र के वयस्कों में भी लिपिड संबंधी असामान्यताएं सामने आई हैं। इसलिए स्वास्थ्य जांच को उम्र के बहुत आगे बढ़ने तक टालना उचित नहीं माना जाता।
हालांकि हर व्यक्ति को एक जैसी जांच की जरूरत नहीं होती। अपनी उम्र, परिवार के इतिहास और व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर डॉक्टर से जांच की सही समय-सारणी पूछना बेहतर है।
कौन से संकेत नजरअंदाज न करें?
सीने में दर्द या दबाव, सांस लेने में परेशानी, अचानक अत्यधिक पसीना, बेहोशी, जबड़े या बांह में फैलता दर्द जैसे लक्षण गंभीर हो सकते हैं। ऐसे लक्षण अचानक दिखाई दें तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
यह भी याद रखना जरूरी है कि कई हृदय संबंधी जोखिम लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रह सकते हैं। इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच की अपनी अलग भूमिका है।
तीन नंबरों पर रखें नजर
दिल की सेहत को लेकर सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि BP, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर को नजरअंदाज न करें।
इन तीनों की रिपोर्ट सामान्य है या नहीं, यह केवल एक संख्या देखकर तय नहीं किया जाना चाहिए। उम्र, लिंग, स्वास्थ्य इतिहास और अन्य जोखिम कारकों के आधार पर अलग-अलग लोगों के लिए लक्ष्य अलग हो सकते हैं।
इसलिए किसी रिपोर्ट में कोई मानक सामान्य सीमा से बाहर आए तो खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से उसकी व्याख्या कराना जरूरी है।
आज के समय में हृदय स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि दिल में दर्द नहीं हो रहा। असली बचाव उन जोखिम कारकों को समय रहते पहचानने में है जो आने वाले वर्षों में हृदय और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर—ये तीनों आंकड़े शरीर के अंदर चल रही कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का संकेत दे सकते हैं। इन्हें समय पर जांचना और जरूरत पड़ने पर नियंत्रित करना हृदय स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
यह खबर सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी व्यक्ति की रिपोर्ट की सही व्याख्या उसके मेडिकल इतिहास और अन्य स्वास्थ्य कारकों के आधार पर डॉक्टर ही कर सकते हैं। दवा शुरू करने, बंद करने या बदलने से पहले चिकित्सकीय सलाह जरूर लें।

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