मुस्लिम महिलाओं की नॉर्मल डिलीवरी ज्यादा, हिंदू महिलाओं का C-Section क्यों? रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली वजह!
नई दिल्ली: भारत में गर्भावस्था और डिलीवरी को लेकर एक सवाल अक्सर चर्चा में रहता है—क्या मुस्लिम महिलाओं में नॉर्मल डिलीवरी का अनुपात हिंदू महिलाओं से ज्यादा है और क्या हिंदू महिलाओं में C-section यानी सिजेरियन डिलीवरी ज्यादा होती है? सोशल मीडिया और आम बातचीत में इस तरह के दावे कई बार सुनने को मिलते हैं। लेकिन जब इस सवाल को आंकड़ों और वैज्ञानिक अध्ययनों की कसौटी पर परखा जाता है तो तस्वीर थोड़ी अलग सामने आती है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS-5 (2019-21) के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, हिंदू महिलाओं में C-section डिलीवरी का अनुपात करीब 21.4% था, जबकि मुस्लिम महिलाओं में यह 19.6% था। यानी हिंदू महिलाओं में दर कुछ अधिक जरूर थी, लेकिन अंतर इतना बड़ा नहीं है कि इसे केवल धर्म की वजह से होने वाला अंतर माना जाए।
दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग राज्यों और इलाकों में तस्वीर काफी बदल जाती है। एक अध्ययन में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों का विश्लेषण करने पर यह पाया गया कि C-section की दर पर धर्म की तुलना में शहर या गांव में रहना, परिवार की आर्थिक स्थिति, महिला की शिक्षा, उम्र, जन्म का क्रम और अस्पताल का प्रकार जैसे कारकों का ज्यादा महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है।
तो आखिर सवाल यह है कि कुछ समुदायों में नॉर्मल डिलीवरी का अनुपात कम या ज्यादा क्यों दिखाई देता है? और भारत में C-section की बढ़ती संख्या के पीछे असली वजह क्या है?
सबसे पहले समझिए—C-section होता क्या है?
C-section या Caesarean Section एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें बच्चे को सामान्य प्रसव के बजाय ऑपरेशन के जरिए जन्म दिया जाता है। कई परिस्थितियों में यह प्रक्रिया मां और बच्चे दोनों की जान बचाने वाली हो सकती है।
उदाहरण के लिए, बच्चे की स्थिति ठीक न होना, प्रसव के दौरान गंभीर जटिलता, प्लेसेंटा से जुड़ी समस्या, भ्रूण को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलना, पहले कुछ विशेष प्रकार की सर्जरी हो चुकी होना या ऐसी अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियां जिनमें सामान्य प्रसव जोखिम भरा हो सकता है—इन मामलों में डॉक्टर C-section की सलाह दे सकते हैं।
इसलिए हर C-section को “अनावश्यक ऑपरेशन” कहना भी सही नहीं है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कहता है कि C-section तब किया जाना चाहिए जब चिकित्सकीय रूप से इसकी आवश्यकता हो। WHO यह भी स्पष्ट करता है कि किसी देश या अस्पताल के लिए कोई एक निश्चित C-section प्रतिशत लक्ष्य निर्धारित करना उचित नहीं है, क्योंकि अलग-अलग अस्पतालों में आने वाले मरीजों की स्थिति अलग हो सकती है।
NFHS-5 के आंकड़ों में क्या तस्वीर दिखाई देती है?
NFHS-5 के उपलब्ध विश्लेषण में हिंदू महिलाओं की C-section दर करीब 21.4% और मुस्लिम महिलाओं की करीब 19.6% रही। इसका मतलब यह है कि दोनों समुदायों में बड़ी संख्या में महिलाओं की डिलीवरी C-section के बजाय vaginal यानी सामान्य प्रसव से हुई।
इससे यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा कि मुस्लिम महिलाओं में “ज्यादातर” नॉर्मल डिलीवरी सिर्फ इसलिए होती है क्योंकि वे मुस्लिम हैं या हिंदू महिलाओं में C-section सिर्फ हिंदू होने के कारण ज्यादा होता है।
बल्कि आंकड़े यह संकेत देते हैं कि धर्म के साथ-साथ कई दूसरे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कारकों को देखना जरूरी है।
अस्पताल का प्रकार सबसे बड़ा फैक्टर क्यों बन सकता है?
C-section की दर को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में अस्पताल का प्रकार भी शामिल है।
एक हालिया भारतीय अध्ययन, जिसमें NFHS-4 और NFHS-5 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, ने पाया कि private और public health facilities के बीच C-section की संभावना में बड़ा अंतर हो सकता है। अध्ययन में institutional setting को C-section दर का सबसे महत्वपूर्ण प्रभावकारी कारक पाया गया।
इसका मतलब यह है कि एक ही धर्म की दो महिलाओं की डिलीवरी अलग-अलग अस्पतालों में होने पर परिणाम अलग हो सकता है।
एक महिला सरकारी अस्पताल में सामान्य प्रसव कर सकती है, जबकि दूसरी महिला निजी अस्पताल में चिकित्सकीय कारणों या अस्पताल की प्रैक्टिस के कारण C-section से गुजर सकती है।
इसलिए अगर किसी समुदाय की महिलाएं किसी विशेष प्रकार के अस्पताल, क्षेत्र या स्वास्थ्य व्यवस्था का अधिक इस्तेमाल करती हैं, तो उसके कारण भी C-section के आंकड़ों में अंतर दिखाई दे सकता है।
पैसे और आर्थिक स्थिति का भी है असर
रिसर्च में परिवार की आर्थिक स्थिति और C-section के बीच भी संबंध पाया गया है।
एक अध्ययन के अनुसार, ज्यादा संपन्न परिवारों की महिलाओं में C-section की संभावना कम आय वाले परिवारों की तुलना में अधिक देखी गई। इसी तरह महिला की शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ भी C-section की संभावना बढ़ने का संबंध पाया गया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि पैसा होने से हर महिला की C-section डिलीवरी होती है। बल्कि आर्थिक स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, अस्पताल के चुनाव, डॉक्टर तक पहुंच और प्रसव के दौरान उपलब्ध विकल्पों को प्रभावित कर सकती है।
पहली डिलीवरी और उम्र भी बदल देती है तस्वीर
महिला की उम्र और बच्चा कितने नंबर का है, ये भी महत्वपूर्ण फैक्टर हैं।
रिसर्च में पाया गया है कि पहली डिलीवरी में C-section की संभावना बाद की डिलीवरी की तुलना में ज्यादा हो सकती है। जैसे-जैसे birth order बढ़ता है, C-section की दर घटने का पैटर्न कई आंकड़ों में दिखाई देता है।
उम्र भी महत्वपूर्ण है। अधिक उम्र की गर्भवती महिलाओं में कुछ ऐसी चिकित्सकीय परिस्थितियां ज्यादा हो सकती हैं जिनमें C-section की आवश्यकता पड़ सकती है।
यानी यदि दो समुदायों में महिलाओं की शादी, पहली pregnancy, कुल बच्चों की संख्या या मातृत्व की उम्र का पैटर्न अलग है, तो C-section के आंकड़ों में अंतर आ सकता है।
शहर और गांव का भी बड़ा अंतर
भारत में urban और rural क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एक जैसी नहीं है। अध्ययन बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं में C-section की संभावना ग्रामीण महिलाओं की तुलना में अधिक हो सकती है।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—निजी अस्पतालों की उपलब्धता, विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंच, जांच सुविधाएं, अस्पतालों की संख्या और मरीजों का अस्पताल चुनने का तरीका।
इसलिए अगर किसी धार्मिक समुदाय की बड़ी आबादी ऐसे राज्यों या क्षेत्रों में रहती है जहां C-section की दर पहले से ज्यादा या कम है, तो उसका असर समुदाय के आंकड़ों पर भी दिखाई देगा।
दक्षिण भारत में तस्वीर और भी अलग
भारत के राज्यों के बीच C-section की दर में भारी अंतर है। एक अध्ययन में NFHS-5 के आधार पर दक्षिण भारत में C-section की दर करीब 46% पाई गई। इसी अध्ययन में मुस्लिम महिलाओं में C-section की संभावना कुछ कम पाई गई, लेकिन साथ ही उम्र, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, BMI, birth order और अस्पताल का प्रकार जैसे कई दूसरे कारक भी महत्वपूर्ण पाए गए। निजी अस्पतालों में C-section की संभावना सरकारी संस्थानों की तुलना में करीब तीन गुना बताई गई।
यह उदाहरण बताता है कि सिर्फ धर्म के आधार पर पूरे भारत की तस्वीर समझना गलत हो सकता है।
क्या मुस्लिम महिलाओं में सचमुच नॉर्मल डिलीवरी ज्यादा होती है?
कुछ राष्ट्रीय आंकड़ों में मुस्लिम महिलाओं की C-section दर हिंदू महिलाओं से थोड़ी कम दिखाई देती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि धर्म ही इसकी वजह है।
बल्कि संभव है कि इसके पीछे परिवार का आकार, birth order, ग्रामीण-शहरी स्थिति, आर्थिक स्थिति, अस्पताल का चुनाव, शिक्षा, मातृत्व की उम्र और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच जैसे कई कारक एक साथ काम करते हों।
दिलचस्प रूप से, एक पुराने NFHS-आधारित अध्ययन में कुछ परिस्थितियों में मुस्लिम महिलाओं की C-section संभावना हिंदू महिलाओं से अधिक भी पाई गई थी। यानी अलग-अलग समय, राज्य और जनसंख्या समूह में परिणाम बदल सकते हैं।
यही वजह है कि “मुस्लिम महिलाओं की नॉर्मल डिलीवरी होती है और हिंदू महिलाओं की C-section” जैसा सीधा निष्कर्ष वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
भारत में C-section बढ़ क्यों रहा है?
भारत में कुल C-section दर भी पिछले वर्षों में बढ़ी है। NFHS-4 यानी 2015-16 में देश में C-section का अनुपात करीब 17.2% था, जो NFHS-5 यानी 2019-21 में बढ़कर करीब 21.5% हो गया।
यानी C-section का बढ़ना सिर्फ हिंदू या मुस्लिम महिलाओं का मामला नहीं है। यह पूरे भारतीय स्वास्थ्य तंत्र से जुड़ा मुद्दा है।
इसके पीछे एक तरफ वास्तविक चिकित्सकीय जरूरतें हैं, तो दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की भूमिका, मरीजों की पसंद, प्रसव के समय सुविधा, डॉक्टर की उपलब्धता और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे कई कारक भी चर्चा में आते हैं।
हालिया शोध में भी यह पाया गया कि C-section की बढ़ती दर केवल मेडिकल परिस्थितियों से नहीं समझाई जा सकती और institutional factors की भूमिका महत्वपूर्ण है।
डॉक्टर की सलाह को धर्म से ऊपर रखना जरूरी
डिलीवरी का तरीका तय करते समय सबसे महत्वपूर्ण चीज मां और बच्चे की सुरक्षा होनी चाहिए। अगर डॉक्टर चिकित्सकीय कारण से C-section की सलाह देता है, तो केवल यह सोचकर ऑपरेशन से बचना कि “नॉर्मल डिलीवरी ही बेहतर है”, खतरनाक हो सकता है।
दूसरी तरफ, जहां सामान्य प्रसव सुरक्षित रूप से संभव है, वहां केवल सुविधा या गैर-चिकित्सकीय कारणों से C-section बढ़ना भी चिंता का विषय हो सकता है।
WHO भी यही बताता है कि C-section एक जरूरी और जीवनरक्षक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसे चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
असली कहानी धर्म की नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था की है
उपलब्ध आंकड़ों से इतना जरूर पता चलता है कि भारत में हिंदू और मुस्लिम महिलाओं के बीच C-section दर में कुछ अंतर है। NFHS-5 के विश्लेषण में यह दर हिंदू महिलाओं के लिए करीब 21.4% और मुस्लिम महिलाओं के लिए 19.6% रही।
लेकिन इस अंतर को सीधे धार्मिक पहचान का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
डिलीवरी का तरीका तय करने में महिला की उम्र, पहली या बाद की pregnancy, स्वास्थ्य स्थिति, गर्भावस्था की जटिलताएं, बच्चे की स्थिति, आर्थिक स्थिति, शहर या गांव में रहना, शिक्षा और सबसे महत्वपूर्ण—अस्पताल का प्रकार और चिकित्सा व्यवस्था—काफी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
इसलिए “किस धर्म की महिलाओं की डिलीवरी ज्यादा नॉर्मल होती है?” से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह होना चाहिए कि भारत में हर गर्भवती महिला को उसकी मेडिकल जरूरत के अनुसार सुरक्षित और उचित प्रसव सुविधा कैसे मिले।
आंकड़ों की सबसे बड़ी सीख यही है कि धर्म को कारण मानने से पहले सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कारकों को समझना जरूरी है।

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