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अस्पताल में इलाज करा रहे हैं तो सावधान! ₹11 के सामान का ₹325 MRP देखकर मचा हड़कंप, अब सरकार ने शुरू की जांच



अस्पताल में इलाज के दौरान मरीज और उसके परिवार के सामने सबसे बड़ी चिंता अक्सर बीमारी के साथ बढ़ता हुआ इलाज का खर्च होता है। दवाइयों, जांच, डॉक्टर की फीस और कमरे के शुल्क के अलावा अस्पताल के बिल में कई ऐसे मेडिकल कंज्यूमेबल्स और सर्जिकल सामान भी शामिल होते हैं, जिनकी वास्तविक खरीद कीमत मरीजों को पता नहीं होती। अब इन्हीं मेडिकल उपकरणों और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली जरूरी सामग्री की कीमतों को लेकर केंद्र स्तर पर समीक्षा की प्रक्रिया शुरू होने की बात सामने आई है।

महाराष्ट्र FDA की ओर से किए गए एक सर्वे में कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और पैकेट पर दर्ज MRP के बीच काफी बड़ा अंतर सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, एक IV सेट करीब ₹11 में खरीदा गया, जबकि उसका MRP ₹325 तक दर्ज था। इस अंतर ने मेडिकल सामान की कीमतों और अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

₹11 का IV सेट और ₹325 का MRP

महाराष्ट्र FDA के सर्वे में सामने आए आंकड़ों ने मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर ध्यान खींचा है। रिपोर्ट में एक IV infusion set की खरीद कीमत करीब ₹11 बताई गई, जबकि उस पर ₹325 का MRP दर्ज था।

यहां यह समझना जरूरी है कि किसी उत्पाद की खरीद कीमत और MRP के बीच अंतर होने का मतलब यह नहीं है कि हर अस्पताल मरीज से वही MRP वसूल रहा है। अस्पतालों की खरीद प्रक्रिया, सप्लायर, स्टोरेज, वितरण और बिलिंग व्यवस्था अलग-अलग हो सकती है।

फिर भी इतनी बड़ी कीमत का अंतर इस सवाल को जरूर जन्म देता है कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी मेडिकल सामान की कीमत किस आधार पर तय होती है और मरीजों को इसकी जानकारी कितनी स्पष्ट रूप से मिलती है।

सिरिंज और कैथेटर की कीमत में भी अंतर

सर्वे में केवल IV सेट ही नहीं बल्कि दूसरे मेडिकल सामानों में भी कीमत का अंतर सामने आने की बात कही गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, एक 10 ml सिरिंज की खरीद कीमत करीब ₹6.75 थी, जबकि उसका MRP ₹57.20 दर्ज था। इसी तरह एक कैथेटर की खरीद कीमत करीब ₹29.41 बताई गई, जबकि उसका MRP ₹310 था।

कुछ अन्य मेडिकल सामानों में भी खरीद कीमत और MRP के बीच अंतर पाया गया। इनमें नेबुलाइजर से संबंधित सामान और ऑक्सीजन मास्क जैसे उत्पाद भी शामिल बताए गए हैं।

इन आंकड़ों ने यह सवाल खड़ा किया है कि मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में पारदर्शिता किस तरह बढ़ाई जा सकती है और अस्पताल के अंतिम बिल में मरीज से लिए जाने वाले शुल्क का आधार क्या होना चाहिए।

केंद्र स्तर पर शुरू हुई समीक्षा

महाराष्ट्र FDA के सर्वे के बाद मामला केंद्र स्तर पर भी चर्चा में आया है। मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर संबंधित विभागों और नियामक संस्थाओं के स्तर पर समीक्षा की प्रक्रिया की बात सामने आई है।

इस प्रक्रिया में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि अस्पताल मेडिकल सामान की खरीद किस कीमत पर करते हैं, मरीज के बिल में उसकी कीमत किस तरह शामिल होती है और अलग-अलग अस्पतालों में कीमतों में कितना अंतर पाया जाता है।

सरकार के सामने मुख्य सवाल यह है कि मरीजों को राहत देने के लिए कीमतों में पारदर्शिता कैसे लाई जाए, साथ ही अस्पतालों की वास्तविक लागत और गुणवत्तापूर्ण इलाज की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।

अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था भी जांच के दायरे में

मेडिकल सामान की कीमत का सीधा संबंध अस्पताल की बिलिंग व्यवस्था से भी जुड़ा है। अस्पताल में मरीज को कई तरह के कंज्यूमेबल्स की जरूरत पड़ती है।

इनमें सिरिंज, IV सेट, कैथेटर, ग्लव्स, ऑक्सीजन से संबंधित सामग्री और दूसरी डिस्पोजेबल वस्तुएं शामिल हो सकती हैं।

कई बार मरीज के परिवार को इन सभी सामानों की बाजार कीमत के बारे में जानकारी नहीं होती। इलाज की स्थिति में परिवार के पास हर वस्तु की कीमत अलग-अलग जांचने का समय भी नहीं होता।

ऐसे में बिल में इस्तेमाल किए गए मेडिकल सामान की मात्रा और उसकी कीमत स्पष्ट रूप से दर्ज होना मरीज के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

दवाओं और मेडिकल उपकरणों में है अंतर

जरूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत में पहले से नियामकीय व्यवस्था मौजूद है। कुछ आवश्यक दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने के लिए अलग व्यवस्था लागू होती है।

लेकिन अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले सभी मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर उसी तरह की मूल्य सीमा लागू नहीं होती। यही वजह है कि मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर अलग से नियामकीय व्यवस्था की जरूरत पर चर्चा हो रही है।

हालांकि, हर मेडिकल उपकरण को एक ही नियम के तहत रखना भी आसान नहीं होगा। अलग-अलग उत्पादों की गुणवत्ता, तकनीक, उत्पादन लागत और उपयोग अलग-अलग होते हैं।

मरीजों पर क्या पड़ेगा असर?

अगर भविष्य में सरकार मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों के लिए स्पष्ट नियम या निगरानी व्यवस्था लागू करती है, तो इसका सीधा असर अस्पताल के बिल की पारदर्शिता पर पड़ सकता है।

मरीज और उसके परिवार को यह समझने में आसानी हो सकती है कि इलाज के दौरान कौन-सा मेडिकल सामान इस्तेमाल हुआ और उसके लिए कितना शुल्क लिया गया।

इससे अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था में भी अधिक स्पष्टता आने की संभावना हो सकती है। हालांकि, अभी किसी निश्चित मूल्य सीमा या अंतिम नियम की घोषणा नहीं हुई है।

अस्पतालों के सामने भी कई चुनौतियां

मेडिकल सामान की कीमत तय करना केवल खरीद मूल्य और MRP की तुलना तक सीमित नहीं है। अस्पतालों को कई अन्य खर्च भी उठाने पड़ते हैं।

सामान को स्टोर करने, सप्लाई करने, इस्तेमाल के लिए तैयार रखने और अस्पताल की व्यवस्था में उपलब्ध कराने पर भी खर्च होता है। इसके अलावा कई अस्पतालों में आपातकालीन सेवाओं और चौबीसों घंटे उपलब्ध सुविधाओं की लागत भी होती है।

इसलिए अगर भविष्य में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यवस्था बनाई जाती है, तो उसमें अस्पतालों की वास्तविक लागत को भी ध्यान में रखना होगा।

मरीजों के लिए क्यों अहम है यह मामला?

अस्पताल में भर्ती मरीज या उसके परिवार के लिए इलाज का बिल पहले से ही चिंता का विषय होता है। ऐसे में अगर मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध हो, तो परिवार अपने बिल को बेहतर तरीके से समझ सकता है।

मेडिकल सामान की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ने से मरीजों को यह जानने में मदद मिल सकती है कि उनके इलाज के दौरान किस वस्तु के लिए कितना शुल्क लिया गया।

फिलहाल मामला समीक्षा और परामर्श के स्तर पर है। सरकार की ओर से अभी किसी निश्चित मूल्य सीमा या अंतिम नियम की घोषणा नहीं हुई है।

आगे क्या हो सकता है?

अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक संस्थाएं मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर किस तरह की व्यवस्था तैयार करती हैं।

संभावित रूप से कीमतों की निगरानी, अस्पताल बिल में अधिक पारदर्शिता, मेडिकल सामान की खरीद और बिक्री के बीच अंतर की समीक्षा तथा जरूरी कंज्यूमेबल्स के लिए अलग नियामकीय व्यवस्था जैसे मुद्दों पर विचार किया जा सकता है।

फिलहाल महाराष्ट्र FDA के सर्वे में सामने आए आंकड़ों ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की कीमतों पर एक बड़ी बहस जरूर शुरू कर दी है। ₹11 के IV सेट का ₹325 MRP वाला मामला इसी बहस का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है।

हालांकि, अंतिम नियम आने तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। आने वाले समय में सरकार की समीक्षा और संबंधित पक्षों के साथ बातचीत से ही स्पष्ट होगा कि मरीजों को मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में पारदर्शिता और राहत देने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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