मरीजों को बड़ी राहत: मेडिकल उपकरणों की मनमानी कीमतों पर केंद्र का बड़ा प्रहार, दाम नियंत्रित करने के प्रयास शुरू
अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों के लिए डॉक्टर की फीस, दवाइयों और जांच के खर्च के अलावा मेडिकल उपकरणों और इस्तेमाल होने वाली दूसरी सामग्री का बिल भी बड़ा खर्च बन जाता है। कई बार मरीज और उसके परिजनों को यह जानकारी नहीं होती कि अस्पताल में इस्तेमाल किए गए सिरिंज, ग्लव्स, IV सेट, कैथेटर और अन्य मेडिकल कंज्यूमेबल्स की वास्तविक कीमत कितनी है। अब इन सामानों की कीमतों में पारदर्शिता और उन्हें तर्कसंगत बनाने को लेकर केंद्र सरकार ने प्रक्रिया शुरू कर दी है।
केंद्र सरकार की ओर से मेडिकल उपकरणों की कीमतों को लेकर मेडिकल सेक्टर और निजी अस्पतालों के साथ बातचीत शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरणों और कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत, MRP और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच इतना अंतर क्यों होता है और इसे कम करने के लिए किस तरह की व्यवस्था बनाई जा सकती है।
महाराष्ट्र FDA की जांच के बाद बढ़ी हलचल
मेडिकल उपकरणों की कीमतों का मुद्दा उस समय ज्यादा चर्चा में आया जब महाराष्ट्र ड्रग एंड फूड एडमिनिस्ट्रेशन यानी FDA की जांच में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल सामानों की खरीद कीमत और MRP के बीच काफी बड़ा अंतर सामने आया।
जांच के दौरान कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में कई गुना अंतर पाया गया। एक IV सेट की खरीद कीमत करीब ₹11 बताई गई, जबकि उसका MRP ₹325 तक दर्ज था। इसी तरह सिरिंज, कैथेटर और अन्य मेडिकल सामानों की कीमतों में भी बड़ा अंतर सामने आने की बात कही गई।
इन आंकड़ों ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की कीमतों और मरीजों की बिलिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि, किसी उत्पाद की खरीद कीमत और MRP के बीच अंतर होने का मतलब यह नहीं है कि हर अस्पताल मरीज से उसी अनुपात में अधिक पैसा वसूल रहा है। अस्पतालों की खरीद, सप्लाई, स्टोरेज और बिलिंग व्यवस्था अलग-अलग हो सकती है। इसके बावजूद कीमतों में बहुत बड़ा अंतर होने से नियमन और पारदर्शिता की जरूरत पर बहस तेज हुई है।
केंद्र ने शुरू की अस्पतालों से बातचीत
महाराष्ट्र FDA की जांच के बाद केंद्र सरकार के स्तर पर इस विषय को गंभीरता से देखने की प्रक्रिया शुरू हुई है। जानकारी के मुताबिक, मेडिकल उपकरणों की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के मुद्दे पर मेडिकल सेक्टर और निजी अस्पतालों के प्रतिनिधियों से बातचीत की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और फार्मास्यूटिकल्स विभाग के सचिव के बीच बैठक के बाद मेडिकल सेक्टर तथा अस्पतालों के साथ बैठकें और संवाद करने के निर्देश दिए गए हैं।
इस बातचीत का उद्देश्य केवल कीमत कम करना नहीं है, बल्कि यह समझना भी है कि अस्पतालों में मेडिकल उपकरणों की खरीद और मरीजों से उसकी वसूली किस तरीके से होती है।
सरकार यह भी देखना चाहती है कि अगर कीमतों को लेकर कोई नियामकीय व्यवस्था तैयार की जाती है तो उसमें अस्पतालों की वास्तविक लागत, उत्पाद की गुणवत्ता, निर्माता की लागत और मरीज के हित के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
संसद की समिति भी उठा चुकी है सवाल
मेडिकल इलाज की बढ़ती लागत का मुद्दा इससे पहले संसदीय स्तर पर भी सामने आ चुका है। स्वास्थ्य संबंधी संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों में इलाज के लिए ली जाने वाली रकम को लेकर भी चिंता जताई थी और शुल्क को तर्कसंगत बनाने की जरूरत पर सिफारिशें की थीं।
निजी अस्पतालों में इलाज की लागत कई चीजों पर निर्भर करती है। इसमें अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर, डॉक्टरों और कर्मचारियों की लागत, दवाइयां, जांच, कमरे का शुल्क और मेडिकल कंज्यूमेबल्स शामिल होते हैं।
लेकिन मरीजों के लिए सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है जब बिल में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमत और उसकी बाजार कीमत के बीच अंतर को समझना मुश्किल हो जाता है।
दवाओं पर पहले से है कीमत नियंत्रण
दवाओं की कीमतों को लेकर भारत में पहले से नियामकीय व्यवस्था मौजूद है। Drug Price Control Order यानी DPCO के माध्यम से आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रावधान है।
National List of Essential Medicines में शामिल कई दवाएं निर्धारित श्रेणी में आती हैं और उन पर कीमत संबंधी नियंत्रण लागू होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जरूरी दवाएं मरीजों के लिए अत्यधिक महंगी न हो जाएं।
लेकिन सभी दवाएं एक जैसी श्रेणी में नहीं आतीं। कुछ नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमत तय करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता होती है।
यही अंतर मेडिकल उपकरणों के मामले में भी दिखाई देता है। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली कई जरूरी वस्तुओं के लिए दवाओं जैसी व्यापक मूल्य नियंत्रण व्यवस्था नहीं है।
सिरिंज और ग्लव्स जैसे सामान भी चर्चा में
मेडिकल उपकरणों और कंज्यूमेबल्स में सिरिंज, ग्लव्स, IV सेट, कैथेटर, ऑक्सीजन से जुड़ी सामग्री और दूसरी डिस्पोजेबल वस्तुएं शामिल हो सकती हैं।
इनमें से कई सामान मरीज के इलाज के दौरान लगातार इस्तेमाल होते हैं। एक मरीज के अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान इन वस्तुओं की संख्या काफी बढ़ सकती है। ऐसे में अगर किसी एक वस्तु की कीमत बाजार कीमत से काफी अधिक हो, तो लंबे इलाज के दौरान इसका असर कुल बिल पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि मेडिकल सेक्टर में इन वस्तुओं की कीमतों को लेकर पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है।
खरीद कीमत और मरीज के बिल में कितना अंतर?
मेडिकल सामान की कीमत को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि कोई अस्पताल जिस कीमत पर सामान खरीदता है, वह मरीज के बिल में कितनी राशि पर दिखाई देता है।
अस्पतालों का कहना हो सकता है कि खरीद कीमत के अलावा स्टोरेज, सप्लाई, स्टाफ, प्रशासनिक खर्च और अन्य परिचालन लागत भी होती है। वहीं मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह जानना जरूरी है कि उनसे किसी मेडिकल सामान के लिए कितना शुल्क लिया जा रहा है और उसका आधार क्या है।
अगर खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत में बहुत ज्यादा अंतर हो, तो उस अंतर को लेकर स्पष्टता और पारदर्शिता जरूरी हो जाती है।
10 से 20 गुना तक कीमत अंतर का दावा
मेडिकल कंज्यूमेबल्स को लेकर सामने आए दावों में यह भी कहा गया है कि कुछ समान वस्तुओं की कीमत बाजार में उपलब्ध MRP की तुलना में कई गुना अधिक हो सकती है। कुछ मामलों में 10 से 20 गुना तक के अंतर का दावा किया गया है।
ऐसे दावों की स्थिति में यह जरूरी है कि अलग-अलग उत्पादों, ब्रांड, गुणवत्ता, पैकेजिंग और खरीद चैनल के आधार पर आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से जांच की जाए।
क्योंकि एक ही नाम से दिखने वाले दो मेडिकल उत्पादों की गुणवत्ता, निर्माता, प्रमाणन और तकनीकी विशेषताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए केवल कीमत की तुलना से किसी उत्पाद की वास्तविक लागत का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
सरकार के सामने क्या चुनौती है?
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती मरीजों को राहत देने और अस्पतालों की वास्तविक लागत के बीच संतुलन बनाने की है।
अगर मेडिकल उपकरणों पर बहुत सख्त कीमत सीमा लागू की जाती है तो अस्पतालों और निर्माताओं की लागत को भी ध्यान में रखना होगा। दूसरी तरफ, अगर कीमतों की निगरानी पर्याप्त नहीं होती है तो मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की संभावना बनी रह सकती है।
इसलिए सरकार के सामने केवल MRP तय करने का सवाल नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने की चुनौती है जिसमें कीमत, गुणवत्ता और मरीज के हित तीनों का ध्यान रखा जा सके।
मरीजों को क्या फायदा हो सकता है?
अगर सरकार भविष्य में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था बनाती है, तो मरीजों को अस्पताल के बिल को समझने में मदद मिल सकती है।
बिल में इस्तेमाल किए गए मेडिकल सामान का नाम, संख्या और शुल्क अधिक स्पष्ट तरीके से दर्ज किया जा सकता है। इससे मरीज के परिवार को यह पता चल सकेगा कि इलाज के दौरान कौन-कौन सी वस्तुएं इस्तेमाल हुईं और उनके लिए कितना भुगतान किया गया।
इसके अलावा कीमतों की निगरानी की व्यवस्था बनने से अस्पतालों और मेडिकल सप्लायरों के बीच होने वाली खरीद प्रक्रिया में भी अधिक पारदर्शिता आ सकती है।
अस्पतालों का मुनाफा बनाम मरीज का हित
मेडिकल सेक्टर में यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अस्पतालों को अपने संचालन के लिए उचित मुनाफा और खर्च निकालने की जरूरत होती है। अस्पताल चलाने में बड़ी लागत आती है और मरीजों को आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए संसाधनों की जरूरत होती है।
लेकिन मरीजों के हित से जुड़ा सवाल तब उठता है जब किसी मेडिकल सामान की कीमत और उसकी वास्तविक लागत में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है।
इसीलिए विशेषज्ञों की ओर से यह बात सामने रखी जा रही है कि अस्पतालों को उचित मुनाफा कमाने का अधिकार है, लेकिन मरीजों से वसूली जाने वाली कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।
अभी अंतिम नियम का इंतजार
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से मेडिकल उपकरणों और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की कीमतों पर किसी नई सार्वभौमिक मूल्य सीमा की घोषणा नहीं की गई है। अभी बातचीत और समीक्षा का चरण चल रहा है।
आने वाले समय में मेडिकल सेक्टर, निजी अस्पतालों, नियामक संस्थाओं और सरकार के बीच होने वाली चर्चा से यह स्पष्ट हो सकता है कि मेडिकल उपकरणों की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के लिए किस तरह का ढांचा तैयार किया जाता है।
महाराष्ट्र FDA की जांच से सामने आए आंकड़ों ने इस मुद्दे को जरूर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि केंद्र सरकार मरीजों के हित में कीमतों की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर क्या कदम उठाती है।
मरीजों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अस्पताल का बिल लेते समय मेडिकल कंज्यूमेबल्स की मात्रा, यूनिट कीमत और कुल शुल्क की जानकारी जरूर देखें। किसी भी बड़े अंतर की स्थिति में अस्पताल से बिल की स्पष्ट जानकारी और संबंधित शुल्क का विवरण मांगा जा सकता है।

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