दिन में किताबों में डूबा रहता था, रात होते ही बन जाता था कातिल… 22 हत्याओं की वजह जान पुलिस भी रह गई दंग
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उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले का फुरसतगंज आज भले ही एक सामान्य कस्बे की तरह दिखाई देता हो, लेकिन करीब दो दशक पहले यहां की रातें खौफ के साए में गुजरती थीं। शाम ढलते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। खेतों से लौटने वाले लोग अकेले रास्ता तय करने से बचते थे और घरों के बाहर चारपाई डालकर सोना भी लोगों के लिए डर की वजह बन गया था।
उस डर की वजह थी एक के बाद एक हो रही रहस्यमयी हत्याएं।
करीब वर्ष 2002 से इस इलाके में एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने पुलिस से लेकर आम लोगों तक को हैरान कर दिया। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि हर हत्या लगभग एक ही अंदाज में होती थी। शिकार कोई महिला या बच्चा नहीं, बल्कि 45 साल से अधिक उम्र का पुरुष होता था। मृतक के सीने में सिर्फ एक गोली मारी जाती थी। जेब की तलाशी लेने पर पैसे और दूसरी चीजें वैसे ही मिलती थीं।
न लूट का मकसद दिखाई देता था, न निजी दुश्मनी का कोई साफ सुराग।
और सबसे बड़ा सवाल था—आखिर इन लोगों को कौन और क्यों मार रहा था?
एक हत्या के बाद पूरे इलाके में सन्नाटा
फुरसतगंज और आसपास के इलाकों में जब पहली कुछ हत्याएं हुईं तो लोगों ने इसे अलग-अलग घटनाएं समझा। पुलिस ने भी शुरुआती तौर पर सामान्य आपराधिक घटना के नजरिए से जांच शुरू की।
लेकिन कुछ समय बाद जब दूसरी और फिर तीसरी वारदात हुई, तो पुलिस को एक अजीब पैटर्न दिखाई देने लगा।
हत्याओं के बीच लगभग एक महीने का अंतर रहता था। लोग एक वारदात को भूलने की कोशिश करते, तभी किसी दूसरे व्यक्ति की लाश मिलने की खबर सामने आ जाती।
जिन लोगों को निशाना बनाया गया, उनमें से कई लोग रात में अपने घर के बाहर बरामदे में सो रहे थे। कुछ ऐसे भी थे जो खेतों में काम करते थे और रात में अकेले पगडंडी से घर लौट रहे थे।
यानी कातिल ऐसे लोगों को चुन रहा था जो रात में अपेक्षाकृत असुरक्षित स्थिति में होते थे।
गोली चली, लेकिन आवाज किसी ने नहीं सुनी
इस मामले का सबसे रहस्यमयी पहलू हत्या का तरीका था।
हर बार पीड़ित के सीने में सिर्फ एक गोली मारी जाती थी। शव पर संघर्ष के निशान नहीं मिलते थे। ऐसा लगता था कि पीड़ित को हमलावर से किसी तरह का खतरा महसूस ही नहीं हुआ।
न तो हाथापाई हुई और न ही बचने की कोशिश के स्पष्ट निशान दिखाई दिए।
पुलिस के सामने एक और बड़ी पहेली थी—अगर तमंचे या बंदूक से गोली चलाई गई, तो आसपास के लोगों ने आवाज क्यों नहीं सुनी?
रात के सन्नाटे में गोली की आवाज दूर तक जा सकती थी। लेकिन इन घटनाओं में आसपास सो रहे लोगों को अक्सर गोली चलने का पता तक नहीं चलता था।
जांच आगे बढ़ी तो गोलियों को लेकर भी एक अहम सुराग मिला। पुलिस के मुताबिक, घटनास्थल से मिले कारतूस भरुआ यानी देसी तरीके से तैयार किए गए कारतूस थे।
अब जांचकर्ताओं को यकीन होने लगा कि हत्याओं के पीछे कोई ऐसा व्यक्ति है, जो इलाके से परिचित है और बेहद सावधानी से वारदात करता है।
पुलिस चौकी बनी, लेकिन हत्यारा नहीं रुका
लगातार हो रही हत्याओं से इलाके में दहशत फैलने लगी। पुलिस ने फुरसतगंज में आनन-फानन में चौकी स्थापित की और निगरानी बढ़ा दी।
इसके बावजूद वारदातें रुक नहीं रही थीं।
यह पुलिस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति थी। एक तरफ लोगों में डर बढ़ रहा था, दूसरी तरफ हत्यारे के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल रही थी।
किसी ने उसे घटना को अंजाम देते हुए नहीं देखा था। कोई प्रत्यक्षदर्शी सामने नहीं आया। मृतकों के पास से लूट का कोई कारण नहीं मिला और उनके साथ किसी तरह की पुरानी दुश्मनी की कड़ी भी स्पष्ट नहीं थी।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति अंधेरे में आता है, अपने शिकार को चुनता है, सीने में एक गोली मारता है और फिर बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाता है।
मामला लखनऊ जोन तक पहुंचा
लगातार हो रही हत्याओं ने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। तत्कालीन लखनऊ जोन के आईजी सुलखान सिंह ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच को आगे बढ़ाने के लिए विशेष टीम गठित की गई।
पुलिसकर्मियों को सादा कपड़ों में इलाके में तैनात किया गया।
अब पुलिस की नजर उन लोगों पर थी जो शाम ढलने के बाद गांव की सड़कों, खेतों और पगडंडियों पर घूमते नजर आते थे। रात में अकेले चलने वाले संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी जाने लगी।
पुलिस यह समझने की कोशिश कर रही थी कि कातिल अपने शिकार को कैसे चुनता है।
क्या वह पहले से लोगों की रेकी करता था?
क्या वह अपने शिकार को जानता था?
क्या वह किसी खास उम्र के लोगों को जानबूझकर निशाना बनाता था?
या फिर इन सभी हत्याओं के पीछे कोई ऐसी वजह थी, जिसका पुलिस को अभी तक अंदाजा ही नहीं था?
दो साल तक पुलिस के हाथ खाली रहे
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि यह सिलसिला करीब दो साल तक चलता रहा और पुलिस हत्यारे तक नहीं पहुंच सकी।
अप्रैल 2002 में शुरू हुई हत्याओं का सिलसिला नवंबर 2004 तक चलता रहा। हर नई वारदात पुलिस की जांच को फिर शून्य पर ले आती।
लेकिन फिर एक ऐसा नाम पुलिस की निगाह में आया, जिसने पूरी कहानी का रुख बदल दिया।
नाम था सदाशिव साहू।
57 साल का दुकानदार कैसे बना शक के घेरे में?
सदाशिव साहू की उम्र उस समय करीब 57 वर्ष थी और फुरसतगंज में उसकी कपड़े की दुकान थी।
शुरुआत में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक सामान्य कारोबारी नजर आने वाला यह व्यक्ति इलाके में हो रही रहस्यमयी हत्याओं से जुड़ा हो सकता है।
लेकिन पुलिस की निगरानी के दौरान वह बार-बार जांच के दायरे में आया। पुलिस ने उससे पूछताछ शुरू की और दिसंबर 2004 में उसे गिरफ्तार कर लिया।
पूछताछ के दौरान पुलिस को जो जानकारी मिली, उसने जांचकर्ताओं को भी हैरान कर दिया।
पुलिस के मुताबिक, सदाशिव साहू ने 22 लोगों की हत्या करने की बात कबूल की थी। थाने में उसने कथित तौर पर करीब आठ पन्नों का कबूलनामा दिया।
हालांकि, किसी भी कबूलनामे को अपराध साबित करने के लिए अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में ही देखा जाता है।
‘अदृश्य शक्ति’ का दावा
पूछताछ में पुलिस के सामने साहू ने कथित तौर पर एक बेहद विचित्र वजह बताई।
उसके मुताबिक, उसे लगता था कि कोई अदृश्य शक्ति उसे लोगों की हत्या करने के लिए उकसाती थी।
पुलिस के अनुसार उसने बताया कि हत्या करने के बाद उसे एक अजीब तरह की शांति महसूस होती थी और वह सामान्य तरीके से सो पाता था।
यह बयान जांचकर्ताओं के लिए एक और रहस्य था। आखिर एक व्यक्ति को लगातार हत्याएं करने के लिए क्या प्रेरित कर रहा था?
क्या यह मानसिक विक्षोभ था? किसी तरह की सनक? या फिर कोई गहरी व्यक्तिगत वजह?
इन सवालों ने मामले को सामान्य अपराध से कहीं ज्यादा पेचीदा बना दिया।
शिकार के बेहद करीब जाकर मारता था गोली
पुलिस के मुताबिक, साहू अपने शिकार के पास पहले सामान्य तरीके से पहुंचता था। वह उनसे बातचीत करता और ऐसा व्यवहार करता जैसे वह कोई परिचित या सामान्य राहगीर हो।
इसके बाद वह बेहद करीब जाकर तमंचे या बंदूक को सीने से सटाकर गोली मार देता था।
यही तरीका गोली की आवाज कम सुनाई देने की वजह भी माना गया।
पीड़ित को संभलने या मदद के लिए आवाज लगाने का मौका तक नहीं मिलता था। एक गोली और फिर सब कुछ खत्म।
यही वजह थी कि आसपास मौजूद लोगों को भी कई बार घटना का पता तुरंत नहीं चलता था।
घर से मिले सामान ने बढ़ाया शक
गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने साहू के घर की तलाशी ली तो वहां से कुछ ऐसी चीजें बरामद होने का दावा किया गया, जिन्होंने जांच को और मजबूत किया।
पुलिस के मुताबिक, उसके घर से नकली दाढ़ियां-मूंछें, सफेद कपड़े और रबर के तलवे वाले जूते मिले।
जांचकर्ताओं के लिए ये सामान महत्वपूर्ण थे क्योंकि इससे यह आशंका मजबूत हुई कि आरोपी अपनी पहचान और आवाजाही छिपाने के लिए भेष बदलने जैसी तरकीबें इस्तेमाल करता रहा होगा।
रबर के तलवे वाले जूते भी पुलिस के लिए अहम सुराग माने गए, क्योंकि ऐसे जूतों से चलते समय आवाज कम हो सकती है।
दो साल का खौफ, आखिरकार खत्म हुआ
सदाशिव साहू की गिरफ्तारी के बाद फुरसतगंज में लंबे समय से कायम डर धीरे-धीरे कम होने लगा।
जिस हत्यारे को पुलिस करीब दो वर्षों से तलाश रही थी, वह आखिरकार कानून की गिरफ्त में था।
इस मामले की सबसे खौफनाक बात यह थी कि हत्याओं का एक स्पष्ट पैटर्न होने के बावजूद कातिल लंबे समय तक पुलिस से बचता रहा। उम्रदराज पुरुषों को चुनना, रात का समय, सीने में सिर्फ एक गोली, लूट का कोई मकसद नहीं और वारदात के बाद चुपचाप गायब हो जाना—इन सभी चीजों ने फुरसतगंज हत्याकांड को बेहद रहस्यमयी बना दिया था।
आज इतने साल बाद भी यह मामला इस सवाल की वजह से याद किया जाता है कि आखिर कोई व्यक्ति एक के बाद एक इतने लोगों की जान लेने के पीछे किस मानसिकता से काम कर रहा था।
फुरसतगंज की उन रातों में लोग सिर्फ गोली की आवाज से नहीं डरते थे। असली डर तो उस अनदेखे हत्यारे का था, जो अंधेरे में आता था, अपने शिकार के बिल्कुल करीब पहुंचता था और फिर बिना किसी शोर के उसे हमेशा के लिए खामोश कर देता था।

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