सावधान! पश्चिम एशिया में महायुद्ध की आहट? सऊदी-हूती के हमलों के बीच अब पाकिस्तान की एंट्री का खतरा
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां किसी भी नए सैन्य कदम से हालात और ज्यादा बिगड़ सकते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से शुरू हुए हमलों के बीच अब हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच भी सीधा सैन्य टकराव तेज हो गया है। इसी बीच पाकिस्तान की ओर से दिया गया एक बयान इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना रहा है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैलता है या सऊदी के खिलाफ बिना उकसावे के आक्रामक कार्रवाई होती है, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच हुआ मक्का रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है। इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या पश्चिम एशिया का मौजूदा संघर्ष धीरे-धीरे एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदलने की दिशा में बढ़ रहा है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान सीधे युद्ध में उतर गया है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से सामूहिक रक्षा समझौते का जिक्र ऐसे समय में हुआ है, जब सऊदी अरब पर हूती हमलों और अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण पूरे क्षेत्र में तनाव पहले ही काफी बढ़ चुका है।
पाकिस्तान ने दी हूतियों को बड़ी चेतावनी
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बुधवार को कहा कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैलता है तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच हुआ मक्का समझौता लागू हो सकता है।
इस समझौते का उद्देश्य तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना है। समझौते के तहत किसी एक देश पर आक्रामक कार्रवाई को गंभीर सामूहिक सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा जा सकता है।
ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट किया कि यह समझौता किसी दूसरे देश पर हमला करने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य रक्षात्मक है। यानी अगर समझौते में शामिल किसी देश पर हमला होता है तो बाकी देश उसकी सुरक्षा के लिए साथ खड़े हो सकते हैं।
यही बयान मौजूदा हालात में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सऊदी अरब पहले ही हूती हमलों का सामना कर रहा है।
हूती-सऊदी संघर्ष भी हुआ तेज
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के समानांतर हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच भी तनाव बढ़ गया है।
हूतियों ने दावा किया कि सऊदी अरब के विमानों ने मारीब, अल-जौफ, तैज और होदेइदा प्रांतों में दर्जनों हवाई हमले किए। यह कार्रवाई सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों की ओर से किए गए हमलों के बाद हुई।
इससे पहले हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई थीं। हमलों में लोगों के घायल होने की भी जानकारी सामने आई।
इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अगर हूती हमले लगातार जारी रहते हैं और जवाब में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई भी बढ़ती है, तो यमन का संघर्ष क्षेत्रीय स्तर पर और फैल सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुआ संघर्ष
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाने वाली सबसे बड़ी घटनाओं में अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुआ सैन्य संघर्ष भी शामिल है।
करीब एक सप्ताह तक अपेक्षाकृत शांति रहने के बाद मंगलवार देर रात दोनों देशों के बीच फिर से हमले शुरू हो गए। दोनों पक्षों की ओर से मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं।
अमेरिकी सेना के मुताबिक ईरान की ओर से उसके युद्धपोत को निशाना बनाने की कोशिश की गई। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इन हमलों को सफलतापूर्वक नाकाम कर दिया गया और किसी अमेरिकी सैन्यकर्मी को नुकसान नहीं पहुंचा।
इसके बाद अमेरिका की ओर से ओमान की खाड़ी और अन्य इलाकों में ईरानी पोतों को निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई। अमेरिकी कार्रवाई में कई ईरानी तेल पोत नष्ट होने की बात कही गई है।
ईरान ने इन घटनाओं के बाद कड़ी प्रतिक्रिया देने की चेतावनी दी है। इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
तेल के मोर्चे पर भी बढ़ी चिंता
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार पर भी दिखाई देने लगा है।
ब्रेंट क्रूड की कीमत छह सप्ताह में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई। पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। ऐसे में यहां किसी बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
अगर संघर्ष और लंबा चलता है या तेल आपूर्ति से जुड़े महत्वपूर्ण मार्ग प्रभावित होते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
इसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर परिवहन लागत, महंगाई और अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है।
भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा असर
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। महंगे कच्चे तेल और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच घरेलू शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखने को मिली।
सेंसेक्स में 800 से ज्यादा अंकों की गिरावट दर्ज की गई और यह तीन महीने के निचले स्तर के करीब पहुंच गया। निफ्टी भी 23,450 के स्तर से नीचे फिसल गया।
बाजार में सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। यदि तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है तो इससे भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही महंगाई और रुपये की स्थिति को लेकर भी निवेशकों की चिंता बढ़ सकती है।
भारत ने सऊदी पर हूती हमलों की निंदा की
भारत ने सऊदी अरब की संप्रभु भूमि पर हूती विद्रोहियों के हमलों की कड़ी निंदा की है।
भारत की ओर से कहा गया कि नागरिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना बेहद चिंताजनक है। ऐसे हमले क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को नुकसान पहुंचाते हैं।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की हिंसक गतिविधियां स्वीकार्य नहीं हैं। पश्चिम एशिया में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं और भारत के आर्थिक तथा ऊर्जा हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। इसलिए क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भारत के लिए भी गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
क्या पाकिस्तान सीधे युद्ध में उतरेगा?
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान अब सीधे इस संघर्ष में शामिल होने जा रहा है?
फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि पाकिस्तान ने तत्काल किसी सैन्य कार्रवाई की घोषणा की है। पाकिस्तान की ओर से मुख्य रूप से मक्का रक्षा समझौते का हवाला देते हुए यह कहा गया है कि यदि सऊदी अरब पर गंभीर आक्रामक कार्रवाई होती है तो समझौते के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
लेकिन अगर सऊदी अरब पर हमले लगातार बढ़ते हैं और संघर्ष यमन की सीमाओं से बाहर निकलकर सीधे सऊदी क्षेत्र में बड़े स्तर पर फैलता है, तो पाकिस्तान पर अपने रक्षा समझौते के तहत प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ सकता है।
यही वजह है कि ख्वाजा आसिफ का बयान मौजूदा हालात में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या महायुद्ध की आहट है?
पश्चिम एशिया में इस समय कई मोर्चे एक साथ सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव है, दूसरी तरफ हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। इसके अलावा क्षेत्र के दूसरे देशों पर भी इस संकट का प्रभाव पड़ सकता है।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होगा जब अलग-अलग मोर्चों पर चल रहे संघर्ष एक-दूसरे से जुड़ने लगें। यदि सऊदी अरब पर हमले बढ़ते हैं और पाकिस्तान-तुर्किए जैसे देशों की भूमिका भी बढ़ती है, तो संघर्ष का दायरा काफी व्यापक हो सकता है।
हालांकि अभी इसे निश्चित रूप से महायुद्ध कहना सही नहीं होगा। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत जरूर दे रहा है कि पश्चिम एशिया में स्थिति बेहद संवेदनशील हो चुकी है।
आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच अगली सैन्य कार्रवाई, सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष तथा पाकिस्तान के मक्का रक्षा समझौते को लेकर उठाए जाने वाले कदम बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
अगर इन घटनाओं में से किसी एक मोर्चे पर भी तनाव अचानक बढ़ता है, तो उसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रह सकता। तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक, दुनिया के कई हिस्से इसकी चपेट में आ सकते हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इसी बात पर है कि क्या यह तनाव किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की ओर बढ़ेगा या फिर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए इसे समय रहते नियंत्रित कर लिया जाएगा।

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