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G7 की चौधराहट पर मंडराया बड़ा खतरा! ब्रिक्स के पास ऐसा क्या है, जिससे अमेरिका समेत अमीर देशों की बढ़ी टेंशन?



दशकों तक दुनिया की आर्थिक और सैन्य व्यवस्था में अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों का दबदबा रहा है। अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिमी गठबंधन वैश्विक राजनीति, सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और वित्तीय व्यवस्था में सबसे प्रभावशाली ताकतों में शामिल रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के शक्ति संतुलन में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। ब्रिक्स के विस्तार ने इस बदलाव को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है।

भारत, चीन, रूस और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बने ब्रिक्स समूह का दायरा बढ़ने के साथ ही सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यवस्था का केंद्र पश्चिम से हटकर एशिया और ग्लोबल साउथ की ओर बढ़ सकता है? सैनिकों की संख्या, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा उत्पादन, मैन्युफैक्चरिंग और परमाणु क्षमता जैसे कई पैमानों पर ब्रिक्स का आकार बेहद प्रभावशाली नजर आता है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। G7 एक राजनीतिक और आर्थिक मंच है, जबकि ब्रिक्स भी मुख्य रूप से आर्थिक एवं राजनीतिक सहयोग का समूह है। इसे NATO जैसे औपचारिक सैन्य गठबंधन के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसलिए दोनों की सैन्य तुलना केवल आंकड़ों के आधार पर करना पूरी तस्वीर नहीं बताता। फिर भी दोनों समूहों की सामूहिक क्षमता का आकलन वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव की अहम तस्वीर जरूर पेश करता है।

सैनिकों की संख्या में ब्रिक्स काफी आगे

सैन्य ताकत की चर्चा होते ही सबसे पहले सैनिकों की संख्या का सवाल सामने आता है। ब्रिक्स के प्रमुख सदस्यों में भारत, चीन और रूस जैसी बड़ी सैन्य शक्तियां शामिल हैं। इन देशों की सक्रिय और रिजर्व सैन्य क्षमता को जोड़ने पर आंकड़ा G7 देशों की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देता है।

G7 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा शामिल हैं। इन सभी देशों के पास आधुनिक और अत्यधिक प्रशिक्षित सेनाएं हैं, लेकिन सामूहिक मैनपावर की तुलना में ब्रिक्स का आकार बड़ा है।

ब्रिक्स की कुल आबादी भी G7 की तुलना में कई गुना ज्यादा है। भारत और चीन अकेले ही दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि मानव संसाधन और संभावित सैन्य भर्ती के लिहाज से ब्रिक्स देशों के पास बड़ा आधार मौजूद है।

लेकिन सैनिकों की संख्या को सीधे युद्ध जीतने का पैमाना नहीं माना जा सकता। आधुनिक युद्ध में प्रशिक्षण, कमांड सिस्टम, खुफिया जानकारी, सैटेलाइट, ड्रोन, साइबर क्षमता, एयर डिफेंस और लॉजिस्टिक्स जैसे पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

असली मुकाबला डिफेंस बजट और तकनीक का

अगर रक्षा बजट की बात करें तो तस्वीर कुछ बदल जाती है। G7 की सबसे बड़ी ताकत उसके विशाल रक्षा खर्च में दिखाई देती है। अकेला अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाला देश है और उसकी सैन्य मशीनरी के पास अत्याधुनिक विमान, मिसाइल, परमाणु पनडुब्बियां, एयरक्राफ्ट कैरियर और वैश्विक सैन्य अड्डों का विशाल नेटवर्क है।

ब्रिक्स देशों का संयुक्त रक्षा खर्च अमेरिका और उसके G7 सहयोगियों के मुकाबले कम है। लेकिन ब्रिक्स के कुछ देशों के पास बड़े पैमाने पर हथियार निर्माण की क्षमता और कम लागत पर उत्पादन करने की ताकत है।

चीन ने पिछले वर्षों में अपने रक्षा उद्योग को तेजी से विस्तार दिया है। रूस के पास मिसाइल, परमाणु हथियार और सैन्य तकनीक का लंबा अनुभव है, जबकि भारत भी स्वदेशी रक्षा उत्पादन और मिसाइल तकनीक को तेजी से बढ़ा रहा है।

यही वजह है कि आने वाले समय में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कौन कितना पैसा रक्षा पर खर्च करता है। यह भी देखना होगा कि उस पैसे से कितनी सैन्य क्षमता तैयार होती है और संकट के समय उत्पादन कितनी तेजी से बढ़ाया जा सकता है।

रेयर अर्थ की ताकत ने बदल दिया खेल

आधुनिक हथियारों की दुनिया में एक ऐसी ताकत है जो बंदूक या मिसाइल से दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके बिना आधुनिक सैन्य तकनीक का निर्माण बेहद मुश्किल हो सकता है। यह ताकत है—क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स।

चीन रेयर अर्थ की माइनिंग और खास तौर पर प्रोसेसिंग में दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ताकत है। इन खनिजों का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, मैग्नेट, इलेक्ट्रिक मोटर, रडार, मिसाइल सिस्टम और आधुनिक सैन्य उपकरणों में किया जाता है।

यही कारण है कि पश्चिमी देशों के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भरता एक रणनीतिक चिंता बन चुकी है। यदि किसी गंभीर भू-राजनीतिक संकट में इन महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई बाधित होती है, तो इसका असर केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग पर नहीं बल्कि रक्षा उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

हालांकि यह कहना कि सप्लाई रुकते ही G7 की हथियार फैक्ट्रियां कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह बंद हो जाएंगी, अतिशयोक्ति होगी। अमेरिका और उसके सहयोगी देश भी वैकल्पिक सप्लाई चेन, नए खनन प्रोजेक्ट और रिसाइक्लिंग क्षमता विकसित करने पर काम कर रहे हैं। फिर भी रेयर अर्थ सप्लाई में चीन की भूमिका एक बड़ा रणनीतिक हथियार जरूर है।

तेल और गैस में भी ब्रिक्स की बड़ी पकड़

किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष में हथियारों के साथ ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक बन जाती है। टैंक, विमान, युद्धपोत, ट्रक और औद्योगिक मशीनरी—सभी को ऊर्जा की जरूरत होती है।

ब्रिक्स में रूस जैसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देश शामिल हैं। इसके अलावा समूह के विस्तारित स्वरूप में पश्चिम एशिया के कई महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादक देशों की मौजूदगी ने इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ा दी है।

अगर ब्रिक्स देश ऊर्जा उत्पादन और व्यापार में अपनी भूमिका को एक साझा रणनीतिक ताकत में बदलने में सफल होते हैं, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। खास तौर पर तेल की कीमतों, सप्लाई रूट और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के स्तर पर इसका महत्व बढ़ सकता है।

मैन्युफैक्चरिंग में चीन की ताकत

ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकतों में से एक उसकी औद्योगिक क्षमता भी है। चीन दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर मशीनरी, वाहन, जहाज और ड्रोन तक बड़ी मात्रा में उत्पादन करता है।

भारत भी रक्षा और औद्योगिक उत्पादन में अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। रूस के पास एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग का मजबूत आधार है। यदि इन देशों की उत्पादन क्षमताएं और तकनीकी सहयोग आगे बढ़ते हैं, तो ग्लोबल सप्लाई चेन पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

युद्ध की स्थिति में उत्पादन क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। जिस देश के पास हथियारों, गोला-बारूद, ड्रोन और स्पेयर पार्ट्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता होती है, वह लंबे संघर्ष में अपनी स्थिति बनाए रखने में बेहतर सक्षम हो सकता है।

परमाणु हथियारों में कौन आगे?

परमाणु शक्ति के मामले में तस्वीर बेहद संवेदनशील है। ब्रिक्स में रूस, चीन और भारत जैसे परमाणु हथियार संपन्न देश हैं। दूसरी तरफ G7 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के पास परमाणु हथियार हैं।

रूस और अमेरिका के पास दुनिया के सबसे बड़े परमाणु हथियार भंडार हैं। चीन भी लगातार अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार कर रहा है। भारत के पास परमाणु त्रिकोण यानी जमीन, समुद्र और हवा से परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करने का कार्यक्रम है।

इस लिहाज से दोनों समूहों के पास इतनी परमाणु क्षमता है कि किसी भी सीधे परमाणु टकराव की कल्पना विनाशकारी होगी। इसलिए परमाणु हथियारों की संख्या में बढ़त को पारंपरिक युद्ध की तरह "जीत" का पैमाना नहीं माना जा सकता।

हाइपरसोनिक मिसाइलों ने बढ़ाई चिंता

आधुनिक युद्ध का अगला बड़ा मोर्चा हाइपरसोनिक हथियार हैं। रूस ने हाइपरसोनिक मिसाइलों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण क्षमताएं विकसित की हैं। चीन भी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

इन हथियारों की खासियत उनकी अत्यधिक गति और संभावित रूप से बदलते प्रक्षेप पथ में होती है, जिससे मौजूदा मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए उन्हें रोकना कठिन हो सकता है।

हालांकि यह दावा करना कि G7 के पास इनका कोई जवाब नहीं है, सही नहीं होगा। अमेरिका और उसके सहयोगी भी हाइपरसोनिक हथियारों तथा उनके खिलाफ रक्षा प्रणालियों पर बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं।

लेकिन G7 की ताकत को कम आंकना बड़ी भूल होगी

ब्रिक्स की बढ़ती ताकत के बीच G7 को कमजोर समझना भी सही तस्वीर नहीं होगी। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य क्षमताओं में से एक है। उसकी नौसेना, एयर फोर्स, सैटेलाइट नेटवर्क, खुफिया तंत्र, लॉजिस्टिक्स और वैश्विक सैन्य मौजूदगी बेहद व्यापक है।

G7 देशों के पास उन्नत सेमीकंडक्टर तकनीक, एयरोस्पेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, वित्तीय संस्थानों और उच्च तकनीकी अनुसंधान का मजबूत आधार भी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि G7 देश लंबे समय से सैन्य और राजनीतिक सहयोग के पश्चिमी नेटवर्क का हिस्सा हैं। NATO भले ही G7 का हिस्सा नहीं है, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कनाडा जैसे कई G7 सदस्य NATO में शामिल हैं। इससे पश्चिमी देशों को एक संगठित सैन्य ढांचा मिलता है।

इसके विपरीत ब्रिक्स के सदस्य एक औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं हैं और उनके बीच कई रणनीतिक मतभेद भी हैं।

असली कहानी सिर्फ सैनिकों की नहीं, सिस्टम की है

यही इस पूरे मुकाबले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। ब्रिक्स के पास बड़ी आबादी, विशाल भूभाग, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा और मैन्युफैक्चरिंग जैसी कई ताकतें हैं। वहीं G7 के पास अत्याधुनिक तकनीक, विशाल वित्तीय क्षमता, वैश्विक सैन्य नेटवर्क और उच्च स्तरीय रक्षा प्रणालियां हैं।

इसलिए आने वाले समय में दुनिया शायद किसी एक समूह की पूर्ण जीत नहीं बल्कि दो या उससे अधिक शक्ति केंद्रों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा देखेगी।

ब्रिक्स का विस्तार इस बात का संकेत जरूर है कि ग्लोबल साउथ अब वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है। वहीं पश्चिमी देशों के सामने चुनौती यह है कि बदलती आर्थिक और रणनीतिक वास्तविकताओं के बीच वे अपनी पुरानी बढ़त को किस तरह बनाए रखते हैं।

दुनिया का अगला शक्ति संतुलन केवल मिसाइलों और सैनिकों से तय नहीं होगा। तेल, गैस, रेयर अर्थ, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, समुद्री रास्ते, टेक्नोलॉजी और वैश्विक व्यापार—इन सभी मोर्चों पर होने वाली प्रतिस्पर्धा तय करेगी कि 21वीं सदी में दुनिया की असली चौधराहट किसके हाथ में जाती है।

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