Breaking News

‘न आगे का रास्ता, न लौटने की राह...’ नेपाल के पहाड़ों में फंसे बुजुर्ग-बच्चे, 15 दिनों के इंतजार ने बढ़ाई मुश्किल



नेपाल में भारी बारिश और प्राकृतिक आपदा के बीच राजस्थान से तीर्थयात्रा पर निकला एक जत्था गंभीर मुश्किल में फंस गया है। काठमांडू से करीब 65 किलोमीटर दूर कृष्णभीर इलाके में सड़क का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होने के कारण कोटा और बारा से आए तीर्थयात्रियों की बस आगे नहीं बढ़ पा रही है। पीछे लौटने का रास्ता भी आसान नहीं है। ऐसे में यात्रियों के सामने सबसे बड़ी चिंता सुरक्षित ठिकाने, भोजन और आगे की यात्रा को लेकर बनी हुई है।

इस समूह में बुजुर्गों के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। सड़क संपर्क टूटने के बाद यात्रियों को अपनी बस में ही समय गुजारना पड़ रहा है। यात्रियों का कहना है कि स्थानीय प्रशासन की ओर से रास्ता और पुल दोबारा तैयार होने में करीब 15 दिन लगने की बात कही जा रही है। ऐसे में उनका सवाल है कि अगर वाकई इतना समय लगता है तो इतने दिनों तक वे कहां रहेंगे और बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल कैसे करेंगे?

हालांकि, स्थानीय प्रशासन ने यात्रियों की परेशानी को देखते हुए उन्हें सुरक्षित स्थान पर ठहराने की व्यवस्था करने का भरोसा दिया है।

आंखों के सामने खत्म हो गई सड़क

राजस्थान के कोटा और बारा से निकला यह तीर्थयात्रियों का समूह लंबी धार्मिक यात्रा पर था। समूह ने भारत के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन करने के बाद नेपाल का रुख किया था।

लेकिन नेपाल में प्रवेश करने के बाद कृष्णभीर के पास अचानक सड़क संपर्क बाधित हो गया। यात्रियों के सामने सड़क का रास्ता बंद था और आगे जाने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी। बस को वापस मोड़ना भी आसान नहीं था।

यात्रियों के मुताबिक, जिस रास्ते से वे गुजर रहे थे, वह प्राकृतिक आपदा के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सड़क कट जाने से बस आगे नहीं जा सकती और वैकल्पिक रास्ते को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

यात्रियों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपने वाहन के साथ एक ऐसे स्थान पर फंस गए हैं जहां लंबे समय तक रुकने की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

बस बनी यात्रियों का अस्थायी घर

रात में ठहरने के लिए उपयुक्त जगह नहीं मिलने के कारण बस ही अब यात्रियों के लिए अस्थायी आशियाना बन गई है। दिन किसी तरह गुजर रहा है, लेकिन रात होते ही परेशानी बढ़ जाती है।

बस में सामान के बीच बुजुर्ग और बच्चे बैठे हैं। महिलाएं भी इसी सीमित जगह में रहने को मजबूर हैं। यात्रियों का कहना है कि सड़क किनारे खुले में रात गुजारना सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं है।

बद्रीलाल मीणा ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि समूह में महिलाएं, बच्चियां और बच्चे हैं। ऐसी स्थिति में 15 दिन तक रुकना बेहद मुश्किल होगा।

उनका कहना है कि सभी लोग किसी तरह सुरक्षित स्थान तक पहुंचना चाहते हैं और अब उनकी प्राथमिकता तीर्थयात्रा जारी रखना नहीं बल्कि अपने लोगों को सुरक्षित घर वापस पहुंचाना है।

राशन खत्म होने की चिंता

यात्रियों की एक बड़ी चिंता भोजन और जरूरी सामान को लेकर भी है। अचानक रास्ता बंद होने के कारण किसी ने इतने लंबे समय तक एक ही जगह फंसे रहने की तैयारी नहीं की थी।

जत्थे के पास मौजूद राशन सीमित है और अगर रास्ता कई दिनों तक बंद रहा तो भोजन की व्यवस्था करना चुनौती बन सकती है। खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए नियमित भोजन और जरूरी सुविधाओं की जरूरत सबसे ज्यादा है।

यात्रियों का कहना है कि अगर प्रशासन की ओर से रास्ता खुलने में 15 दिन लगने की बात सही है तो इतने लंबे समय तक उनके लिए भोजन, पानी और रहने की व्यवस्था जरूरी होगी।

छोटी गाड़ियों से निकलने का सुझाव, लेकिन खर्च की चिंता

यात्रियों के मुताबिक, उन्हें सुझाव दिया गया है कि बस को वहीं छोड़कर छोटी गाड़ियों की मदद से वैकल्पिक मार्ग के जरिए काठमांडू या आगे की ओर निकला जा सकता है।

यही सुझाव अब एक नई परेशानी लेकर आया है। समूह में यात्रियों की संख्या काफी अधिक है और सभी को छोटी गाड़ियों में ले जाना आसान नहीं होगा।

नाथूलाल मीणा का कहना है कि यदि बस छोड़कर छोटी गाड़ियों से जाना पड़े तो कई गाड़ियों की जरूरत होगी। पांच-छह यात्रियों के लिए अलग वाहन की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे में इतनी गाड़ियों की व्यवस्था करना और उसका खर्च उठाना यात्रियों के लिए मुश्किल होगा।

उनका सवाल है कि अचानक पैदा हुई इस स्थिति में इतने बड़े समूह के लिए परिवहन का खर्च कौन उठाएगा?

बस छोड़ने पर सामान की सुरक्षा का सवाल

रामस्वरूप मीणा की चिंता इससे भी आगे की है। उनका कहना है कि यदि किसी तरह छोटी गाड़ियों से सोनौली या किसी दूसरे स्थान तक पहुंच भी गए तो वहां से आगे की यात्रा कैसे पूरी होगी, यह स्पष्ट नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल बस और उसमें रखे सामान को लेकर है। यदि यात्रियों को बस छोड़नी पड़ती है तो उनके सामान की सुरक्षा कौन करेगा?

तीर्थयात्रियों के पास कपड़े, जरूरी सामान और अन्य वस्तुएं हैं। ऐसे में वाहन को सुरक्षित स्थान पर छोड़ना उनके लिए आसान फैसला नहीं है।

यात्रियों का कहना है कि उन्हें एक ऐसी योजना चाहिए जिससे वे सुरक्षित तरीके से अपने सामान और बस के साथ आगे निकल सकें।

29 अगस्त को नेपाल पहुंचे थे यात्री

बताया गया है कि यह तीर्थयात्रियों का समूह 29 अगस्त को नेपाल में दाखिल हुआ था। इससे पहले यात्रियों ने भारत के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन किए थे।

उनकी यात्रा की शुरुआत बाबा बागेश्वर धाम से हुई थी। इसके बाद समूह चित्रकूट, अयोध्या, काशी विश्वनाथ और गोरखनाथ मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों पर पहुंचा।

भारत के इन प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन के बाद यात्रियों ने सोनौली सीमा के रास्ते नेपाल में प्रवेश किया था। नेपाल में उनका प्रमुख धार्मिक पड़ाव पशुपतिनाथ मंदिर था।

इसके बाद समूह का कार्यक्रम बिहार, झारखंड, कामाख्या, ओडिशा और गंगासागर होते हुए वापस लौटने का था।

लेकिन कृष्णभीर में सड़क संपर्क टूटने के बाद पूरी यात्रा अचानक अनिश्चित हो गई।

‘हमने कभी नहीं सोचा था कि यहां फंस जाएंगे’

रामस्वरूप धारीवाल का कहना है कि वे धार्मिक यात्रा पर निकले थे और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि नेपाल में इस तरह रास्ते में फंस जाएंगे।

उनके मुताबिक, अब न आगे जाने का रास्ता साफ है और न ही पीछे लौटने का कोई आसान विकल्प। हर तरफ सिर्फ इंतजार है।

तीर्थयात्री लगातार सड़क की स्थिति और रास्ता खुलने की जानकारी लेने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन्हें अभी यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है कि रास्ता कब तक सामान्य होगा।

यही अनिश्चितता उनकी चिंता को और बढ़ा रही है।

बच्चों और बुजुर्गों को लेकर ज्यादा चिंता

कैलाशचंद ने बताया कि समूह में बुजुर्ग और बच्चे होने के कारण परेशानी ज्यादा है। दिन किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन रात की स्थिति सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है।

बुजुर्गों के लिए लंबे समय तक बस में बैठे रहना मुश्किल है। वहीं बच्चों को भी खुले वातावरण और सीमित सुविधाओं में ज्यादा देर तक रखना चुनौतीपूर्ण है।

महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा तथा निजी जरूरतों को लेकर भी परिवार चिंतित हैं।

यात्रियों का कहना है कि यदि रास्ता जल्द नहीं खुलता तो उन्हें किसी सुरक्षित भवन या राहत केंद्र में व्यवस्थित रूप से ठहराया जाना चाहिए।

स्थानीय प्रशासन ने दिया मदद का भरोसा

इस बीच स्थानीय प्रशासन ने यात्रियों को राहत देने की पहल की है। गजुरी गांव पालिका के अध्यक्ष गणेश लाल श्रेष्ठ ने कहा है कि किसी अतिथि को परेशानी नहीं होने दी जाएगी।

उन्होंने बताया कि तीर्थयात्रियों के समूह को नवनिर्मित गांव पालिका भवन में ठहराने की व्यवस्था की जा रही है।

इससे यात्रियों को बस में रहने की मजबूरी से कुछ राहत मिल सकती है। यदि उन्हें भवन में ठहरने, भोजन और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं तो बच्चों और बुजुर्गों की परेशानी भी कुछ कम हो सकती है।

हालांकि, यात्रियों की वापसी का स्थायी समाधान सड़क संपर्क बहाल होने के बाद ही संभव होगा।

अब सिर्फ एक सवाल—कब खुलेगा रास्ता?

फिलहाल राजस्थान से आए इन तीर्थयात्रियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि सड़क कब तक खुलेगी।

यदि प्रशासन के अनुमान के मुताबिक रास्ता खोलने में करीब 15 दिन लगते हैं तो इतने लंबे समय तक यात्रियों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से रखना जरूरी होगा।

दूसरी तरफ यदि वैकल्पिक मार्ग से यात्रियों को निकाला जाता है तो उनके परिवहन, सामान और आगे की यात्रा की व्यवस्था करनी होगी।

तीर्थयात्रियों का कहना है कि वे किसी तरह विवाद या परेशानी में नहीं पड़ना चाहते। उनकी सिर्फ एक मांग है कि प्रशासन उन्हें सुरक्षित तरीके से वहां से बाहर निकालने में मदद करे।

जिस जत्थे ने मंदिरों के दर्शन और धार्मिक यात्रा के लिए नेपाल का रुख किया था, वह अब एक टूटे हुए रास्ते के सामने अपनी पूरी यात्रा का भविष्य तलाश रहा है। बस में बैठे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं इस इंतजार में हैं कि कब रास्ता खुलेगा और कब वे सुरक्षित घर लौट पाएंगे। फिलहाल उनकी बस ही उनका ठिकाना है और सड़क खुलने की उम्मीद ही उनकी सबसे बड़ी आस।

कोई टिप्पणी नहीं